दिल्ली और बिहार में भाजपा के हौसले की जमीनी हकीकत

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भाजपा को ब्राह्म्णों के चंगुल से निकालकर खुद को शीर्ष पर काबिज करने वाले गुजरातियों ने बिहार फ़तह का दावा किया है। पहले उनका दावा 175 का था अब उन्होंने इसे बढाकर 185 कर लिया है। कभी नरेंद्र मोदी के लिए खूनी पंजा जैसे अल्फ़ाज बोलने वाले परजीवी रामविलास पासवान ने 190 का दावा किया है। यानी दावों का दौर जारी है। यही दावा भाजपा दिल्ली में भी करती दिख रही है।

bjpवैसे उसके दावे निश्चित तौर पर खोखले नहीं हैं और यह भी कि इनमें असलियत कम ख्याली पुलाव ज्यादा हैं। इसे भाजपा की आक्रामक राजनीति का हिस्सा भी कहा जा सकता है, जो मौजूदा राजनीति के लिहाज से अनुचित नहीं कहा जाना चाहिए।

पहले दिल्ली की बात करें तो दिल्ली फ़तह करने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। कमाल की बात यह है कि वह मीडिया जो लोकसभा चुनाव के दौरान “नमो-नमो” का मंत्र जाप रही थी, वह अरविन्द केजरीवाल के नाम का गुण भी गाने लगी है।

दिल्ली में राजनीति के बदलते मन-मिजाज का ही परिणाम रहा कि अभी हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में अपनी बात कहने के बजाय नरेंद्र मोदी अरविन्द केजरीवाल का नाम जपते दिखायी दिये। उन्हें अराजक कह नक्सलियों के पास जाने का सुझाव देने से लेकर खुद को बेहतर शासक का दावा तक उन्होंने किया।

सनद रहे कि दिल्ली में भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। यानी भाजपा यह संदेश भी दे रही है कि यदि दिल्ली चुनाव में भाजपा को जीत मिली तो मुख्यमंत्री चाहे कोई भी हो, वह नरेंद्र मोदी के लिए महज कठपुतली मात्र होगा।

Arvind-Kejriwalइसके विपरीत दिल्ली की जनता ने अरविन्द केजरीवाल के द्वारा उठाये गये मुद्दों के प्रति अपनी सकारात्मक सहयोग देना शुरु कर दिया है। हालांकि दिल्ली फ़तह करने के लिए भाजपा की तैयारी का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि उसने दिल्ली में अपने 300 सांसदों को चुनाव प्रचार करने के लिए उतारा है। इसके अलावा करीब एक दर्जन मंत्रियों को दिल्ली चुनाव के काम में लगाया गया है।

इसके अलावा उसके एक दर्जन से अधिक मीडिया घराने नितदिन इस काम में सुहभ से लेकर देर रात तक लगे हैं। अभी हाल ही में एबीबी नामक एक न्यूज चैनल ने सर्वे जारी किया कि मुख्यमंत्री के रुप में दिल्ली की जनता ने अरविन्द केजरीवाल को पसंद किया। जबकि सर्वे में विजेता नरेंद्र मोदी को घोषित कर दिया गया। यह सब एक अरविन्द केजरीवाल को रोकने के लिये।

वहीं बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अभी से ही आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। सबसे दिलचस्प यह है कि विकास के मुद्दे पर राजनीति करने का दावा करने वाली भाजपा धर्म और जाति का सहारा बेहिचक ले रही है।

धर्म के आधार पर हिन्दू-हिन्दू को बांटने से लेकर वह जाति का विभेद स्थापित करने के लिए जातिगत सम्मेलन तक कर रही है। भाजपा के इस रुख पर भाजपा द्वारा पोषित बुद्धिजीवियों की लेखनी खामोश है जो उनके वास्तविक चरित्र से मेल ही खाता है।

अब भाजपा के दावों के असलियत की बात करें तो दिल्ली में उसे अरविन्द केजरीवाल नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। वहीं बिहार में उसे इस बात का अहसास है कि उसे इस बार उसकी नैया डुबती नाव के समान है।

असल में बिहार का राजनीतिक गणित भाजपा के लिए उलटा पड़ रहा है। वह इस बात को भूल रही है कि लोकसभा चुनाव में सफ़लता उसे केवल इस कारण मिली थी कि तब जदयू और राजद के अलग-थलग था। इस बार ऐसा नहीं है।

राजद और जदयू के एक होने के अलावा दलित राजनीति के वाहक बने जीतन राम मांझी भी उसकी राह में सबसे बड़े अवरोधक हैं। सरकार के रुप में उन्होंने भाजपा को शिकस्त देने का काम शुरु कर दिया है।

खासकर दलित भूमिहीनों को जमीन का अधिकार वास्तविक रुप में दिलाने से लेकर खाद्य सुरक्षा अधिकार में सभी दलितों को शामिल कर उन्होंने दलितों को उनकी ताकत का अहसास करा दिया है कि यदि वे एकजुट रहे तो ब्राह्म्णवादी शक्तियां दम तोड़ेंगी।

modiएक खास बात यह है कि बिहार की वह जनता, जिसने नरेंद्र मोदी को आगे बढकर अपना वोट दिया, वह उनके घोषणाओं का सच देख रही है। मोदी ने जीतने पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा और एक विशेष पैकेज देने का वादा किया था, जिसे लेकर अबतक वे अगंभीर बने हुए हैं। 

बिहार भाजपा के नेता जनता को ब्लैकमेल करने लगे हैं कि अब यदि जनता ने उन्हें बिहार का राज सिंहासन सौंपा तभी विशेष राज्य का दर्जा भी मिलेगा और विशेष पैकेज भी। जाहिर तौर पर जनता मोदी का सच देख रही है और समय आने पर उसका जवाब भी देगी।

ऐसी उम्मीद की जा सकती है। वैसे यह उम्मीद राजद और जनता दल के विलय और विलय के उपरांत उनके द्वारा अपनायी जाने वाली रणनीतियों पर भी निर्भर है।

उधर भाजपा ने अपने सहयोगियों को यह संदेश देकर अपने लिए कब्र खोद लिया है कि सहयोगी दलों के उम्मीदवारों का निर्धारण भी वही करेगी। जाहिर तौर पर लोजपा और रालोसपा जैसे परजीवी दलों के लिए यह एक चुनौती से कम नहीं है।

वैसे अभी कुछ भी कहना अतिश्योक्ति होगी। अभी तो बस राजनीति के बदलते रंग और मन-मिजाज देखने का समय है। ये दोनों चुनाव भाजपा के लिए भी अग्निपरीक्षा के समान ही है और देश के लोकतंत्र के लिए भी। लोकतंत्र के लिए इसलिए कि क्या अब उसका अस्तित्व केवल धर्म और जाति आधारित राजनीति होगी या फ़िर एक समग्र व समावेशी राजनीति।

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…………लेखक नवल कुमार अपना बिहार वेब पोर्टल के संपादक हैं।

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