नालंदा के थानों में जी हुजूरी करते चौकीदार और अपराधी बने डीएम-एसपी

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बिहारशरीफ (नालंदा), मुकेश भारतीय / जयप्रकाश नवीन। किसी भी राज्य की शासन व्यवस्था में गांवों या शहरों की प्रथम पूर्ण सुरक्षा की जिम्मेवारी कोतवालों यानि चौकीदारों और दफादारों पर है। यह कोई आजाद भारत की नई व्यवस्था नहीं है। पुरातन काल से चली आ रही इस व्यवस्था को अंग्रेजी हुकुमत ने भी बरकरार रखा। लेकिन आज यदि हम नालंदा जैसे जिलों में देखें तो थानेदारों ने सब कुछ की धज्जियां उड़ा कर रख दी है।

इससे सब वाकिफ हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हों या भारतीय पुलिस सेवा के कर्णधार। बिहार प्रशासनिक सेवा के करींदों का तो अपना ही आलम है। ये लोग चौकीदारों को लेकर मनमानी ही नहीं बरत रहे बल्कि, एक ऐसा शासकीय व मानवीय अपराध कर रहे हैं, जिसकी कितनी भी सजा कम होगी। क्योंकि इनके इन्हीं अपराधों के कारण गांवों के समरस समाज में आज सर्वत्र जयरामपेशों का जंगल राज की भयावह स्थिति उत्पन्न हो चली है। लोग लुट रहे हैं, पीट रहे हैं, मर रहे हैं, मार रहे हैं। अनेक प्रकार के अवैध धंधों ने गांवों को भी अपनी आगोश में ले रखा है।

वेशक, सदियों से नालंदा की अपनी अलग पहचान रही है। आज भी सीएम नीतिश कुमार के कारण इसकी अलग रौनक होनी चाहिये। जो गांवों में कहीं दिखता नहीं है। विकास अपनी जगह है और सुरक्षा अपनी जगह। सुरक्षा के वगैर विकास कोई मायने नहीं रखते।

आज सुशासन का कोई नुमांईदा यह समझ पा रहा है कि गांवों में ‘जागते रहो’ की पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था थी। चौकीदार-दफादार का गांव की गलियों में, चाहे जाड़ा-गर्मी हो या बरसात। रात में गूंजती इनकी ‘जागते रहो’ की कडक आवाज कहां गुम हो गई।

अब गांव की गलियां हो या बाजार-शहर के मोहल्ले। लोगों की दिन-रात के सांसों की सुध लेने वाला कहीं कोई कोतवाल नजर नहीं आता। सिर पर लाल मुरेठा बांधे हाथों में लाठी-गड़ासे लिए अपनी पहचान बताने वाले चौकीदारों-दफादारों के हालात इतने वद्दतर हो गये हैं कि अब लोग उन्हें थाने के अंदर नौकर, चपरासी, माली, सफाईकर्मी, दलाल आदि से अधिक कुछ नहीं समझते।

सबसे बड़ी बात कि मस्तीखोर थानेदार लोग चौकीदारों को रात अंधेरे थानों में या गंभीर संपर्क सड़क मार्गों पर या फिर दिन उजाले बैंकों समेत अन्य सरकारी गैर सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में तैनात कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण पुलिस कहलाने वाले, बेचारे गांव के रखवाले आज भी दो हाथ की सरकारी डंडा या घर की लाठी की बदौलत सुरक्षा में मुस्तैद दिखते हैं। पुलिस थाना में डाकिया और कैदियों को कोर्ट में ले जाने के काम भी इन्हीं को सौंप दिये जाते हैं।

अब बताईये भला, गोली-बारुद के इस दौर में इनमें कितनी हिम्मत शेष रह गई होगी। लाठी-डंडा की बदौलत तो इनसे गांव की पहरेदारी भी संभव नही रही तो गंभीर स्थानों पर ये किसकी कितनी सुरक्षा कर पायेगें।

सबसे बड़ी बात कि ग्रामीण क्षेत्र में अपराधी व आपराधिक घटनाओं पर नजर रखने के लिए शासन द्वारा गांवों में चौकीदार नियुक्त किये जाते हैं, जिनका काम ग्रामीण क्षेत्रों में घटने वाली आपराधिक घटनाओं पर नजर रखना एवं घटनाओं की सूचना पुलिस को देने की होती है। गांवों में नियुक्त चौकीदार, चौकीदारी करते हुए लोगों की सुरक्षा का अहसास भी दिलाते हैं। चौकीदारों को पुलिस प्रशासन की तीसरी आंख भी समझा जाता और उन्हें कानून व्यवस्था बनाये रखने में सहायक की संज्ञा दी जाती है। लेकिन अफसरों की हिटलरशाही रवैये से गांवों के चौकीदार उनकी गाडिय़ों को साफ करने तक सीमित रह गए हैं। अफसर वर्दी का रौब गालिब करते हुए चौकीदरों को थाने बुलाते हैं और उन्हें अपने नीजि कामों में लगा देते हैं।

वेशक थानेदारो लोग अपने मतलब के लिए इनका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें पीएम एवार्डेड डीएम त्यागराजन साहब और मीडियाई एसपी कुमार आशीष साहब भी शामिल हैं। बिहार सरकार ने कई बार आदेश-निर्देश दिये कि चौकीदार-दफादार से मैन्यूअल के अनुसार ही काम लिये जाये। उन्हें गांवो की गलियों और शहरों के मोहल्लों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाये लेकिन, प्रशासन महकमा माने तब न। और इसे बिना माने किसी भी तरह के अपराध पर अंकुश लगाना संभव नहीं है।

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