नफे-नुकसान के बीच राजद-जदयू विलय की बात बेमानी!

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राज़नामा.कॉम। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद द्वारा महाविलय की जोर आजमाइश उस समय बेमानी लगती है,जब सपा अपने नफे की सोच इस दलदल से दूर रहना चाहती है और तब जब लालू प्रसाद द्वारा जीतन राम को महाविलय में एक मांझी बनाने की बात की जाती हो।

lalu_nitishमतलब साफ़ है। लालू प्रसाद को फरक पड़े या न पड़े नीतीश कुमार के पेशानी पर बल पड़ने लगे हैं।

राजनीति में शिखर पुरुष के रूप में कभी निरुपित किये जाने वाले नीतीश कुमार का सफ़र उस जमीन पर आ टिकी है,जहाँ दलदल ही दलदल है।

नीतीश कुमार को जनता ने उस वक़्त तक सिरमौर बना रखा था जबतक वे इस्तीफा नहीं दिए थे। फिर उनके चारण सलाहकारों ने उनका चित ऐसे अस्थिर कर दिया कि आज वे अजब-अजब फैसले लेते आ रहे हैं।

नीतीश कुमार की स्थिति तब और नीचे दिखती है जब वे महाविलय के लिये पटना-दिल्ली-पटना करते हैं और नतीजा सिफ़र होता है।

अस्थिर चित वाले व्यक्ति के सफलता में हमेशा संदेह होता है ये बात नीतीश कुमार पर पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है।

अगर ये मान भी ले कि महाविलय सफल हो भी जाती है तो क्या नीतीश कुमार की शख्सियत उतनी वजनदार होगी? क्या नीतीश कुमार की यह जोर आजमाइश उनके पुराने छवि को लौटा देगी?

क्या नीतीश कुमार राजनीति के इस चौसर पर लालू प्रसाद के लिए मोहरा तो नहीं बन गए हैं? क्या लालू और नीतीश में अंतर नहीं है?

लालू तो खाली हाथ महाविलय में आ रहे हैं तो उन्हें क्या उतना ही फरक पड़ेगा जितना नीतीश को?

अगर हम सपा और राजद से इतर अगर बिहार में जद यू की बात करें तो ये दल अपने आप में सक्षम थी। पर लालू की दोस्ती ने उसी वक्त इसके जड़ में मट्ठा का काम किया, जिससे आज पार्टी के आलाकमान के पेशानी पर बल दिखाई दे रहे हैं और पटना-दिल्ली-पटना करना उनके लिए मजबूरी नजर आ रही है।

बहरहाल, आगे देखना दिलचस्प होगा कि तमाम झंझावतों से निकलने में खुद की राजनीति को निकाल पाने में सफल रहे बिहार के लालू और नीतिश सरीखे दो दिग्गज आगे क्या रणनीति अपनाते हैं। 

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