झारखंड में एसएआर कोर्ट खत्म करने की तैयारी

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झारखंड में भाजपानीत रघुवर सरकार के विधि विभाग ने शिड्यूल एरिया रेगुलेटरी (एसएआर) कोर्ट खत्म करने के लिए सीएनटी एक्ट में आवश्यक संशोधन पर सहमति प्रदान करते हुए कहा है कि संशोधन कानून सम्मत है।

cntइस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल की अनुमति लेकर विधनसभा से सीएनटी एक्ट में संशोधन के लिए कार्यवाही की जा सकती है। इसके बाद भू-राजस्व विभाग ने संबंधित प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत करने की तैयारी कर ली है।

आदिवासी जमीन के कंपनसेशन (मुआवजे) का प्रावधान समाप्त करने लिए छोटानागपुर टेनेंसी (सीएनटी) एक्ट की धारा 71 (ए) की उपधारा-2 और उपधारा-3 को संशोधित या पूरी तरह समाप्त करने का प्रस्ताव विधि विभाग के पास भेजा गया था।

इसमें बताया गया है कि आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों का हस्तांतरित करने की प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो जायेगी। इससे आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों से पूरी तरह  सुरक्षित हो जायेगी। इस पर विभागीय मंत्री पहले ही सहमति प्रदान कर चुके हैं।

 1969 के पहले हुए कब्जे पर ही देना था मुआवजा

सीएनटी एक्ट में मुआवजा के प्रावधान के मुताबिक, 1969 से पहले कब्जाई गयी आदिवासी जमीन को हस्तांतरित करने के लिए कहा गया था।

भू-राजस्व विभाग ने कहा है कि 08.02.69 को बनाये गये कानून के मुताबिक, इस तिथि तक अगर किसी व्यक्ति का आदिवासी जमीन पर अधिकार के 12 वर्ष बीत गये हो, तो संबंधित जमीन कब्जा करने वाले को हस्तांतरित कर दी जायेगी। जिनके अधिकार के 12 वर्ष नहीं बीते होंगे, वहां 30 वर्ष की अवधि का कालखंड का अवरोध लागू होगा। 30 वर्ष की अवधि का लाभ उस हालत में लिया जा सकता है, जहां 08.02.69 के पहले अधिकार के 12 वर्ष नहीं बीते हों।

इसके मुताबिक वर्ष 1969 में भी अगर आदिवासी जमीन पर किसी अन्य व्यक्ति का अधिकार हुआ हो, तो उसे 30 वर्ष की अवधि का लाभ 1999 तक होगा। सीएनटी में संबंधित प्रावधान करने की परिकल्पना यह सोच कर नहीं की गयी थी कि आदिवासी जमीन पर कब्जा जारी रहेगा।

गलत तथ्यों पर फैसला देता है एसएआर कोर्ट

भू-राजस्व विभाग ने बताया है कि सरकार द्वारा कई स्तर पर इस मामले की जांच के क्रम में यह पाया गया है कि गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की जमीन पर कोई संरचना तैयार कर ली जाती है।

इसके बाद संबंधित आदिवासी भूमि मालिक द्वारा सीएनटी एक्ट की धारा 71 (ए) के तहत जमीन वापसी का मुकदमा एसएआर कोर्ट में दायर किया जाता है।

इस अर्ध न्यायिक प्रक्रिया के दौरान गलत तरीके से गैर आदिवासियों द्वारा यह साबित कर लिया जाता है कि वह शिड्यूट एरिया रेगुलेशन 1969 के लागू होने के पहले से ही उस जमीन पर रह रहा है।

गलत तथ्यों और गवाही के आधार पर इस बात को साबित करने के बाद एसएआर पदाधिकारियों द्वारा आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम हस्तांतरित करने का आदेश पारित कर दिया जाता है। आदिवासी जमीन के गलत हस्तांतरण मामले में राज्य सरकार तीन एसएआर अफसरों को दंडित कर चुकी है।

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