नरेन्द्र मोदी को संघ का पिछड़ा बताने के मायने

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राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ, उनकी बनाई पार्टिया जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी से लेकर हिन्दू देवियों के हथियार बंद और नरमुंडों को थामे दर्जनों हाथों की तरह दूसरे दर्जन भर से ज्यादा संगठन और संस्थाओं के इतिहास को जो थोड़ा बहुत भी जानते हैं, उन्हें देश में दलितों समेत पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उन्मादी कार्रवाईयां करते देखा है. वे संविधान के तहत अपने उंच-नीच के सामाजिक ढांचे को खत्म करने की किसी भी कोशिश का हर स्तर पर विरोध करते रहे हैं.

अस्सी के दशक में गुजरात में आरक्षण विरोधी दो बार भीषण आंदोलन हुए और मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार को दो बार आसानी से पराजित किया. बिहार में कर्पूरी ठाकुर के शासनकाल में 1978 में जनता पार्टी के घटक के रूप में जनसंघ ने मुंगेरी लाल आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर पिछड़े वर्ग और अति पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण के फैसले का जबरदस्त विरोध किया और कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिरा दी.

कर्पूरी ठाकुर को सड़कों पर मां-बहन की गालियां दी गई.खून खराबा हुआ. उत्तर प्रदेश में भी इसे दोहराया गया. कर्पूरी ठाकुर को हटाकर दलित जाति के राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाकर आरक्षण विरोधी सरकार बनाई गई. भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि पिछड़ों के बीच जातिवाद और पिछड़ा बनाम दलित की लड़ाई की एक रेखा खींचने में मुख्य़त सवर्ण आधार वाली पार्टियों महारथ हासिल रही है.

50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाली पिछड़ी जातियों को समानता का दर्जा देने का जब कभी प्रयास किया गया है तो उसके विरोध के लिए हिन्दुत्व का ही सहारा लिया गया है और मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुत्ववाद के हमले तेज हुए हैं.

अस्सी के दशक में गुजरात से लेकर बिहार के जमशेदपुर दंगे को याद किया जा सकता है. पिछड़ों के लिए समानता के अवसर और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले का एक सीधा संबंध है और उसका अलग से अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए. गुजरात में आरक्षण के विरोध में मंदिरों में भी ताले लगाए गए थे.वैसे भी विशेष अवसर देने के फैसलों के विरोध में मठों मंदिरों की भूमिका का मुक्कमल अध्ययन किया जाना बाकी है.

यहां उल्लेखनीय है कि हमलों की जगह दंगे और अवसर की जगह आरक्षण का शब्द भी प्रचार रणनीति का हिस्सा है. जब 1990 के दशक में बतौर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने केन्द्रीय सेवाओं में वी पी मंडल आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत अवसर देने का फैसला किया तो लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली और विश्वनाथ प्रताप सिह की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. जनता पार्टी की प्रदेश में जिस तरह से अस्सी के दशक में विशेष अवसर देने के फैसले का विरोध करते हुए सरकार गिरायी गई थी उसे दोहराया गया.

narender_modi_rssयही नहीं 1980 के दशक में ही राम मंदिर के लिए अभियान की शुरूआत और आरक्षण विरोध के दौरान जो उग्रता पैदा हुई थी उसे इस अभियान की तरफ मोड़ने के लिए संघ ने कई नये संगठन बनाए.

1990 के दशक के शुरूआती वर्षों में एक तरफ हिंसक आरक्षण विरोध और दूसरी रथ यात्रा के उन्मादी माहौल में मुसलमानों के खिलाफ देश भर में हमले हुए. इसे साम्प्रदायिक दंगे के रूप में हम याद करते हैं.

ये सब तो हाल की जानकारियां है. यदि संघ के निर्माण के इतिहास पर नज़र डालें तो वह दलितों के राजनीतिक उभार की प्रतिक्रिया में ही बना था. महाराष्ट्र में डा. भीमराव आम्बेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र के कट्टरपंथी ब्राहम्णों ने राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की स्थापना की थी.

यहां दूसरा पहलू भी अध्ययन की मांग करता है कि क्या अल्पसंख्यकों के अधिकारों व समानता के अवसर का विरोध और उनके खिलाफ तुष्टिकरण के आरोप लगाना पिछड़े-दलित वर्ग के प्रति अपने दृष्टिकोण को ढंकने की कोशिश करना होता है?

जबकि वास्तवकिता है कि अल्पसंख्यकों के समान अवसरों और अधिकारों का विरोध वास्तव में पिछड़े और दलितों के लिए अवसरों का विरोध करना है. क्योंकि यह विश्लेषण किया जाता है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा और उग्रता का स्तर निर्मम होने की वजह यह है कि भारतीय समाज में हिन्दुत्व को नाकारकर दूसरे घर्मों को स्वीकार करने वाली जातियां वर्ण व्यवस्था में निम्न व अछूत कहीं जाने वाली जातियां ही रही है. लेकिन निर्ममता के उस स्तर को धर्म की आड़ में छुपाने की कोशिश की जाती है.

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