तालाब में हलचल मचाने का समय

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रैली से पहले राजनीति हुई।  रैली तो राजनीति के लिए थी ही, सो वहां राजनीति हुई। राज करने वाले ने अपनी प्रजा के लिए न रैली में, न ही रैली के बाद (बम ब्लास्ट में मरने वालों के लिए) राजधर्म अपनाया।

हां , राजनीति धर्म जरूर अपनाया।  भाषण के हर क्लिप पर पूरा होम वर्क किया। हुंकार शब्द के लिए शब्द कोष देखा।

पूरे देश को भाषण के स्क्रिप्ट की खामियों को विस्तार से बताया।  मतलब जम कर फिर राजनीति हुई।  फिर कानून व्यवस्था और लाशों पर राजनीति हुई।

फिर मृतकों से नहीं मिलने पर राजनीति हुई ।  जब मिलने आये तो फिर राजनीति हुई।  ये राजनीति भी  जनता को गोल गोल घुमाने में माहिर है।  सब मछुआरे घात लगा कर तालाब के ऊपर बैठें है। आखिर जनता जायेगी किधर?  कहीं न कहीं तो फंसना ही है । 

वेशक नकारत्मकता, सनसनी, बौखलाहट, बेचैनी देती है। मछलियाँ सोये रहेंगी तो फिर फंसेंगी कैसे ?    जाहिर है कि तालाब में हलचल तो मचानी होगी

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