धाराशाही होते मीडियाई सैनिक

Share Button

भारतीय मीडिया का समग्र ढांचा कहीं न कहीं पाश्चात्य मीडिया के अनुसरण पर आधारित है। इतिहास गवाह है, मीडिया शब्द को वैश्विक स्तर के अनेक पत्रकारों ने खून-पसीने से सींचा है। प्रख्यात द टाईम्स ने एक सिद्धान्त बनाया था कि समाचार पत्र भण्डाफोड़ से जीवित रहते हैं।

द टाईम्स को सरकार की आवाज कहा जाता था। सरकारों द्वारा जब द टाइम्स को अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई थी तब इसने इस सिद्धान्त को बनाया था। अमेरिका के निक्सन जैसे राष्ट्रपति को वाशिंगटन पोस्ट ने इस्तीफा देने पर विवश कर दिया था। साहस, दिलेरी, हौसला, हिम्मत, निडर, अटल आदि शब्द पहले पत्रकारों और मीडिया के लिए इस्तेमाल किये जाते थे।

अब ये कुछ के लिए विलोमार्थी बनकर रहे गये है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली एवं भारत सरीखे देशों में मीडिया का निडर इतिहास स्पर्णाक्षरों में अंकित है। हमारे देश के पत्रकार अपने फेसबुक वाल पर जिस अंदाज में लिख रहे है क्या उनका वहीं अंदाज उनके माध्यम में है, कतई नहीं? इससे तो यही अनुभूति हो रही हैं न कि इन तथाकथित मीडियाई सैनिकों को जिस मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिये उसी मजबूती से ये अपने माध्यमों में खड़े नहीं हो पा रहें।

बहुधा ऐसा सिर्फ इसीलिए है क्योंकि सरकारी कानून इनके आगे रोड़ा बन रहा है और फेसबुक अथवा सोशल मीडिया पर यह कानून मायने नहीं रखता। कुछ पत्रकार तो कानून के आगे मजबूर है तो तो कुछ ने तो अपना ईमान बेच रखा है। पत्रकारों को जनहीत की जगह ग्लैमर और धनपशुओं के धन और सरकारी फायदे से कुछ ज्यादा ही सरोकार हो चुका है। अभी दिव्य संदेश ने यूपी के पत्रकारों के कारनामें खोले थे तो बिहार का हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला सबके सामने है। नीरा राडिया और जी-न्यूज के सम्पादकों के कारनामें अभी पुराने भी नहीं हुये। और सैकड़ों मामलें मधुमक्खियों के छाते पर अभी भी भीनभीना रहे हैं? क्या मीडिया व्यापार बन चुका है? क्या देशहीत से ज्यादा पैसा और विज्ञापनहीत मायने रखने लगा है?

आजादी की लड़ाई के समय जिस मीडिया ने घुटने नहीं टेके वह आपातकाल के समय से टेकने लगी है। देश में अपराधी हत्या का करोबार त्याग, शैक्षिक संस्थाओं और एनजीओ आदि को अपने कमाई का जरिया बनाने लगे है। मंहगाई की मार ने गरीब के जबान पर ताला लगा दिया है। भारतीय बुद्धिजीवी चिन्तामग्न है कि कोई भ्रष्टाचार नापने का यंत्र बने। ताकि भ्रष्टाचारियों का विनाश हो सके। अथवा कोई अवतार हो वो चाहे किसी धर्म से हो और भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद आदि खत्म हो। लेकिन बीच-बीच में बम ब्लास्ट और घोटालों के पिटारें सामने आते ही जा रहे हैं। समानता का गला कबका घोटा जा चुका है और लाइसेंसी राज मजबूती से चल ही रहा है।

एक ही कोर्स के अनेकों फीस है। एक ही पद के अनेकों भर्ती नियम है। जनता के टैक्स पर सरकार और सरकारी लोग ऐश फरमा रहे है। अफसरशाही, चमचागरीरी, हरामखोरी अपने सबाब पर है। ज्यादातर सरकारी कर्मचारी एचआरए भी ले रहे है और सरकारी आवास में डेरा भी डाले हुये है। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन और प्राइवेट कालेज एवं संस्थाओं के वेतन के अनुपात में जमीन आसमान का अन्तर आ गया हैं।

मनरेगा, एनआरएचएम और अनेकों योजनाओं में आ रहा भ्रष्टाचार सबके सामने है और इसमें एन0जी0ओ0 और अधिकारियों की बंदरबांट में निरंतर वृद्धि भी जारी है। वोटबैंक का जीन राजनीति का खंभा बन गया है। कौआ मोती चुन रहा है और हंस दाने-दाने को मोहताज है। पहले चमचागीरी, घूसखोरी जैसे शब्द जबान लड़खड़ा देते थे। लेकिन आज के परिवेश में सच्चाई बोलने में मीडिया सहीत सबकी जबाने लड़खड़ाने लगी है। मीडिया तबका पुंजिपतियों के विज्ञापन के अंधकार तले शान्त है।

अकबर इलाहाबादी के दो शेर मीडिया में खासे चर्चित है एक है ”खीचों न कमानों को न निकालों तलवार, जब तोप मुकाबिल हो तो निकालों अखबार“ और दूसरा ”जिन्दगी देखी कामील यकीं आया, उसे जीना नहीं आया जिसे मरना नहीं आया“।

vikash

……लेखकः विकास कुमार गुप्ता पीन्यूज़.इन के संपादक हैं।

Share Button

Relate Newss:

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र पर FIR को लेकर फेसबुक पर कड़ा विरोध जारी
...और राजगीर की मीडिया को यूं ऐड़ा बना पेड़ा खिला गया रोपवे प्रभारी
मांद में ही मात गये सांसद
रांची के ऐसे पत्रकार संगठन के अध्यक्ष और अखबार के संपादक पर मुझे शर्म है
अमेरिकी राष्ट्रपति और रुसी पत्रकार ने एक दूसरे की ईमानदारी पर उठाए यूं सवाल
सजायाफ्ता के हाथ खुले और विचाराधीन के हाथों हथकड़ी !
सुशासन बाबू ने फर्जी डिग्रीधारी गुप्तेश्वर पाण्डेय को बनाया डीजी
लालू स्तर तक जा गिरे हैं दादरी और दलितों की हत्या पर मौन मोदी : अरुण शौरी
पटना मीडिया पर कथित हमले का सच, खुद तेजस्वी यादव की जुबानी
ब्लैक लिस्टेड 'राष्ट्रीया' ही नाम बदल कर रहा सीएम रघुवर की 'फ्रॉड ब्रांडिंग'

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...