दिग्भ्रमितों ने किया पत्रकारिता का बेड़ा गर्क

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            पत्रकारिता की दुनियां भी बड़ी अजीब है.यहाँ‘आइटम’ और ‘वेराइटी’ की कोई कमी नहीं है.पहले तो ऐसा महसूस होगा कि पत्रकार महोदय से बड़ा बुद्धिजीवी कोई नहीं होगा.लेकिन जुबां खुलते ही पोल भी खुल जाती है.इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पत्रकारिता में अल्पज्ञानी और दिग्भ्रमितों की जमात बढ़ती ही जा रही है.यह हाल केवल जिले का ही नहीं बल्कि संपादक स्तर पर मौजूद लोगों का भी है.
 
           देहात में एक कहावत बड़ी प्रचलित है ‘लाचारी का दाल खेसारी’.बतलाना प्रासंगिक होगा कि कभी इस इलाके में दाल की किस्म ‘खेसारी’ का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था लेकिन बाद में जब इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि हुई कि खेसारी दाल खाना सेहत के लिए हानिकारक है तो उसका उत्पादन बंद कर दिया गया. कहने का मतलब यह कि कोई अन्य विकल्प नहीं है तो खेसारी चलेगा.दुखद पहलू यह है कि पत्रकारिता जैस गंभीर पेशा अब ‘खेसारीलालों’ की जमात बन कर रह गया है.
            ‘खेसारीलाल’ कहने की हिमाकत बड़ी जिम्मेवारी के साथ कर रहा हूँ. एक पत्रकार की हैसियत से जो कुछ देखा और महसूस किया हूँ, उस आधार पर कहा जा सकता है कि इस पेशे में जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई है.कारण स्पष्ट है कि कल तक स्कूल और कॉलेज में सबसे पिछले बेंच पर बैठने वाला शख्स आज जिले में ब्यूरो चीफ अथवा डेस्क पर उप-संपादक बना बैठा है.मजे की बात यह है कि इनमे से कई मैट्रिक से लेकर स्नातकोत्तर तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं.कई लोग तो खुद को विश्वविद्यालय का टॉपर भी बतलाते हैं.विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता पर संदेह उठाना जल्दीबाजी होगी लेकिन ऐसे तथाकथित टॉपरों की बौद्धिक क्षमता देखते हुए उनके डिग्री की निष्पक्ष जांच की जरूरत महसूस हो रही है.
            समस्या यह है कि जो लोग इस पेशे से जुड़े हुए हैं उन्होंने इसे बतौर कैरियर के रूप में नहीं लिया है.भाई साहब की जब सरकारी नौकरी की उम्र बीत गयी और बौद्धिक क्षमता पर पूरी तरह प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया तो जुगाड़ तकनीक के सहारे मीडियाकर्मी बन गए.चूंकि आदर्शवाद और नैतिकता का सारा ठेका इन्हीं के पास होता है इसलिए अपने काले अतीत को ढंकने के लिए भ्रमजाल फैलाना इनकी मजबूरी होती है.दिग्भ्रमित तो ऐसे अल्पज्ञानी इतने होते हैं कि अपनी लेखनी कि वजह से कई बार उपहास का पात्र भी बन जाते हैं.ऐसा नहीं है कि इस पेशे में अच्छे लोग नहीं है, लेकिन उन्हें ढूंढ निकलना मृग मरीचिका ही साबित होगी.
            पत्रकारों ने ही पत्रकारिता पेशे का बेड़ा गर्क कर रखा है.क्यों और कैसे, ये आगे भी बतलायेंगे.सबसे बड़ी बिडम्बना जो इनके साथ जुड़ी है वह यह है कि दूसरों को आइना दिखने वालों को अपना चेहरा आईना में देखना गंवारा नहीं है.झूठी शान, बिगड़े ईमान और बिक चुके स्वाभिमान के स्याह सच को दबाने की असफल कोशिश कर रहे पत्रकार बिरादरी को अपने गिरेबान में झाँकने की जरूरत है और मंच पर भाषण देने की बजाय आत्ममंथन की जरूरत है.
( साभारः मधेपुरा टाइम्स )
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