निष्पक्ष पत्रकारिता- प्रश्न अनेक

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अगर देखा जाये तो सूचना विस्फोट के इस महायुग में सबसे ज्यादा लहूलुहान पत्रकारिता ही है।  एक पत्रकार जब सच की परतें खोलने के लिए हर जोखिम उठाकर खबरें बनाता है, तो उसके सामने दसों दिशाओं से विपत्तियों का पहाड़ टूटने लगता है और वह बिल्कुल अकेला पड़ जाता है।

वर्तमान समय में आज देश भर में राजनीतिक हिंसा का अनिवार्य हिस्सा कैमरे और कलम पर तलवारों का खिंच जाना है।

भारतीय कानून व्यवस्था इस तरह की राजनीतिक हिंसा रोकने का इंतजाम तो करता है, लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं करता।

वहीं दूसरी तरफ लगभग 75 हजार नियमित अखबारों और 550 से ज्यादा टीवी चैनलों के बावजूद हमारे देश में समाज के सबसे वंचित व्यक्ति की आवाज की कोई अहिमयत नहीं हैं।

करीब 9 फीसदी वार्षिक की दर से पैर पसारते मीडिया की उस 70 फीसदी अवाम से बढ़ती दूरी की एक बानगी है, जो गांव में रहती है।

ऐसा क्यों हो रहा है ?  इसकी एकमात्र वजह है बाजार के दबाव में मिडिया का वैचारिक रूप से शहरी तबके की ओर केंद्रीकृत हो जाना।

नीतिगत सुधारों की बात करें या व्यवस्थागत कमियों को दुरुस्त करने की तो  बदलाव तभी नजर आता है, जब नीचे से उठी आवाजें बुलंद होकर शहर में सत्ता के गलियारों में गूंजती।

वेशक मीडिया इसमें बेहद अहम भूमिका निभा सकता है, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है।

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