दैनिक जागरणः चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों की जमात

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अवधी की एक कहावत है-केका कही छोटी जनी, केका कही बड़ी जनी। घरा लै गईं दूनौ जनी। अर्थात किसे छोटी बहू कहूं और किसे बड़ी बहू कहूं। घर तो दोनों बहुओं ने बर्बाद किया है। यह बात दैनिक जागरण पर सटीक बैठती है।1995 की बात है, जब टीवी चैनलों की धूम मची थी। अखबार इस बात से डर गए थे कि कहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया उन्हें निगल न जाए। ऐसे समय में मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से काम छोड़ कर दैनिक जागरण में नौकरी के लिए आ गया था।

jagranज्वाइनिंग का पहला दिन था। नोएडा के सेक्टर-8 वाले कार्यालय में गेट पर एक सज्जन मिले। उन्होंने कहा, भाई आज ही ज्वाइन कर रहे हो। मैंने हां में सिर हिला दिया। उन्होंने कहा, मत ज्वाइन करो। यहां तो बिहार के लोगों का बोलबाला है। बड़ा दुख पाओगे। इसे मैंने चुनौती के रूप में लिया और मन ही मन में तय किया कि इस संस्थान में कम से कम एक दशक बिताऊंगा।

इससे पूर्व मैं किसी भी संस्थान में कुछ महीनों से ज्यादा नहीं टिका था। शायद मेरे संकल्प का ही असर है कि इस समय दैनिक जागरण में मेरे दो दशक पूरे हो रहे हैं।

संस्थान के अंदर कुछ ही दिनों बाद पता चल गया कि यहां तो प्रदीप श्रीवास्तव की तूती बोलती है, जो उस समय समाचार संपादक हुआ करते थे।

यह अलग बात है कि कुछ वर्षों बाद निशीकांत ठाकुर अनाड़ी से खि‍लाड़ी और फिर खि‍लाडि़यों के खि‍लाड़ी बन चुके थे। प्रदीप श्रीवास्तव और विनोद शील का विरोध करने के कारण मैं कब निशीकांत ठाकुर का चहेता बन गया, मुझे पता तक नहीं चला।

मुझे निशीकांत ठाकुर ने तो कभी कोई कष्ट नहीं दिया, लेकिन उनके आदमियों के कारण समय-समय पर मेरा दम जरूर घुटा है। इस घुटन का मेरे पास ठीक उसी तरह कोई जवाब नहीं था, जैसे निशीकांत ठाकुर का संस्थान में कोई जवाब नहीं था।

अगर किसी ने जवाब देने का प्रयास भी किया तो वह तत्काल वीरगति को प्राप्त हो गया। निशीकांत ठाकुर पर आरोप लगते रहे हैं कि वह आदमी तो कम दाम में लाते हैं, लेकिन वे होते हैं दो कौड़ी के।

यह अलग बात है कि निशीकांत ठाकुर ऐसे काबिल लोगों का सम्मान करते रहे, जो उनके आदमियों को खींच खांच कर चला देते थे। फिर भी यह विडंबना तो रही ही कि फोन का बिल पाने के लिए निशीकांत ठाकुर का आदमी होना अनिवार्य था।

मेरी और निशीकांत ठाकुर की दोस्ती दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली ही थी। इसलिए मुझे आज तक संस्थान से फोन का बिल नहीं मिला। यह अलग बात है कि मैंने अपने मारुति वैन के ड्राइवर को भी फोन दे रखा था।

खैर, निशीकांत ठाकुर का दौर पूरा हुआ और कमान आ गई विष्णु त्रिपाठी के हाथ में। उन्होंने जो बैठकें लीं, उनसे ऐसा लगा, जैसे पत्रकारिता का नया दौर आने वाला है, जिसमें राजा भोज की प्रजा के समान सभी काबिल होंगे और लोगों को अपनी योग्यता का फल मिलेगा।

लेकिन यह क्या, चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों की ऐसी भीड़ लगी कि निशीकांत ठाकुर द्वारा एकत्र किए गए रत्नों की वाट लग गई। अब आप यह गर्व से कह सकते हैं कि दैनिक जागरण पूरी तरह से प्रतिभा शून्य हो रहा है।

काबिल और नाकाबिल लोगों की जो कॉकटेल निशीकांत ठाकुर ने बनाई थी, उसे साफ कर विष्णु त्रिपाठी ने चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों का ऐसा विलयन बनाया है, जो पूरी तरह से नीट है। उसमें आप को प्रतिभा की कोई मिलावट नहीं मिलेगी। उन्होंने ऐसी बाड़ तैयार कर दी है, जो खुद फसल उजाड़ रही है।

इसके पूर्व Shrikant Singh  ने अपनी व्यथा कुछ यूं लिखी हैः …..

मित्रो, दैनिक जागरण में दिक्कतों की शुरुआत तभी हुई, जब बड़ी बड़ी कुर्सियों पर छोटे छोटे लोगों को बैठा दिया गया। शायद यही वजह है कि दैनिक जागरण का कद छोटा होने लगा है। प्रसार संख्या गिर रही है।

बड़े बड़े मैनेजरों पर छोटे छोटे मामले दर्ज कराए जा रहे हैं। छोटे छोटे पत्रकार बड़ी बड़ी गलतियां कर रहे हैं। कंपनी के हुक्मरान बहादुरशाह जफर शाबित हो रहे है। अलविदा दैनिक जागरण। तुम समाप्त हो जाओगे तो लिखूंगा तुम्हारा इतिहास।

जागरण में छोटे लोग बड़े पदों परः काले धन पर कड़े कानून का कितना असर होगा, यह देखने वाली बात होगी। ऐसे लोगों पर शि‍कंजा कैसे कसा जाएगा, जो मीडिया के नाम पर कानून, प्रशासन और पुलिस को अपनी जेब में रखते हैं।

जाहिर है अब ऐसे लोग काले धन और काला धन जमा करने वालों को संरक्षण देने के लिए आगे आएंगे और उनके लिए कवच बनने का प्रयास करेंगे। मीडिया को कानून से ऐसा कोई विशेषाधि‍कार नहीं मिला है, जिसका इस्तेमाल कर वे कानून को धता बताते फिरें।

विडंबना यह है कि मीडिया के नाम पर आज यही सब हो रहा है। यहां तक कि कई बड़े मीडिया घराने मनमानी पर उतारू हैं, लेकिन उन पर रोक लगाने के लिए न तो केंद्र सरकार कोई पहल कर रही है और न प्रदेश सरकारों को इसकी कोई परवाह है।

धमकियों का भी स्वागतः बंधु, दैनिक जागरण प्रबंधन के छल, दंभ, द्वेष, पाखंड, झूठ और अन्याय को उजागर करने के लिए हमने कुछ पोस्ट के जरिये अपने अनुभव साझा किए। उस पर जो प्रतिक्रियाएं, धमकियां और सुझाव आए हैं, उनका हमने तहे दिल से स्वागत किया है।

अब ऐसा लगने लगा है कि बात सिर्फ फेसबुबिया अंदाज में पूरी होने वाली नहीं है। इस पर तो पूरी किताब लिखनी होगी। तभी तो भावी पीढ़ी दैनिक जागरण जैसे माफिया समूह के अत्याचारों से बच सकेगी।

इस बड़े कार्य के लिए मुझे आपका भी सहयोग चाहिए। आप अपने अनुभव साझा करेंगे तो मुझे सुविधा होगी और पुस्तक पत्रकारिता के क्षेत्र के लिए एक जीवंत दस्तावेज बन सकेगी।

आपमें बहुत से लोग इस समय दैनिक जागरण में नौकरी कर रहे होंगे, तो कुछ नौकरी छोड़ चुके होंगे या कुछ को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया होगा। यहां तक कि कुछ को तो क्रूरतापूर्वक निकाल दिया गया होगा।

कुछ ऐसे भी होंगे जो नौकरी के लिए प्रयास कर रहे होंगे। नौकरी आपका पूरा भविष्य तय करती है। इसलिए नौकरी में आने से पहले कंपनी की प्रोफाइल जानना बहुत जरूरी होता है।

आपको बताना चाहता हूं कि दैनिक जागरण की ब्रांडिंग पर भरोसा करके अपना भविष्य तय करने से पहले एक बार जरूर सोचें।

shrikant

………. श्रीकांत सिंह 

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