धड़ाधड़ खुल रहे रीजनल चैनलों की कहानी, एक्सपर्ट वासिंद्र मिश्र की जुबानी

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खतरे की शुरुआत तभी होती है, जब आप खबर में अपना पर्सनल एजेंडा डालने की कोशिश करते हैं या किसी के कहने पर किसी के एजेंडा को अपने माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं, तभी खतरा होता है। सबसे बड़ा खतरा पॉलिटिक्स की ओर है अथवा जो सरकारें बन रही हैं और बिगड़ रही हैं, उनसे है। आज सरकारी स्तर पर जीरो टॉलरेंस की स्थिति हो गई है…..

राजनामा.कॉम। नई दिल्ली के एक प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा आयोजित विषय ‘रीजनल मीडिया: खतरा, खबरें और कमाई’ रखा गया था, जिसमें मीडिया के दिग्गजों ने अपने विचार व्यक्त किए।

इस पैनल डिस्कशन में ‘नेटवर्क18’ (हिंदी नेटवर्क) के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री, सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क’ के ग्रुप एडिटर मनोज मनु, ‘जनतंत्र टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ वासिंद्र मिश्र, इंडिया न्यूज’ के चीफ एडिटर (मल्टीमीडिया) अजय शुक्ल, ‘पीटीसी नेटवर्क’ के मैनेजिंग डायरेक्टर-प्रेजिडेंट रबिंद्र नारायण और ‘बीबीसी गुजराती’ के एडिटर अंकुर जैन शामिल रहे।

पैनल डिस्कशन के दौरान अभिषेक मेहरोत्रा द्वारा रीजनल मीडिया पर खतरे के बारे में पूछे जाने पर वासिंद्र मिश्र का कहना था, ‘मुझे लगता है कि यदि आप खबर तक सीमित हैं, खबर को निष्पक्षता से दिखा रहे हैं और उसके पीछे आपका कोई स्वार्थ अथवा एजेंडा नहीं है तो किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं है।

वासिंद्र मिश्र का कहना था, ‘जब हमने अपने करियर की शुरुआत की थी, तो उस समय विचारधारा की पत्रकारिता होती थी और वैचारिक प्रतिबद्धता की बात कही जाती थी, लेकिन उस समय टॉलरेंस भी था। यानी जो लोग आपकी विचारधारा को फॉलो नहीं करते थे, उनको भी नौकरी अथवा अपना कारोबार करने का पूरा अधिकार होता था। उस समय सत्ता में बैठी हुई पार्टी अपनी विचारधारा के विरोधी लोगों को भी बिजनेस करने अथवा अपना काम करने की छूट देती थी।

धीरे-धीरे कुछ वर्षों से यह देखने को मिल रहा है कि अगर आप एक विचारधारा विशेष को फॉलो कर रहे हैं, तब तो आपको बिजनेस करने का अधिकार है, नौकरी करने का भी अधिकार है अपना एजेंडा भी आगे बढ़ाने का अधिकार है। आपको संस्थान से भी सपोर्ट मिलेगा और राजनीतिक संगठनों का भी सपोर्ट मिलेगा।

अगर आप थोड़ा भी क्रिटिकल होने की कोशिश करेंगे या थोड़ा आब्जेक्टिव होने की कोशिश करेंगे, तो आपके खिलाफ इतनी तरह की कार्रवाई शुरू कर दी जाएंगी कि जो स्थानीय गुंडे हैं, वो तो बाद में आएंगे, जो ‘सरकारी गुंडे’ हैं, वही आकर जीना हराम कर देते हैं और आप एक छोटा बिजनेस भी नहीं कर पाते हैं, मीडिया बिजनेस चलाना तो बहुत बड़ी बात है।’

वासिंद्र मिश्र का यह भी कहना था, ‘हैरेसमेंट का तरीका यह नहीं है कि कोई सड़क पर जाते समय आपकी गाड़ी रोक दे अथवा आपकी पिटाई करवा दे। बल्कि हैरेसमेंट का तरीका ये है कि जब आप लाइसेंस के लिए अप्लाई करते हैं तो आपको लाइसेंस नहीं मिलेगा। अगर लाइसेंस मिल भी गया तो आपको न्यूजप्रिंट का कोटा अलॉट नहीं होगा।

यदि न्यूजप्रिंट का कोटा अलॉट हो गया तो आपके अखबार/चैनल का इम्पैनलमेंट नहीं होगा। इम्पैनलमेंट के बिना आपको किसी भी तरह का सरकारी अथवा कॉरपोरेट विज्ञापन नहीं मिलेगा। तो जब आपको किसी भी तरह की सरकारी मदद अथवा सरकारी सुविधा नहीं मिलेगी और आपको एक लीगल तरीके से बिजनेस करने की इजाजत नहीं मिलेगी, तो आप सबसे बड़े पीड़ित हो जाते हैं।’

यह पूछे जाने पर कि आज के समय में नेशनल मीडिया अपने आप को रीजनल मीडिया के रूप में विस्तार दे रहा है। जितने बड़े मीडिया ग्रुप हैं, सब अपने रीजनल चैनल लेकर आ रहे हैं। एक तरफ तो सब कह रहे हैं कि इसमें कमाई नहीं है, इसके बावजूद रीजनल मीडिया का इतनी तेजी से विस्तार क्यों हो रहा है? आखिर जब कमाई नहीं है और खतरा भी ज्यादा है तो ऐसा क्या है कि सब रीजनल मीडिया की ओर भाग रहे हैं?

इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं इससे पहले दो मल्टीचैनल ऑर्गनाइजेशन में काम कर चुका हूं, जिनके 16 चैनल और 20 चैनल हुआ करते थे। उस समय जब हम रेवेन्यू का मंथली अथवा क्वार्टरली रिव्यू किया करते थे, तो वो चैनल घाटे में चलते दिखाई देते थे, लेकिन यदि हम कुल रेवेन्यू यानी EBIDTA (earnings before interest, tax, depreciation and amortization) देखते थे तो वो कई क्षेत्रीय भाषा के चैनल फायदे में चलते दिखाई देते थे।

ऐसे में मैंने अपने सेल्स हेड से जब पूछा कि यहां मंथली तो घाटा दिखाते हो, जबकि क्वार्टरली दिखाते हो कि इतने का प्रॉफिट है, जबकि हिंदी रीजनल चैनल सभी घाटे में दिखाई देते हैं, आखिर इसका क्या कारण है?

इस पर उनका कहना था कि हमें कनाडा से रेवेन्यू आता है। इसलिए इस तरह के चैनल वहां की सरकार कि चिंता नहीं करते हैं, क्योंकि इनको बाहर से बहुत रेवेन्यू आता है। लेकिन, यही अगर हिंदी रीजनल चैनल में बिजनेस करेंगे तो इन्हें स्थानीय नेताओं की ‘चमचागिरी’ करनी होगी। इसके लिए इन चैनलों को वहां के लोकल केबल आपरेटर, जिसका वहां पर एकछत्र राज्य है, उसकी भी हां में हां मिलानी होगी, नहीं तो वो उनका चैनल नहीं लगने देगा।’

वासिंद्र मिश्र ने कहा, ‘एक नेशनल चैनल पंजाब में अपना पंजाबी चैनल लॉन्च करना चाहता था। वह बहुत बड़ा मीडिया हाउस है। उन्होंने सबकुछ सेटअप लगा लिया। यानी स्टूडियो बना लिया और नियुक्ति प्रक्रिया भी पूरी हो गई, लेकिन वहां का केबल ऑपरेटर तैयार नहीं हुआ।

क्योंकि वहां की सरकार उस नेशनल चैनल से नाराज थी और वह केबल ऑपरेटर उस समय के सत्तारूढ़ दल के साथ जुड़ा हुआ था। ऐसे में वह नेशनल चैनल वहां पर अपना रीजनल चैनल लॉन्च नहीं कर पाया। उसे अपना स्टूडियो बंद कर वापस दिल्ली लौटकर आना पड़ा। तो रीजनल चैनलों की ये हालत है।

चाहे पंजाब हो, तमिलनाडु हो, कर्नाटक हो या हैदराबाद हो, चैनलों को वहां की सरकार की ‘दया’ पर निर्भर रहना पड़ता है। इसमें पंजाबी चैनल अपवाद हैं, क्योंकि पंजाबी का रेवेन्यू मॉडल अलग है।’

वासिंद्र मिश्र ने कहा, ‘जो लोग मल्टीलैंग्वेज चैनल चलाते रहे हैं, उनको शायद पता होगा कि यदि आप पंजाबी चैनल चला रहे हैं तो आपको अपने देश अथवा राज्य से जितना रेवेन्यू मिलता है, उससे सौ गुना ज्यादा ओवरसीज बिजनेस से मिलता है। इस तरह के ट्रेंड को पंजाबी चैनल तो अफोर्ड कर सकते हैं, लेकिन अन्य नहीं।’

मीडिया में सोर्स ऑफ रेवेन्यू के बारे में वासिंद्र मिश्र का कहना था, ‘पहले इसमें पारंपरिक रूप से चार तरीके थे। जिनमें रिटेल एडवर्टाइजमेंट, कॉरपोरेट एडवर्टाइजमेंट, गवर्नमेंट एडवर्टाइजमेंट और चौथा इवेंट शामिल होता था। इसके अलावा पांचवां रेवेन्यू का सबसे बड़ा जरिया रियल एस्टेट था। ‘नोटबंदी’ और ‘जीएसटी’ जैसी नई व्यवस्था आने के बाद कॉरपोरेट विज्ञापन काफी प्रभावित हुए।

इससे कॉरपोरेट विज्ञापनों का 50 प्रतिशत रेवेन्यू कम हो गया। ऐसे में रेवेन्यू के मामले में रियल एस्टेट बेकार हो गया। बिल्डर जब अपना पैसा नहीं निकाल पा रहा है तो ऐसे में वह बिजनेस क्या देगा। अब रिटेल ऐड और सरकारी ऐड की बात करें तो जीएसटी की वजह से रिटेल ऐड भी बंद हो गया तो ऐसे में कुल दारोमदार सरकारी बिजनेस पर है।

सरकारों को भी ये बात पता है और वे यही चाहती भी थीं कि मीडिया उनके सामने घुटने टेककर रहे। उनके हिसाब से खबरे छापे। अगर खबर नहीं छपेगी तो वे विज्ञापन रोक देते हैं। यह आज से नहीं, बल्कि बहुत पुराना फंडा है। कुछ सरकारें सीधे ऐसा करती हैं, तो कुछ घुमा-फिराकर ऐसा करती हैं।’

वासिंद्र मिश्र के अनुसार, ‘आज की तारीख में चाहे नेशनल चैनल हो अथवा रीजनल चैनल हो, सभी की निर्भरता सरकारी बिजनेस पर है। फिर चाहे वो प्रिंट हो अथवा टेलिविजन। रही बात नेशनल चैनलों के रीजनल मीडिया की तरफ जाने की तो इस तरह उन्हें सरकारों के साथ ट्यूनिंग में आसानी होती है। इसके अलावा उन्हें डबल स्टैंडर्ड मेंटेन करने में भी सुविधा होती है। वो पीआर की जितनी भी स्टोरी होती हैं, उन्हें रीजनल में चलवा लेते हैं और नेशनल में चार लोग बैठकर स्टूडियो से दिन भर पाकिस्तान के खिलाफ ‘बम’ फेंकते रहते हैं।

हालांकि ऐसे कई पत्रकारों ने कभी बॉर्डर भी नहीं देखा होगा, लेकिन स्टूडियो में बैठकर वो पूरे पाकिस्तान को ‘नेस्तनाबूद’ कर देते हैं और कहते हैं कि वे पेड न्यूज नहीं चलाते हैं। मेरा कहना है कि उन्हें पेड न्यूज चलाने की जरूरत क्या है।

उनका रीजनल प्लेटफॉर्म है, जिस पर दिनभर वे यही चलाते हैं। इसलिए उनके लिए जरूरी है कि एक ऐसा प्लेटफॉर्म चाहिए, जहां पर वे सरकार और राजनीतिक दलों को खुश करके पैसे भी लें और नेशनल लेवल पर ऐसा प्लेटफॉर्म चाहिए, जिससे वे अपना एजेंडा बैलेंस करते रहें।’

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