जो जितना बड़ा चोर, उतना बड़ा सीनाजोर

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अखिलेश अखिल

क्या राज्य सभा , क्या लोक सभा ! नोट के चोर नोटबंदी पर राजनीति करते दिख रहे है। अद्भुत नजारा है। आजाद भारत का सबसे बड़ा प्रहसन। लोकतंत्र के नाम पर वर्षो से यह नर्तन जारी है। सता पक्ष कह रहा है की नोटबंदी ऐतिहासिक फैसला है। देश सुधर जाएगा , लोग बदल जाएंगे , भारत चमक उठेगा। उनके तर्क भी है। लेकिन तर्क के पीछे बेईमान चोर भी खड़ा है।

कोई बताएगा कि सरकार के जो नुमाइंदा यह तर्क बखार रहा है उसकी राजनीति अब तक कैसे चलती रही है। क्या मात्रा सांसद और मंत्री पद के वेतन से उनके घर परिवार , जमीन जायदाद , धन संपत्ति और राजनीति चल रही है ? संसद और कोर्ट में रखी हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रंथो की कसमे खाने वाले नेता जिस तरह से लोकतंत्र का मजाक उड़ाते रहे है , कही , किसी देश में देखने को मिलता है क्या ? कह सकते है कि जो खुद पाक साफ़ नहीं वह दुसरो को नशीहत क्या देगा ? लेकिन नशीहत तो दी जा रही है।

संसद के दोनों सदनों में बैठे बीजेपी और उसके समर्थक नेता कसम खाकर धार्मिक ग्रंथो का मजाक तो उड़ाते रहे ही है क्या वे भारतीय संस्कृति में कसम खाने की प्रवृति के तहत अपने बेटे की कसम कहकर कह सकते है की जनता की सेवा में आने के बाद उन्होंने गलत काम नहीं किया ? बेईमानी नहीं की। घूसखोरी नहीं की। दलाली नहीं की और जनता की योजनाओ को लुटा नहीं ? लोगो को भड़काया नहीं ? देश में दंगे की राजनीति शुरू नहीं की ? झूठी गवाही नहीं की ? और सबसे बड़ी बात की चाहे जैसे भी हो काली कमाई नहीं की ? २ से चार प्रतिशत नेताओ के बारे में ऐसा नहीं कह सकता लेकिन बाकी नेताओ की राजनीति के पीछे की राजनीति केवल लूट और जनता को बांटकर अपना उल्लू सीधा करने के अलावा आज तक नहीं हुआ है। जब कालेधन की चुनावी राजनीति से ही नेतागिरी इस देश में चलती रही है तो भक्ति और द्रोही की बात बेईमानी ही है।

 अपने फेसबुक वाल पर वरिष्ठ लेखक पत्रकार  'अखिलेश अखिल '
अपने फेसबुक वाल पर वरिष्ठ लेखक पत्रकार ‘अखिलेश अखिल ‘

क्या बीजेपी वाले इस बात का जबाब देंगे कि इस देश में जिन लोगो , बनियो [व्यापार करनेवालो ],कॉर्पोरेट ,नौकरीपेशा वालो ,दलालो के पास धन है, वह पाक साफ़ है। क्या उन्होंने चावल में कंकड़ नहीं मिलाया ? क्या मिलावट का धंधा नहीं किया ? क्या असली की जगह नकली सामान नहीं बेचीं ? और क्या को छुपाने के लिए सरकार और उनके लोगो को घुस नहीं दिए ? थेथरई की भी हद होती है। गाव देहात में सरकारी योजनाओ को लूटकर नए राजनितिक बननेवाले जो कल तक मजूरी करके पेट चलाते थे आज लाखो के झंडे बैनर बना रहे है , बड़ी बड़ी गाड़ियों में दौर रहे है , आखिर लूट और भ्रष्टाचार की कमाई से ही संभव है। मोदी जी नोटबंदी कामयाब हो ,सबकी चाहत है लेकिन बेईमान चरित्र वाले कभी बदल नहीं सकते। यही परेशानी है।

विपक्ष की राजनीति तो और भी भयावह है। लगभग ४० सालो से सत्ता में रही कांग्रेस के पास कहने के लिए क्या है ? ४० सालो में देश में विकास किया तो विनाश भी कम नहीं हुआ। भ्रष्टाचार की गंगोत्री इसी कांग्रेस की राजनीति में फलती फूलती रही। आज कांग्रेस जनता का हवाला दे रही है कि नोटबंदी से देश तबाह है। तबाही तो तमाम तरह के भ्रष्टाचार से हुयी थी। यह बात और है की उस लूट में सभी दाल के लोग शामिल थे , दलाल वर्ग शामिल थे और नौकरशाह शामिल थे। कांग्रेस के काल के नौकशाह आज भी मोदी सरकार में काम कर रहे है। क्या उनकी अब नियत बदल गयी ? ऐसा कैसे हो सकता है ? क्या किसी का चरित्र इतना जल्दी बदल जाता है ? नरसिंहा राव से लेकर मनमोहन सिंह तक की पूरी सरकार भ्रष्टाचार से तर -बतर थी। नोटबंदी का विरोध कांग्रेस नहीं कर रही। जैसा की उसके नेता कह रहे है। फिर विरोध किस बात का ? कह रहे है की प्रक्रिया में दोष है। यही दोष तो तमाम तरह से घोटाले में भी थे।

और ये क्षेत्रीय दाल वाले किस मुह से जनता के पास जा रहे है ? किस मुह से नोटबंदी का विरोध कर रहे है ? उनकी चुनावी राजनीति कैसे चलती है ,पहले उसके बारे में जबाब क्यों नहीं देते ? जिस दल की ना कोई विदेश नीति है , ना अर्थ नीति और ना ही देश चलाने का रोड मैप। शातिर अपराधियो , लुटेरो , जातिवादियों ,ठगों और वंशवादियो के दम पर चल रही राजनीति आखिर देश का क्या भला करेगी ? क्या कोई भी ऐसी क्षेत्रीय पार्टी है जो डंके की चोट पर कहे की उसने देश के धन का दुरूपयोग नहीं किया ? योजनाओं को नहीं लुटा ? भ्रष्टाचार नहीं किया ? हिन्दू -मुसलमानो के बीच की राजनीति नहीं की ? गुंडई और लंपटई के दम पर और जाति के नाम पर राजनितिक खेल करने वाले तमाम क्षेत्रीय दलों की राजनीति पाखण्ड से भरी हुयी है।

इधर पिछले तीन वर्षो से भक्त और भक्ति की राजनीति पुरे शबाब पर है। इस तरह की भक्ति पहले कभी नहीं देखि गयी। जो भक्त नहीं वह भारतीय नहीं। देश द्रोही तक उसे कहा जा रहा है। यानी के इस देश में मोदी और बीजेपी की राजनीति पर सवाल उठाने वाले हर लोग देश द्रोही है। फिर ऐसे में देश द्रोहियो से भरे इस देश में किसी बड़े सर्जिकल स्ट्राइक की जरुरत है। सबको फांसी क्यों ना दे दी जाए ? कहते है कि २०१४ के चुनाव में बीजेपी को कोई ३१ फीसदी जनता ने वोट किया था। ६९ फीसदी जनता अन्य पार्टियों में बट गयी थी। हो सकता है कि ६९ फीसदी जनता में से फिर १० फीसदी जनता मोदी की राजनीति और देश सेवा के करीब पहुच गयी हो। तो क्या ५९ फीसदी जनता देश द्रोही है ? ऐसे देश द्रोहियो के साथ क्या किया जाना चाहिए ? देश भक्त और देश द्रोही में जनता और मीडिया बट रही लेकिन सरकार मौन है।

गजब देश है। कुछ इसी तरह की कहानी ७७ में देखने को मिली थी। जयप्रकाश के नाम पर पूरी जनता एक थी। चुनाव हुए , जनता पार्टी की सरकार बनी। ७४ के तमाम आंदोलनकारी सरकार में शामिल हुए। भ्रष्टाचार और लंपटई के कारण सरकार गिर गयी। बाद की राजनीति आपके सामने है। जेपी नहीं रहे। लेकिन केंद्र से लेकर राज्यो में राजनितिक गिरोह चला रहे अधिकतर नेता उसी जेपी आंदोलन से निकले है। अधिकतर बेईमान और ठग। राजनीति के लिए कलंक। यही भक्ति आज भी देखने को मिल रही है।

संभव है हमें बीजेपी की राजनीति रास नहीं आती , लेकिन हम इस देश के नागरिक है , देश प्रेमी है। बेईमान नहीं है , फिर हम देशद्रोही कैसे हो गए ? नोटबंदी की राजनीति के पीछे की राजनीति जो भो हो पक्ष विपक्ष की मंशा कतई ठीक नहीं। अगर जनता को परेशानी हो रही है तो सरकार सबसे पहले जनता की परेशानी को देखे। भक्ति की तराजू पर जनता को नहीं तौले।

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