न कोई नैतिकता और न कोई समर्पण !

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मानना पड़ेगा कि इस देश में मीडिया के पास न तो कोई नैतिकता है और न ही वह इस देश के लिए समर्पित है। प्रमाण यह है कि 26 जनवरी की पूर्व संध्या राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने देशवासियों को संबोधित किया और पटना में प्रकाशित तथाकथित बड़े और राष्ट्रवादी अखबारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के आगे अपने देश के राष्ट्रपति को नकार दिया और पहले पन्ने पर एक ईंच भी जगह नहीं दी।

indiaवैसे बात केवल इतनी होती कि भारतीय मीडिया ने “घर का जोगी जोगरा, आन गांव का सिद्ध” वाली कहावत को चरितार्थ किया तो बात समझ में आती। लेकिन केंद्र सरकार ने तो हद ही पार कर दी। उसने संविधान के साथ ऐतिहासिक गंदा मजाक किया।

दरअसल हुआ यह कि केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक विज्ञापन देश के अंग्रेजी अखबारों के लिए जारी किया। संविधान की प्रस्तावना के बैकग्राउंड वाले इस विज्ञापन में समाजवाद और पंथनिरपेक्षता आदि शब्दों को विलोपित कर दिया गया।

हालांकि इस मामले में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर ने सफ़ाई दी है। सफ़ाई यह कि यह विज्ञापन मूल संविधान के आधार पर आधारित था और इसका मकसद संविधान निर्माताओं को सम्मानित करना था।

लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या यह मामला केवल इतना ही भर है कि केंद्र सरकार ने भूलवश यह विज्ञापन जारी किया या फ़िर यह एक सोची समझी साजिश है जिसे केंद्रीय राज्य मंत्री अब मारे शर्म के सफ़ाई दे रहे हैं।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अब इस देश की वह जनता क्या करे जो विविध धर्म वाले भारतीय सामाजिक व्यवस्था में विश्वास रखती है जिसकी बुनियाद में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता है। क्या उसे उस मोदी से सवाल नहीं पूछना चाहिए जिसने इस देश की मूल आत्मा के साथ बलात्कार किया है।

वैसे यह सवाल इस देश की मीडिया से भी पूछना चाहिए जिसने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ घोषित कर रखा है और स्वयं दलाली के नये कीर्तिमान रचता है।

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……नवल कुमार,संपादक (अपना भारत)

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