झारखंड में मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की गुंडागर्दी तो देखिये

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रांची। 15 मार्च 2017 को सुमित कुमार नामक युवक ने सूचना भवन स्थित जन सूचना पदाधिकारी से मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र से संबंधित कुछ सूचनाएँ मांगी। उसने सूचनाएं मांगने के लिए दस रुपये का भारतीय पोस्टल आर्डर भी दिया था। लेकिन जरा देखिये मुख्यमंत्री जन संवाद केन्द्र की गुंडागर्दी कि उसने इस मांगी गयी सूचना पत्र को अपने पास गैर-कानूनी ढंग से एक महीने रखकर सुमित को यह कहकर लौटा दिया कि “भूलवश इस आवेदन को मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के द्वारा प्राप्त कर लिया गया था। पता स्पष्ट नहीं रहने की वजह से मूल पत्र को वापस किया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र द्वारा लौटाये गये प्रपत्र में पत्र किसके द्वारा भेजा गया, उसका न तो हस्ताक्षर है और न ही भेजनेवाले का नाम और पदनाम, यानी अनियमितता स्पष्ट रुप से दीख रही है।

जबकि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6(3) कहता है कि “यदि किसी लोक प्राधिकरण को ऐसी सूचना के लिए आवेदन प्राप्त होता है जो दूसरे लोक प्राधिकरण के कार्यों से निकटतर रुप से संबंधित है, तो वह लोक प्राधिकरण जिसे आवेदन दिया गया है, आवेदन को संबंद्ध लोक प्राधिकरण को अंतरित कर देगा” साथ ही इसकी सूचना संबंधित आवेदक को भी देगा।

अर्थात् रांची स्थित मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र क्या कर रहा है, इस घटना से समझा जा सकता हैं, स्पष्ट है कि उसके खिलाफ मांगी गयी सूचना से वह इतना घबरा गया है कि उसे समझ में ही नहीं आ रहा कि वह क्या करें?

याद रखे, यह वह मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र है, जो कहा जाता है कि मुख्यमंत्री इसे अपने देख-रेख में चला रहे है, वे पारदर्शिता की बात करते हैं, पर सुमित द्वारा मांगी गयी सूचनाएं से उनकी पारदर्शिता संबंधी बयान की पोल स्वतः खुल जाती है।

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