नागालैंड में बेगुनाह फरीद की हत्या के पीछे का षड्यंत्र !

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नगालैंड के कस्बे डीमापुर में 23 फरवरी से शुरू हुए घटनाक्रम पर एक नजर डालें। 23 फरवरी को डीमापुर में एक नगा युवती (सेमा कबीले की) फरीद खान नामक अपने एक परिचित युवक के साथ एक सुपर मार्केट के लिए निकलती है।

dimapurबाद में उसके साथ एक होटल में रात बिताती है (शिकायत के अनुसार मजबूरी में), और सुबह थाने में शिकायत दर्ज कराती है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। इस घटना को लेकर डीमापुर में राजनीतिक वातावरण गर्म होना शुरू होता है।

कॉलेज के छात्रों की भीड़ यह मांग उठाती है कि या तो आरोपी को सजा दो या उसे हमें सौंप दो, हम उसे अपनी परंपरा के अनुसार सजा देंगे।

4 मार्च को जिलाधिकारी का घेराव किया जाता है। 5 मार्च को जेल से कथित बलात्कारी को निकाल लिए जाने तथा उसे चौराहे पर फांसी के लिए ले जाने की घटना घटती है। रास्ते में ही पिटाई के कारण फरीद खान की मौत हो जाती है।

अब इस घटना के पीछे की कहानी में चलें। दरअसल यह हादसा राज्य के सियासी और सामाजिक जीवन में सुलग रही चिनगारी का ही भड़का हुआ रूप है। प्रदेश के मुख्यमंत्री जेलियांग असंतुष्ट गतिविधियों से जूझ रहे हैं। असंतुष्ट गुट के विधायकों ने डीमापुर के छात्रों के आक्रोश में मुख्यमंत्री को हटाने का एक अच्छा मौका देखा। उनकी कोशिश यह थी कि छात्रों का प्रदर्शन काबू से बाहर हो जाए और पुलिस को गोली चलानी पड़े। गोलियां चलतीं और छात्रों की मौत होती तो सीएम को अपने पद से इस्तीफा देना ही पड़ता। फिर नगा कबीलों की आपसी लड़ाई भी इस घटना में साफ दिख रही है।

डीमापुर में असम से आए मुसलमानों की संख्या बढ़ती जा रही है, इससे सेमा कबीले के लोगों को कोई खास आपत्ति नहीं है। इन मुसलमानों में से कई ने सेमा कबीले की युवतियों से शादी कर ली है। इनकी संतानों को एक नया नाम ‘सुमिया’ दिया गया है।

सुमिया में सेमा और मियां (यहां मुसलमान के लिए प्रचलित संबोधन) को मिलाया गया है। नगाओं के दूसरे कबीलों को सेमा लोगों के इस आचरण से घोर आपत्ति है और इस कारण सेमा कबीले से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहता है।

एक पत्रकार ने ठीक ही इस तरफ ध्यान दिलाया कि बाकी नगालैंड में ग्राम पंचायतों का शासन चलता है। गांव प्रमुख के आदेश की अहमियत वहां मुख्यमंत्री के आदेश से कम नहीं है। लेकिन डीमापुर इसके बिलकुल उलट है। वहां गांव प्रमुख की तो बात ही दूर, मुख्यमंत्री को भी अपने आदेश का पालन किए जाने का भरोसा नहीं होता।

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