‘लालू मोबाइल खबर’ और होटरवार जेल की कुछ हकीकतें

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राजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय)

झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के प्रथम पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित हुई है। खबर का शीर्षक है… मोबाइल से पार्टी चला रहे हैं लालू प्रसाद। इस खबर के लेखक हैं संवाददाता अजय शर्मा । खबर उनके नाम से बाइलाइन छापी गई है। इस खबर का आधार खुफिया विभाग द्वारा सरकार को सौंपी गई एक रिपोर्ट को बनाया गया है।

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हांलाकि जेल आईजी शैलेन्द्र भूषण के अनुसार बहरहाल सजायाप्ता लालू जी  के पास मोबाइल होने की उन्हें कोई सूचना नहीं है और नहीं जेल प्रशासन की ओर से उन्हें कोई रिपोर्ट दी गई है। जबकि खबर में उल्लेख है कि लालू प्रसाद जिस 30 सितंबर के दिन से जेल में बंद हैं, उस दिन से ही वे तीन अलग-अलग मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। इनमें से एक मोबाइल थ्री जी सेवा का है। जेल में जैमर लगा है,जो काम नहीं कर रहा है। इसे जेल के अधिकारियों ने ही बंद कर दिया है। इस मामले में एक जेल अधिकारी की भूमिका संदिग्ध है।

hotwar jailवेशक सबसे प्रमुखता से प्रकाशित यह खबर न तो सनसनीखेज है और न ही इसमें कोई नयापन ही है। सच का दूसरा पहलु यह भी है कि इस खबर में सीधे लालू प्रसाद को टारगेट करने की कोशिश की गई है। यहां पर स्पष्ट कर दूं कि टारगेट शब्द का प्रयोग करने के पिछे हमारी मंशा समाचार लेखक पर सबाल उठाना नहीं है, बल्कि सूचना पर है। उसे प्रस्तुत करने का अंदाज में धुंधलापन हो सकता है। क्योंकि होटरवार केन्द्रीय जेल में पैसा और पावर बोलता है। यह सब जानते हैं। जिसके पास पैसा या पावर नहीं है, वे आरोपी/कैदी इस जेल में जानवर से भी वद्दतर जीवन जीते हैं। उसे इस प्रकार से तथा इस प्रकार का खाना दिया जाता है कि उसे कुत्ते भी सूंघ कर छोड़ दे। वहां पीने के पानी और नाली के पानी में कोई ज्यादा अंतर दिखाई नहीं देता है। बाथरुम के गलियारे में फर्श पर सोने के तक के लाले पड़े होते हैं। कोई भी सुविधा की राहत मात्र पाने के लिये निश्चित राशि का भुगतान करना होता है। यहां चिकित्सा सेवा भी महज दिखावा ही है। चिकित्सक गण वीअइपी लोगों के फर्जी मेडिकल प्रमाण देने और उन्हें रिम्स या एम्स में सुविधा मुहैया करने के जुगाड़ करने मेंअधिक  जुटे रहते हैं।  आम कैदियों-आरोपियों को दवा का जुगाड़ ऊंची कीमत पर प्रायः बाहर से करना पड़ता है।  या फिर अंदर भी मुंहमांगी रकम चुकाने पड़ते हैं। 

समूचे जेल में चुनिंदा कैदियों का जेल प्रशासन के साथ एक नेटवर्क बना है, जो उगाही के हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं। हर वार्ड में जेल प्रशासन की ओर से दो-तीन कैदियों को रखवाला बना दिया जाता है और उसे एक निश्चित रकम बतौर हफ्ता चुकाना पड़ता है। जो जितना अधिक हफ्ता वसूल कर देता है, उसे उतना ही अधिक कमाई वाला वार्ड का इंचार्य बनाया जाता है। वहां कमोवेश हर सामान्य वार्ड में दो-चार मोबाइल और दस-बीस सीम रहना आम बात है। जेल की ओर से कैदियों को जेल मैन्यूअल के अनुसार अपने वकील या घर वालों से बात की सुविधा कहीं दिखाई नहीं देती। सब इन्टर्नल सिस्टम से ही मनमानी कीमत पर खातिरदारी उपलब्ध होती है। इसमें प्रायः सभी मोबाइलधारी जेलकर्मी शामिल होते हैं। मोबाइल भी उसका…सीम भी उसका..और रोज मोटी कमाई भी उसकी।

जो कैदी या आरोपी इनके मनमाफिक नहीं चलते, उनकी यातनायें देख कर दिल दहल जाता है…रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

16Jail2मैं यह सब इतनी मजबूती के साथ इस लिये लिख रहा हूं कि पिछले साल मैं जेल के उन जानवरों के दंश झेल चुका हूं, अपनी आंखों से सब कुछ देख चुका हूं। मैंने अपनी www.raznama.com  वेब न्यूज़ चैनल में रांची के अखबारों की प्रसार संख्या और उसे भारी मात्रा मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों पर सबाल उठाया था। इसी क्रम में एक अंग्रेजी अखबार के स्थानीय बिल्डरिया छाप फ्रेंचाईजी एवं सीधे भाजपा के सीएम अर्जुन मुंडा के करीबी नेता ने खबर की एवज में 15 लाख की रंगदारी मांगने का मनगढ़ंत आरोप लगा कर जेल भिजवा दिया। मुझ पर आरोप है कि मैंने कई बार भाजपा सांसद चंदन मित्रा के उस अखबार के स्थानीय पार्टनर से उसके ऑफिस में गया और 15 लाख रुपये की रंगदारी मांगता रहा और धमकी दी कि 15 लाख नहीं देने पर उसे एक चर्चित हत्या कांड  में फंसा दूंगा। पुलिस का क्या था..अपने मालिक का जैसे आदेश हुआ, दूम हिलाता रात के 11:30 बजे मेरे मकान के छत पर चढ़ कर उठा लिया और जीरो सेकेंड के भीतर सारी प्रक्रिया पूरी करते हुये सुबह 10 बजे के करीब जेल भेज दिया। अब तक अजनबी रहे मुद्दई एवं दो गवाह की कृपा से 14 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। जाहिर है कि पुलिस हिरासत और जेल की पीड़ा का मुझे अच्छा खासा ज्ञान हुआ। चूकि मामला अभी न्यायालय में लंबित है, इसलिये रांची के तात्कालीन एवं वर्तमान एएसपी और जेल प्रशासन को धन्यवाद देना फर्ज हो जाता है। सच सब जानते हैं। सारे अखबार के धुरंधर भी और मुझे जानने-समझने वाले भी। पुलिस की अंतरात्मा भी इससे इतर नहीं है।

kodaयह सब लिखने के पिछे मात्र मकसद यह है कि जेल जानवरों के लिये नहीं बना है। वहां रहता और रखता आदमी ही है। वहां का सिस्टम ही अंग्रेजों के द्वारा लादे गये जेल मैन्यूल के भी उलट है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं चाईबासा के सांसद मधु कोड़ा की कुछ दबंग कैदियों संग जेलकर्मियों द्वारा की गई धुनाई को याद किया जा सकता है। आखिर मामला भी तो जेल मैन्यूअल के अन्तर्गत सुविधा निर्गत करने का ही था न। या फिर सुविधाओं को लेकर लेन-देन का रहा होगा। अनेक कैदियों ने तो मुझे कुछ ऐसा ही आंखो देखा हाल सुनाया।

आज लालू प्रसाद के मोबाइल रखे जाने की बात की जा रही है। यह नहीं कहता कि वे नहीं रखते भी होगें। आखिर उनके दल के समर्थन से झारखंड की हेमंत सरकार चल रही है। वे अपने दल के सर्वोसर्वा लोकप्रिय नेता हैं।

लेकिन, जेल मैन्यूअल को लेकर सिर्फ लालू पर हो-हल्ला क्यों ? वहां तो कई आदर्शवादी मीडिया वाले भी जाकर जेलाधिकारों संग चुस्की लेने जाते रहते हैं। उन्हें भी तो कोई नहीं रोकता है टूजी-थ्रीजी ले जाने से।

lalu-prasadअब रही बात लालू प्रसाद से मिलने को उतावले उनके चहेतों की भीड़ की, तो अमूमन वहां भीड़ कब कम रहती है। चूकि अभी एक हाईप्रोफाईल नेता और उनसे जुड़े तंत्र की सुर्खियां बेचने का धंधा हो रहा है तो सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है। कुछ दिनों बाद सामान्य दिनों की तरह मीडिया को मोतियाबिंद हो जायेगा। raghubansh singh

आम तौर पर जेल गेट पर भीड़ भरी रहती है। बाहर खड़े जेल के पहरेदारों को सेवानुरुप मेवा देकर अंदर कुछ भी दे ले सकते हैं। दवा-दारु, मांस-मछली, चरस, गांजा, अफीम, खैनी, गुटखा, भांग, गुटखा, खैनी, सिगरेट से लेकर चूल्हा-चौका तक। गैस सलेंडर और पीने के पानी के जार तक अंदर जाता है। वहां साधन सम्पन्न कैदियों/आरोपियों का अपना अलग किचेन होता है। सामान्य कैदियों के खाना कभी वे भूल से छूते तक नहीं है। उन्हें सभी सुविधाओं के लिये पेड करना पड़ता है। सुबह शाम का माजरा तो और भी मजेदार होता है। 

बहरहाल, हम किसी एक अखबार में प्रकाशित खबर का पोस्टमार्टम नहीं कर रहे हैं, अपितु यह सबाल उठाना अधिकार बन जाता है कि नेताओं की तरह मीडिया की यह दो स्वरूप  क्यों ? खास कर उस परिस्थिति में जब मीडिया लालू प्रसाद को लेकर यहां तक लिख-दिखा रहा हो कि वे कब सोते हैं, कब पेशाब-पैखाना करने जाते हैं, उन्हें कब खटमल काटता है, कब मचछर तंग करता है। वे पूजा कब से कब करते हैं, वे गीता कब से कब पढ़ते हैं, कब वे किताबें लेने लाइब्रेरी जाते हैं। किससे कब किस तरह मुलाकात करते हैं आदि आदि।

आज जिस सिस्टम को लेकर उंगलियां उठाई जा रही है, उसे अचानक लालू प्रसाद ने नहीं पैदा कर दिया है। लोकतंत्र के सारे खंभों ने यह वदइंतजामी उत्पन्न की है। हर जगह सिस्टम सुधारने की कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कमाई हो रही है। इससे बचने एवं मनमाफिक सुविधायें तो दूर प्रावधानुसार हक हासिल करने के लिये भी पैसा या प्रभाव से इतर कहीं कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है।

……….. मुकेश भारतीय

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One comment

  1. बहुत खुब। वाकई तथ्यपूर्ण है आपकि रिपोर्ट। लालू यादव का मोबाईल रखना कोई बहुत आश्चर्य की बात नही है न हीं इसमे कोई न्यूज वैल्यू है । यह सब ड्रामा है लालू यादव को मानसिक रुप से तंग करने का। वैसे मोबाईल की सुविधा को कानूनन रुप देना चाहिये। अपने घर -परिवार से बात कर लेने के बाद जेल मे बंद कैदि को सकून मिलता है वह ज्यादा मानवीय हो जाता है। उसके अंदर सुधार की भावना पैदा होती है , दुर्भाग्य से हमारी जेल व्यवस्था आज भी अंग्रेजो के काल वाली है।

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