” झारखण्डी नृत्य की विविधता , उराँव जनजाति की महत्ता के साथ “

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oraonभारत के मानचित्र में अंकित ऐतिहासिक क्षेत्र छत्तीसगढ़  एवं झारखण्ड आदिवासीयों के निवास के लिए काफी प्रसिद्ध है।

झारखण्ड क्षेत्र की अपनी ऐतिहासिक भौगोलिक और संस्कृति की पहचान तो है ही ये अन्य जनजातियों की भाँति आत्मवाद में विश्वास करते हैं, तथा सबसे बड़ा देवता आत्मा है जिसे ये धर्मेश कहते हैं ।

झारखण्ड क्षेत्र की प्राचीन अस्मिता को दर्शाने वाले पौराणिक श्लोकों से हमें इसकी पहचान का आभास मिलता है ।

“उराँव” झारखण्ड की दूसरी बड़ी  जनजाति है जो बिहार , प. बंगाल , उङीसा मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ , आसम एवं अंडमान निकोबार राज्य में पाई जाती है । झारखण्ड में इनका मुख्य निवास स्थान – गुमला , लातेहार , राँची एवं खूंटी जिला है ।

” अयः पात्रें पयः पानम् , शालपत्रेमजनम् आसनं खर्जुरी पत्रे , झारखण्ड विहियते । ” अर्थात- झारखण्ड वह क्षेत्र है जहाँ धातु के पात्रों में दूध , पानी पीयें जाते हैं । सखुआ के पत्तों में भोजन किया जाता है और खजूर के पत्तों से चटाई पर शयन करते हैं ।

झारखण्ड में निवास करने वाले उराँव लोगों की संस्कृति प्रकृति वादी है । ये यथार्थ वादी तथा कोरी कल्पना से बहुत दूर हैं ।

उराँव जाति की संस्कृति में जातिवाद , भाग्यवाद , कल्पनावाद नहीं हैं बल्कि ये बहुत ही मेहनती होते हैं । इनका लगाव प्रकृति से होने के कारण ये भोगवादी नहीं है ।

झारखण्ड जनजाति में नृत्य एवं गीत के प्रति अटूट प्रेम ही उनकी सांस्कृतिक पहचान है । मुस्कुराते हुए चाँद सितारों की छाया में प्राकृतिक छटा की गोद में गूँजते हुए लोक गीत एवं नृत्य चरमोत्कर्ष के सजीव उदाहरण है । चाहे वह किसी विवाह , पर्व हो या फसल से जुङे हुए लोकगीत या नृत्य हो । ये इनके जीवन के विभिन्न पहलुओं का वास्तविक प्रतिबिंब भी है ।

जब युवक एवं युवतियां नाचने उतरते हैं तो लगता है जैसे प्रकृति या वासंती स्वयं भूतल पर मूर्त हो गयी है । नृत्य का प्रारंभ किसी भी लय से क्यों न हो परन्तु उसके बाद धीरे-धीरे उनमें थिरकने की गति बढती जाती है ।

झारखण्ड की उराँव जनजाति नृत्य एवं गीत के लिए विशेष रुप से प्रसिध्द है । नृत्य और गीत के बिना ये जीवित ही नहीं रह सकते क्योंकि इनके रक्त तक ही नहीं बल्कि इनके जीन तक में नृत्य के तत्व पाये जाते हैं ।

इनका स्वभाव इस कारण हर वक़्त प्रसन्नता से भरा हुआ लगता है , प्राकृतिक के ऊपर बहुत हद तक ये निर्भर रहते हैं इस कारण बहुत से बीमारियों से ये दूर रहते हैं और सृजनात्मक रूप से जीवन व्यतीत करते हैं।

इनके बीच  निम्न पर्व नृत्य प्रचलित है – धानुधनी , हरियारी , बंगारी , कडलेटा , नवखानी , खरिहानी , सोहराई , सहरुल , फागुं , करमा , जावा , टुसु , नाचनी , जादुर , गेना , जापी , राका , अरन्दी , धरगु , हेजोर , खेमटा , लहसुआ , माघी , देसाई , लारगे , धान्या , रीझा , भटोया , मछानी , भोगता , भुवाग आदि हैं ।

पर्व एवं शुभ अवसरों पर उराँव जनजाति के लोग गीत गाना या नृत्य तो करते ही हैं  विशेष रूप से पर ऐसे साधारण दिन भी रात्रि भोजन के बाद सारे युवक अखरा में पहुँचकर गाने-बजाने लगते हैं । जिन्हें सुनकर युवतीयाँ भी जल्दी अपने काम निपटाकर उस अखरा में एकत्रित हो जाती हैं ।

और देर रात तक नृत्य गीत का कई कार्यक्रम चलता रहता है साथ ही गाँव , समाज , घर – परिवार के बारे में वार्त्तालाप करते हैं । इस बीच युवक एवं वृद्ध चावल से बनी शराब (हड़िया ) एवं महुआ से बनी शराब ( चुलैया ) भी पीकर खूब आनंद के साथ समय व्यतीत करते हैं ।

रात्रि मनोरंजन के बाद सभी अपने-अपने निवास स्थान आकर शयन करते हैं और प्रातः काल जल्दी उठकर करंज या सखुआ का दतवन लेकर उत्साह के साथ खेतों में अपने मवेशियों को ले जाते हैं चरने के लिए । और खुद भी पूर-जोर मेहनत से खेतों में काम करने लग जाते हैं । सूरज के पहली किरण इनके कुदाल चलाने की गति को भी दोहरा उर्जा प्रदान करता है ।

झारखण्ड का अधिकांश नृत्य दलबध्द सामाजिक नृत्य है जो एकता और समरुपता का प्रतीक है । नृत्य के समय हर आयुवर्ग के लोगों में लगन एवं स्फूर्ति एक समान होती है । वे अपने आप में भेदभाव को भूलाकर एक तन और एक मन होकर नृत्य में भाग लेते हैं ।

झारखण्डी उराँव बच्चे जब तीन-चार साल के हो जाते हैं उसी समय से नृत्य के अवसरों पर स्वतः इनके पैर गतिशील हो जाते हैं ।

उराँव जनजाति अपनी संस्कृति , भाषा , रीतिरिवाज एवं प्रथाओं के नृत्य एवं गीत के माध्यम से अपनी पहचान सुरक्षित रखे हैं । नृत्य एवं गीत उनके दैनिक जीवन का बेहद प्रमुख अंग है ।

उराँव जनजाति के नृत्य सालोभर चलते रहते हैं तथा प्रत्येक मौसम के लिए अलग-अलग विशेषताओं से युक्त नृत्य होते रहते हैं । नृत्य युवक-युवती के कुछ अलग होते है और कुछ सम्मलित होते हैं । परन्तु अधिकांश नृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में महिला एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं ।

युवक की मांदर के थाप पर युवती मदहोश होकर झूमती है । जैसे कान्हा की बाँसुरी पर राधा एवं गोपियां । कुछ गीत बचपन , युवा तथा वृध्द अवस्था से संबधित होते हैं । जैसे – फसल के बोने से लेकर फसल के काटते तक से संबंधित होते हैं । तो कुछ गीत आदि कालीन घटनाओं जंगल , पहाङ , नदी , खेत-खलिहान , अन्य पेङ-पौधे सें संबंधित होते हैं ।

उराँव जनजाति के नृत्य को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

ग्रीष्मकालीन , वर्षाकालीन तथा शीतकालीन !

1)- ग्रीष्मकालीन नृत्य -ग्रीष्मावधि में जेठवारी गीत और टुंटा खङी या सरहुल तथा धुरिया नृत्य प्रचलित है ।

2)- वर्षाकालीन नृत्य – वर्षाकालीन वर्षा के आगमन में खेत में बीज डालने एवं फसल रोपने की खुशी में हरियारी नृत्य , करमा नृत्य एवं बंगारी नृत्य प्रचलित है ।

3)- शीतकालीन नृत्य – फसल काटने के बाद जाङे का मौसम शुरु होता है इस मौसम में सम्पूर्ण उराँव क्षेत्र में अगहनी एवं विवाह से संबंधित गीत सारे क्षेत्र में गूंजते है । और जब-जब गीत गूंजते है तो गीत के साथ लोगों के पैर भी थिरकते है ।

इस अवधि के के नृत्य में नृत्यकर्त्ताओं के पैर चाहे वह महिला हो या पुरुष उनके पैर धीरे-धीरे आगे-पीछे करके नृत्य आरंभ करते हैं । जो मांदर एवं ढोल के रिदम के साथ अपनी गति खुद-ब-खुद बढा देते हैं ।

urmila” उर्मिला कुमारी   “

बाबा पथ , नियर – आनंद बिहार , हुरहरु,हजारीबाग

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