जुबान नही,कलम बोलनी चाहिए पत्रकार की

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एक समय था जब पत्रकार बड़े जिम्मेवार और सभ्य व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। आज भी मूलतः यही छवि है।

परंतु वर्तमान परिस्थियों के सन्दर्भ में कुछ तथाकथित व्यक्तियों द्वारा इसे मूल परिभाषा से परिवर्तित करने का परिक्षण प्रतिभूत होता प्रतीत हो रहा है।

पत्रकार की ताकत उनकी कलम में होती है और उनकी भावना या व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी उनकी लेखनी में परिलक्षित होती है।

वार्तालाप, व्यवहार एवं चरित्र में भद्रता की सर्वोत्तम परकाष्ठा का प्रयास निहित होता है। परंतु पत्रकार यदि अपनी प्रतिक्रिया किसी पक्ष के सम्बन्ध में अमर्यादित शब्दों को वाणी से उच्चारित करके दें तो निश्चित रूप से किसी परिपक्व एवं वरिष्ठ पत्रकार के सन्दर्भ में विश्वास से परे प्रतीत होता है।

निजी भावना से ऊपर जनभावना को लाने के प्रति प्रतिबद्धता केलिए आमलोगों के विश्वास पटल पर चित्रित होते हैं, वो होते हैं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ माने जाने वाले पत्रकार।

अतः परिस्थियों की जंजीरे लाख विषम स्थितियों को सामने लाये,पत्रकारो से कम से कम मूल सिद्धांतों पर अडिग रहने की आशा रहती है।

दरभंगा से पत्रकार  अभिषेक कुमार की नजर

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