दैनिक सन्मार्ग की आंखों पर काला चश्मा

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विश्व पर्यटन दिवस है या विश्व पर्यावरण दिवस?:

झारखंड की रांची से प्रकाशित हिन्दी दैनिक सन्मार्ग को लेकर राजनामा.कॉम की “पत्रकारों के शोषण का अड्डा बना सन्मार्ग मीडिया हाउस”   ( लिंकः   http://raznama.com/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a1%e0%a5%8d%e0%a4%a1/) शीर्षक से प्रसारित एक खबर पर अपना विचार प्रकट करते हुये संजय सिंह नामक एक सुधी पाठक ने आरोप लगाया है कि यह न्यूज वेब चैनल कोई पुरानी खुन्नस निकाल रहा है। 

आगे सन्मार्ग की एक और दिलचस्प खबर के पहले स्पष्ट करना जरुरी है कि हमारा किसी भी मीडिया हाउस से कोई खुन्नस नहीं है। जिस एक अंग्रेजी दैनिक के फ्रेंचाइजी ने  पुलिस द्वारा जबरिया रंगदार बनवा कर मुझे जेल भिजवाया, उसका भी कोई भी मलाल नहीं है। और न ही उससे कोई द्वेष या पूर्वाग्रह से प्रेरित हूं, क्योंकि यहां सब अपना-अपना कर्म करते हैं तथा समय आने पर भुगतते हैं। 

 बस हम इतना चाहते हैं कि मीडिया की भ्रामक भूमिका पर लगाम लगे। वह उपहास का पात्र न बने। क्योंकि चौक-चौराहों तक, जनमानस जब मीडिया को भी लेकर राजनीति से भी गंदी प्रलाप करते हैं तो मन में एक टीस उभरती है ,जो यह सब प्रस्तुत करने को बाध्य कर देता है। 

यह बात भी भूला नहीं जा सकता कि मीडिया में जो विज्ञापन प्रकाशित-प्रसारित होते हैं, उसका भारी भरकम मूल्य जनता की जेब से ही जाता है। उसका भी सदुपयोग होनी ही चाहिये। सिर्फ नेताओं के चेहरे चमकाने और मीडिया हाउस की जेब भरने से किसी का कल्याण होने वाला नहीं है। 

 आज दिनांकः 27. 09. 2012 का ही दैनिक सन्मार्ग, रांची अखबार हाथ में लीजिये। या फिर उसके नेट संस्करण के पेज-9 को देखिये। पूरे पेज पर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय का डीएवीपी द्वारा जारी एक बड़ा विज्ञापन है। यह कितनी आश्चर्य की बात है कि अनुवादक से लेकर संपादक-सरीखे लोगों तक की, इसपर नजर नहीं गई। शायद किसी को यह पता नहीं है कि आज दिन 27 सितंबर को पर्यटन दिवस है या फिर पर्यावरण दिवस ! भाषा और वर्तनी की कई अशुद्धियां हैं सो अलग। इसे देख कर किसी भी पाठक का मन खीज उठेगा कि आखिर  अखबार में कैसे लोग काम करते हैं?

ऐसे इस अखबार का यह कोई पहला मामला नहीं है। इसके पूर्व भी इस अखबार में झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञापनों में बड़ी छेड़-छाड़ देखने को मिलती रही है। 

इस संबंध में आज देर शाम जब सन्मार्ग के संपादकीय विभाग से जुड़े कई लोगों से संपर्क साधा तो जबाब हैरान कर देने वाली थी। उनका कहना था कि उन्होंने नहीं देखा है। सबाल उठना लाजमि है कि आखिर संपादकीय विभाग के धुरंधरों तक की नजर अखबार छपने के बाद भी ऐसी भारी भूलों पर क्यों नहीं जाती। ……. मुकेश भारतीय

 

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2 comments

  1. ऐसे अखबार को काली सूची में डाल` देना चाहिए. पत्रकारिता को इन्होंने मजाक बना रखा है. जब किसी ने विज्ञापन को देखा ही नहीं तो क्या अखबार के दफ्तर में भाड़ झोंकने आते हैं. बहुत जबरदस्त खुलासा…बधाई!

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