बाहर सर्कस तो अन्दर नौटंकी

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hemant1

दोपहर को अपने एक मित्र को फोन घुमाया, पूछा कहाँ हो यार बड़ा शोरगुल हो रहा है ? तपाक से जवाब आया, विधानसभा के तरफ हैं। मैंने उत्सुकतावश पूछा, सरकार विश्वासमत कैसे हाशिल करती है यही देखने गए हो क्या ? जवाब आया, नहीं यार वहां देखना क्या है सब पहले से स्क्रिप्टेड है बस सब प्ले कर रहे हैं। विधानसभा की ऐसी नौटंकी देखने से बेहतर है की विधानसभा मैदान में लगे इम्पायर सर्कस देखूं। सो वहीँ आया हूँ। मैंने पूछा ऐसा क्यूँ कह रहे हो भाई, क्या सचमुच ये सब नौटंकी है ? तो उसने कहा रुको मैं तुझे समझाता हूँ।
छह महीने पहले अच्छी भली चल रही सरकार से पहले समर्थन वापस लेना और फिर वैसी ही स्थिति में सरकार बनाना क्या नौटंकी नहीं है 

? छह महीनो तक आजकल की स्थिति में पुरे प्रदेश को रखना क्या नौटंकी नहीं है ? अपनी वारंटी भाभी को अचानक से सबके सामने शुद्ध रूप से पेश करना क्या नौटंकी नहीं है ? धीरे-धीरे देश स्तर के तिगडम लगा कर तैतालीसो महाशय का सदन में पहुंचना क्या किसी नौटंकी से कम था ? सभी दागियों का एकसाथ यह कहकर समर्थन लेना की सदन में सभी माननीय हैं क्या नौटंकी नहीं है ? नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री का सदन में संसद की तरह एक घंटे का भाषण देना क्या नौटंकी नहीं है? हर सरकार में सरकार का हिस्सा रहने वाले का सदन में अपना इतिहास बताना और खुद को पाक साफ़ बताना क्या नौटंकी नहीं है? अध्यक्ष का पद पर बने रहना क्या नौटंकी नहीं है ? अध्यक्ष पद पर बैठकर वोटिंग से पहले नेता प्रतिपक्ष से दागियों को वोट देने के नाम पर दिखावटी बहस करना क्या नौटंकी नहीं है ?
उसने फिर कहा देखो तुम ऐसे नहीं समझोगे … तुम्हे थोडा विस्तार से बताना होगा। देखो सरकार इसलिए नहीं गिराई गयी थी की उनकी सात शर्त मानी नहीं जा रही थी बल्कि इसलिए गिराई गयी थी की सरकार कांग्रेस के साथ मिलकर बनानी थी क्यूंकि हाथ धीरे-धीरे सबको अपने तोते की गिरफ्त में लेने वाली थी। गुरु जी के नाम पर जो वोट मिल रहे हैं वो भी नहीं मिलते। दूसरा सरकार बनाने में छह महिना इसलिए लगाया गया और राष्ट्रपति शासन ख़त्म होने के दिन ही विश्वासमत हाशिल इसलिए किया गया ताकि सरकार यदि 6 महीने तक भी चलती है तो लोकसभा का चुनाव पार हो जायेगा। और इसी छह महीनो में सभी एग्रीमेंट हुए। सरकार की रुपरेखा तय की गयी। स्क्रिप्ट लिखी गयी की कैसे सबको सामने लाना है। कैसे निर्दलीय को मनाना है। कैसे विपक्ष को मनाना है। कैसे विधानसभा अध्यक्ष को नाटकीय ढंग से पद पर बने रहने देना है। वैसे विधानसभा को पद पर बने रहने और स्क्रिप्ट सही ढंग से प्ले करने का अब फायदा यही हुआ की उनकी रांची सीट भी लगभग पक्की हो गयी। 
दरअसल झारखण्ड में सभी दल के नेता सरकार बनाने के पक्ष में पहले से ही थे । कोई नहीं चाहता था की चुनाव हो। लेकिन कोई अपने केन्द्रीय नेतृत्व से तो कोई पिछले कई तलाक/घटना/दुर्घटनाओ से डरे सहमे थे। इसलिए कोई आगे नहीं बढ़ रहा था। हेमंत आगे बढे और विश्वासमत हाशिल किया। वैसे हेमंत के आत्मविश्वास को देख भी यह अंदाजा लगाया जा सकता था की आखिर माजरा क्या है। हेमंत उतावलेपण में बोले जा रहे थे, गलती पर उन्हें टोका जाता और पहली बार का एहसास भी कराया जा रहा था। फिर हेमंत कहते आगे आगे देखिये होता है क्या ? 
अब हेमंत को कौन बताये की हमसब तो 13 साल से देखते आ रहे हैं। वैसे हेमंत को कोई बताये की देखना आपको है क्यूंकि बाबूजी के नाम पर आप मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन आपकी अगली पीढ़ी को जनता राजनीति में टिकने देगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं है। गारंटी सिर्फ एक ही शर्त पर मिल सकती है यदि आप सौभाग्य से मिले इस मौके का सही फायदा उठाते हैं और वो कर दिखाते जो अबतक झारखण्ड को नशीब नहीं हुआ है।

                                    ……पत्रकार सन्नी शरद अपने फेसबुक वाल पर।

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