पढ़िए आमिर खान का वह पूरा इंटरव्यू, जिसके एक अंश ने हंगामा बरपा रखा है

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इं‌डियन एक्सप्रेस के विशेष कार्यक्रम में आमिर खान ने कलाकारों द्वारा जताए जा रहे विरोध पर कहा कि वाकई मुल्क में भय और निराशा का महौल है। अपनी पत्नी किरण राव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे देश छोड़ने की राय तक जाहिर कर चुकी हैं।

आमिर का ये बयान परेशानी का कारण बन गया। भाजपा समेत कई संगठनों ने उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

उन्हें सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। आमिर स्नैपडील के ब्रांड अंबेस्डर हैं, इसलिए उस कंपनी पर भी निशाना साधा गया।

अंततः आमिर को सफाई देनी पड़ी और कहना पड़ा कि उन्होंने मुल्क छोड़ने की बात नहीं की थी। आमिर के साथ बातचीत अनंत गोयनका ने की थी, उस बातचीत में क्या बोले थे आमिर। पढ़िए एक-एक शब्द-

अनंत गोयनका- आमिर मैं बहुत लंबे समय से आपका प्रशंसक हूं। मैं पिछले 15 सालों से आपका प्रशंसक हूं। … लेकिन आमिर मुझे लगता है कि मैं आपका प्रशंसक हूं…जो जीता वही सिकंदर के कारण..अंदाज अपना-अपना के कारण। हालांकि आज हमें लगता है कि आपके प्रशंसक इसलिए हैं कि आप ‘रुढ़ियों से आजाद’ (unconventional) हैं। आपकी सफलता किसी तय पैमाने से बिलकुल अलग रही है।….आप कभी भी अपना रुख स्पष्ट करने में भयभीत नहीं हुए, सामन्यतया आपके स्तर के लोग ऐसा नहीं करते। तो आप जो भी रुख तय (किसी मसले पर) करते हैं, वह आवेगात्मक होता है या सोच विचार कर। आप (अलग-अलग मुद्दों पर) अपनी राय क्यों रखते रहते हैं।

आमिर खान- कुछ अंश तक ये संवेगात्मक होता है, कुछ अंश तक भावनात्मक…..ये भावनात्‍मक प्रतिक्रिया होती है। कभी-कभी मैं कोशिश करता हूं और उनके बारे में सोचता भी हूं। लेकिन अंततः कभी-कभी आपको लगता है कि आपको बोलना है, और आप बोलते हैं। ऐसा ही है। मुझे लगता है।

अनंत गोयनका- अपने अब तक जब-जब अपनी राय सामने रखी, किसी पर आपको लगता है कि खेदजनक रहे।

आमिर खान- नहीं! मुझे ऐसा नहीं लगता!! नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। कई बार मुझे कड़ी आलोचना झेलनी पड़ती है, लेकिन मुझे नही लगता कि मुझे खेद हैं।

अनंत गोयनका- क्या आप व्यावसायिक नतीजों के बारे में भी सोचते हैं?

आमिर खान- नहीं, मैंने कभी नहीं सोचा। मैंने कभी नहीं सोचा। हालांकि मैं ठीक रहा हूं, व्यावसायिक रूप से भी।

अनंत गोयनका- आमिर पिछले पांच-छह महीने से, लंबे समय बाद कलाकार खड़े हो रहे हैं और अपनी बात कह रहे हैं। ‌विशेषकर पिछले दो महीने से। आपकी क्या राय है, आपके समकालीनों ने जो कही है, न केवल ‌अभिनेता बल्‍कि सभी कलाकार।

आमिर खान- मुझे लगता है कि रचनात्क लोग अपनी राय रखें, ये महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि….आपको पता है कि…बड़ी संख्या में रचनात्मक लोग, इतिहासकार….वैज्ञानिकों के मन में लगातार कुछ बातें रही हैं, जिन्हें उन्हें लगता था कि व्यक्त करने की आवश्यकता है। रचनात्मक लोगों के लिए अपना असंतोष और निराशा प्रकट करने का एक तरीका पुरस्कार वापस करना हो सकता है। और मुझे लगता है कि ये अपनी बात कहने का एक तरीका है।

अनंत गोयनका- तो क्या आप विरोध के तरीकों का समर्थन करते हैं?

आमिर खान- मेरा मतलब है कि मैं किसी भी आंदोलन का समर्थन करता, जब तक वह अहिंसक है। जब तक की आप किसी को पीटना ना शुरू कर दें, आप हिंसा का रास्ता न अख्तियार करें। हर व्यक्ति को विरोध प्रदर्शन का अधिकार है, वे किसी भी तरीके से प्रदर्शन कर सकते हैं, जो उन्हें लगता है कि सही है, जब तक कि वे किसी को शारीरिक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाते, या कानून अपने हाथ में नहीं लेते। निश्चित रूप से ये विरोध का एक तरीका है। रचनात्मक लोगों द्वारा विरोध के प्रदर्शन का निश्चित रूप से ये एक तरीका है।

अनंत गोयनका- लेकिन आमिर क्या आप ऐसे प्रदर्शनों से सहमत हैं। क्या आपको लगता है कि ऐसे प्रदर्शनों की आवश्यकता है या फिर ये अपरिपक्व हैं।

आमिर खान- मुझे लगता है…यदि मैं गलत नहीं हूं तो यहां बैठे बहुत से लोग मुझसे अधिक जानकार हैं। मुझे आप सभी लोगों के सामने जवाब देने में डर लगता हैं। लेकिन मेरी समझ है कि रचानत्मक समाज के अधिकांश लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे है तो उसका कारण बढ़ती हुई बेचैनी है, जिसे वे महसूस करते हैं। बढ़ती हुई असहिष्‍णुता का माहौल, जिसे वे अपने चारों ओर महसूस करते हैं। उसके साथ असुरक्षा और मायूसी का बोध भी है। नतीजतन, ये उनका तरीका, जिससे वे बता रहे हैं कि वे हालात से खुश नहीं है। जहां तक मेरी निजी बात है, इस देश के हिस्से के रूप में, नागरिक के रूप में, हम अखबारों में पढ़ते हैं क्या हो रहा है? टीवी पर देखते हैं क्या हो रहा है। निश्चित रूप से मैं भी भयभीत हूं। मैं इनकार नहीं करता कि मैं डरा हुआ नहीं हूं। जैसे घटनाएं हो रही हैं उससे। और आप जानते हैं कि किसी भी समाज के लिए ये जरूरी है कि सुरक्षा का बोध हो। दुनिया के किसी भी हिस्से में हिंसा हो सकती है, किसी भी कारण से हो सकती है। हालांकि हमारे लिए, भारतीयों के लिए सुरक्षा के बोध के लिए दो-तीन चीजें जरूरी हैं। पहला न्याय का बोध, यदि कोई गलत काम करे तो न्याय दिया जाए। इससे आम आदमी को बहुत सुरक्षा का अहसास होगा। उससे लोगों को ये लगेगा कि कोई कुछ गलत करेगा तो न्याय अपना काम करेगा। दूसरी चीज जिससे सुरक्षा के अहसास होता है, और जो सबसे जरूरी अहसास है, वह यह है कि जो चुने हुए जनप्रति‌निधि हैं, जिन्हें पांच साल के लिए चुना जाता है। जिन्हें हम अपनी देखभाल के लिए चुनते हैं, चाहे वह राज्य स्तर पर हो या केंद्र के स्तर पर हो। जब लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं, जब भय का माहौल होता है। हम इन लोगों की ओर देखते हैं कि ये अपना रुख स्पष्ट करें। कठोर कदम उठाएं। और कानूनी प्रकिया को तेज करवाएं, जिससे ऐसे मुकदमे जल्द खत्म हों। जब ऐसी चीजें होते हुए देखते हैं तो लगता है कि सुरक्षा का माहौल है। और जब नहीं होते देखते हैं, सुरक्षा का माहौल नहीं लगता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की सत्ता में कौन है। ये स‌दियों से होता रहा है। ये अलग-अलग दशकों में हुआ है। अलग-अगल समय में हुआ है।……मैं टीवी की बहसों में देखता हूं, इस केस में बीजेपी चूंकि सत्ता में है.. उस पर दोष लगता है, कहती है 1984 में क्या हुआ था। लेकिन इससे जो आज हो रहा है वह नहीं तय होता। जो 1984 में हुआ भयानक ‌था और दूसरे समयों में भी जो हुआ है, जब भी हिंसात्मक कार्रवाई होगी, एक निर्दोष आदमी मारा जाएगा, वह एक व्यक्ति हो या समूह हो, ये दुर्भाग्‍यपूर्ण हैं। और ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण समयों में हम अपने नेताओं की ओर देखते हैं कि वे कठोर कदम उठाएं, चाहें राज्य स्तर पर हो या केंद्र के स्तर पर वे। बयान दें, जिससे हमें नागरिक के रूप में भरोसा हो। हम यही चाहते हैं।…….

अनंत गोयनका- आप जानते हैं…लेकिन

आमिर खान- मैं अपना जवाब पूरा कर लूं। मुझे भी लगता है कि असुरक्षा का माहौल है, भय का माहौल है, ….

अनंत गोयनका- क्या ये ज्यादा है…

मिर खान- पहले से? हां मुझे लगता है कि पिछले.. हो सकता है कि 6 या 8 महीनों से.. एक बढ़ती हुई निराशा का माहौल है, मैं यही कहूंगा। ….जब मैं घर में बैठता हूं और किरन से बात करता हूं..आप जानते हैं, किरन और मैं सारी उम्र भारत में रहे हैं। पहली बार वे मुझसे बोलीं, क्या हमें भारत से बाहर चले जाना चाहिए? किरण के लिए एक दुखद और बहुत बड़ी बात थी, जो उन्होंने मुझसे कहा। वे अपने बच्चों के लिए डरती हैं। आप जानते हैं.. वे डरती हैं कि हमारे इर्दगिर्द का माहौल क्या होगा? वे रोजाना अखबार खोलने से डरती हैं। ये इशारा है कि असंतोष का माहौल बढ़ रहा है। भय के अलावा निराशा का माहौल भी बढ़ा है। एक हद तक ये भय और एक हद तक न‌िराशा है। एक ऐसा माहौल हो गया है, जिसमें हम निराशा महसूस कर रहे हैं, सोचते हैं, ऐसा क्या हो रहा है। मेरी भी यही सोचा है। 

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