झारखण्ड भाजपा के लिए नेतृत्व का गंभीर संकट

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saryu_raghuwarरेगिस्तान में प्यासा मृग जब पानी की आस में दूर दूर तक देखता है तो एक-देढ किलो मीटर की दूरी पर उसे ताजे पानी का तालाब दिखाई देता है। मृग दौड़ता, कुलांचे भरता हुआ प्यास बुझने की उम्मीद में उस तालाब तक पहुंचने की कोशिश करता है लेकिन उसके गण्तव्य तक पहुंचने पर उसे पुनः मिलता है रेत का टीला, और वह बेहद निराश होकर आगे बढ़ जाता है। इस स्थिति को मृग- मारीचिका कहते है। कमोवेश झारखंड में भाजपा भी ऐसी मृग मारीचिका की स्थिति से गुजर रही है।

मोदी फोविया के खुमारी के अतिशय से अपने आप को अबतक दूर न कर पाये प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओ के बीच चंद दिनों से एक नए मानसिक विचलन का अभ्युदय हुआ है। पिक्षले कई चुनावों में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में अभ्यस्त होकर चुनाव लड़ते आये भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच एक नयी बहस बड़ा आकार ग्रहण करती दिखाई दे रही है। वह है आनेवाला विधानसभा चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा।!

पहले चुनाव में 43 सीटें लाकर अपने बलबुते पर सरकार बनाने वाली भाजपा 2009 में महज 18 सीटो पर जा सिमटी है।

झारखंड में चुनाव दर चुनाव भाजपा के सीटों में लागातार आ रही कमी का मुदृदा राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए यक्ष प्रश्न बन चुका है। जिस प्रकार मोदी के नमो लहर में महज दो माह पहले हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा झारखंड से कुल बारह सीटें हासिल करने और 51 विधानसभा सीटों पर बढत कायम करने में सफल रही है।

 महज दो माह बाद सितम्बर में होने वाले चैथे विधानसभा चुनाव में इस प्रदर्शन को दुहराने का भारी दबाव है; राष्ट्रीय नेतृत्व झारखंड में अपनी सरकार बनवाने के लिए गहन मंथनरत है।

कई गुटों में बंटी झारखंड भाजपा का एक गुट चाहता है कि कोई गैर आदिवासी के हाथों में चुनाव की कमान सोंपी जाय और मोदी की भांति झारखंड में भी एक नया नेतृत्वकर्ता परोसा जाय जो अपने दम पर झारखंड की जनता का विश्वास हासिल करने में सक्षम हो इस गुट का समर्थन यशवंत सिन्हा के साथ है।,

 दूसरा गुट बर्तमान नेतृत्व को बनाए रखने का पक्षधर है यानी अर्जुन मुंडा के साथ है। एक तीसरा गुट भी है जो इन दोनो से इतर फे्रस चेहरे को आगे करने के हिमायती है। इस गुट द्वारा सुदर्शन भगत और निशिकान्त दुबे के नाम को आगे बढाने का काम किया जा रहा है।

सभी गुट केन्द्रीय नेतृत्व तक अपनी अपनी बात पहुंचा चुके हैं। केन्द्रीय नेतृत्व के समक्ष अभी अनिर्णय के बादल मंडरा रहे हैं। प्रदेश में नंतृत्व के लिए एक तरफ मोदी के मानिन्द “रैम्बो” की तलाश जारी है।

सवाल गहरा हो रकता है लेकिन परीक्षार्थी को परीक्षा में पुछे गए प्रश्न का उत्तर हर हाल में देना होता है। चुनाव बहुत नजदीक है, अतः त्वरीत निर्णय जरूरी है। निर्णय प्रकृया में हो रही देरी से कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। जो देर सवेर भाजपा की अच्छी सेहत पर बूरा असर डाल सकती है।

यह चेतने का सही समय है, नेतृत्व के मुददे पर असमंजसता की बैठी धुन्धली परत देर सबेर झारखंड भाजपा के लिए संकट का सबब बन सकती है।

……..पत्रकार  संतोष पाठक का विश्लेषण

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