जेएनयू में चल रहा है षडयंत्र की पराकाष्ठा

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दोस्तों, पटना में एक गांधी मैदान है। इसके पश्चिमी-उत्तरी कोने पर छोटा सा पार्क है। नाम है शहीद पीर अली पार्क। इतिहास के अनुसार गांधी मैदान के इसी हिस्से में अंग्रेजों ने पीर अली और उनके साथियों को पेड़ से लटका कर मौत की सजा दी थी।

वर्ष 2007-08 में जब इस पार्क का निर्माण हो रहा था तब सूबे में जदयू-भाजपा की सरकार थी। जो विभाग यह काम कर रहा था, उसके मंत्री भाजपाई थे। इस कारण जब पार्क के नामकरण की बारी आयी तब नाम रखा गया दीनदयाल उपाध्याय पार्क। जब लोगों ने इसका विरोध किया तब इस पार्क को शहीद पीर अली का नाम मिला। ऐसा इस कारण हुआ कि सूबे के मुखिया नीतीश कुमार थे। यह एक छोटा सा उदाहरण है भाजपाई षडयंत्र की।

खैर जो कुछ जेएनयू में चल रहा है, वह षडयंत्र की पराकाष्ठा है। यह सर्वविदित है कि यह देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है जिसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान है।

हाल के दशक में ज्ञान के इस सबसे बड़े केंद्र में दलित-पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व बढा है। लिहाजा जेएनयू में राजनीतिक विचारधाराओं की प्रतिस्पर्धा भी बढी है।

अब जेएनयू में हर तरह की विचारधारा के समर्थक हैं। फ़िर चाहे वे आम्बेदकरवादी हों, भगवावादी हों, गांधीवादी हों या फ़िर नक्सलवादी। अब मंडलवादियों का समूह भी समर्थ हो चला है। इस प्रकार जेएनयू देश की राजनीति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण केंद्र है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हाल के दिनों में वामपंथी समूह के लोगों ने जो कुछ गतिविधि विश्वविद्यालय परिसर में किया, वह सही है। अफ़जल गुरु एक आतंकी था। उसने समस्याओं के लोकतांत्रिक समाधान के बदले हिंसक तरीके का उपयोग किया। देश के कानून ने उसे उसकी सजा दी।

अब यदि किसी भी व्यक्ति को अफ़जल गुरु को दिये गये दंड को लेकर सवाल उठाना है तो वह स्वतंत्र है और इसके लिए अहिंसक लोकतांत्रिक तरीके हैं।

लेकिन अफ़जल गुरु के महिमा मंडन ने उन भगवावादियों को अवसर दे दिया है जो स्वयं तिरंगा के नाम से परहेज करते हैं। उनके लिए देश से बड़ा उनका धर्म है। चूंकि देश में उनकी सरकार है, इसलिए वे जेएनयू को बंद किये जाने या फ़िर उसके अस्तित्व को अपने हिसाब से बदलने की मांग करने लगे हैं।

बहरहाल यह भी सही है कि लोकतंत्र में शासक वर्ग सबसे डरपोक होता है। उसे अपनी सत्ता के खोने का डर सताता रहता है। इसलिए वह कोशिश करता है कि उसकी सत्ता हमेशा के लिए बनी रहे। लेकिन लोकतंत्र से पहले जब इस देश में राजतंत्र था तब भी सत्ता किसी एक के पास नहीं रही। जैसे पूरा ब्रह्मांड गतिशील है, वैसे ही सत्ता भी गतिशील और परिवर्तनशील है। यह अलग बात है कि आरएसएस के लोग अब भी हिन्दूवादी जकड़न के कारण जड़त्व की स्थिति में हैं। जेएनयू के प्रति उनका पूर्वाग्रह इसलिए भी है क्योंकि जेएनयू परिवर्तनशीलता और प्रगतिशीलता का सबसे बड़ा केंद्र है।  

वरिष्ठ पत्रकार नवल कुमार की संपादकीय विश्लेषण
वरिष्ठ पत्रकार नवल कुमार की संपादकीय विश्लेषण

साभारः  www.apnabihar.org  

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