अगर डॉक्टरी न करके गुलामी कबूल कर ली होती तो उसके दुधमुहें बच्चे राख न होते

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खबरों के हिसाब से फरीदाबाद में जिन राजपूतों ने उस दलित परिवार के मासूमों को जिंदा जला डाला, वह दादरी की वही भीड़ है जिसे मंदिर में बैठा कोई पंडा हांक लगाता है और वह जानवरों की तरह दौड़ पड़ता है किसी अख़लाक को ईंट-पत्थरों से मारते-मारते मार डालने…! सामंती मनुवाद ने अपने ढांचे में एक स्थायी बर्बर भीड़ को मोर्चे पर लगा रखा है, जो उसकी सत्ता की सुरक्षा करने के लिए गाहे-बगाहे किसी दलित को जिंदा जलाती है, किसी दलित को निर्वस्त्र करके गांव में घुमाती है, किसी मुसलमान को मारती रहती है…!

faridabad dalit storyबहरहाल, फरीदाबाद के दलित जितेंद्र ने अगर डॉक्टरी नहीं करके उन राजपूतों की गुलामी कबूल कर ली होती, उनकी ताबेदारी करता रहता तो आज जितेंद्र को अपने दुधमुहों को जिंदा जलते नहीं देखना पड़ता…! पंडावाद और उसके सबसे अहम सेनापतियों की शान में यही जितेंद्र की सबसे बड़ी गुस्ताखी थी।

मिर्चपुर, गोहाना और अब सोनपेड़ तक के दलितों ने यही गुस्ताखी दोहराई और जलाए गए… मारे गए। बर्दाश्त नहीं हो रहा है राजा-जीयों को कि ‘नीच’ जात के ये लोग पढ़-लिख कैसे सकते हैं… घर में फ्रिज-मोटरसाइकिल कैसे रख सकते हैं… जींस पैंट कैसे पहन सकते हैं… सिर उठा कर कैसे चल-बोल सकते हैं…! असली दुख यही है…!

यही वह उस व्यवस्था का शर्म है, जिस पर पंडावादियों के गिरोह गर्व करने के लिए कहते हैं! अगर इस शर्म को गर्व मान कर गले में लटकाए ढोते रहे तब तो मर के जीते रहेंगे, नहीं तो जिंदा जला दिए जाएंगे…! आरएसएस के सपनों का भारत यही है…तो…!

हिंदू समाज नाम की इस बर्बर भीड़ के लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला, गोहाना, दुलीना-झज्जर या मिर्चपुर करने पर तो कहीं बौद्धिक क्रांति नहीं आ सकी थी, अब देखते हैं कि दादरी किए जाने पर नींद से जागे हुए सत्ताधारी बौद्धिक प्रतिनिधिमंडल तक सोनपेड़ में जिंदा जलते हुए उन मासूम बच्चों और उनके मां-बाप की चीखें पहुंचती हैं या नहीं…!

जानिये क्यों बच्चों समेत जिंदा जला दिया गया दलित परिवार?

faridabad dalit childफरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में एक दलित परिवार को जिन्दा जला दिया गया। इस घटना में दो बच्चों की मौत हो गई जबकि पति-पत्नी घायल हैं।

हरियाणा के मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है।

हमले में घायल जितेन्द्र के अनुसार मंगलवार की सुबह करीब 3 बजे उसके घर में कई सवर्ण जाति के लोग दाखिल हुए और पेट्रोल डालकर उनके परिवार को जिन्दा जला दिया।

इस घटना में जितेन्द्र का दो साल का बेटा वैभव और करीब एक साल की बेटी दिव्या की मौत हो गई जबकि पत्नी रेखा और वह खुद घायल है।

इस घटना के बाद पुलिस पहुंची और घटना स्थल पर फोरेंसिक एक्सपर्ट ने जांच की। हालांकि पुलिस को ऐसा कोई चश्मदीद नहीं मिला जिसने आरोपियों को देखा हो।

चौंकाने वाली बात यह है कि जितेन्द्र के परिवार को एक साल से सुरक्षा में छह पुलिसकर्मी मिले थे, लेकिन उनकी मौजूदगी में कैसे किसी ने इस वारदात को अंजाम दे दिया।

क्या था मामला

faridabad_2सुनपेड़ गांव में करीब 20 फीसदी आबादी दलितों की है और 60 फीसदी सवर्ण हैं। गांववालों और पुलिस से पूछताछ के बाद पता चला कि अक्टूबर 2014 में गांव के सवर्ण और दलित परिवार के कुछ लड़कों में मोबाइल को लेकर झगड़ा हुआ था।

इसके बाद 5 अक्टूबर 2014 को दलित जितेन्द्र के परिवार के कुछ लोगों ने तीन सवर्ण लड़कों भरतपाल, मोहन और पप्पी की हत्या कर दी जबकि इस घटना में तीन सवर्ण घायल भी हुए थे। इस मामले में 11 दलितों को गिरफ्तार किया था।

आरोप है कि इस घटना के बाद से ही एक ही सवर्ण परिवार के लड़के दलित परिवार को परेशान कर रहे थे। वहीं सवर्ण छिद्दा सिंह का परिवार जिस पर जितेन्द्र के परिवार को जिंदा जलाने का आरोप लगा है उनके घर के बाहर भी पुलिस का कड़ा पहरा है। हालांकि अधिकतर घरों में ताले बंद हैं।

गांववालों का कहना है कि यह झगड़ा सिर्फ दो परिवारों का है, जिसके चलते पिछले एक साल से गांव का माहौल खराब हुआ है। पुलिस ने इस मामले में कई आरोपियों को हिरासत में ले लिया है। इस घटना को पंचायत चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

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