जीत आखिरकार पेड की हुई न कि न्यूज की !

Share Button

2014 पेड न्यूज का वर्ष या फिर सोशल मीडिया पर राजनेताओं और कॉरपोरेट घरानों का रहा अदृश्य कब्जा। हथियार था कलम या फिर पैसा। होड़ खबरों को परोसने की, भूल मीडिया के दायरों को लांघने का। मीडिया के इस क्रांति में शायद ही कोई वर्ष ऐसा भी रहा होगा कि मीडिया खुलेआम बिकती नजर आयी होंगी।

वर्ष 2014 बढ़ती मीडिया के दायरों का अनोखा पेशकश रहा। कुछेक को छोड़कर बात करें तो कई राजनीतिक दलों ने मीडिया को अपने रूख मोड़ते हुए वाहवाही लूटी और राजकाज में अहम भूमिका अदा किया।

media-newsपेड न्यूज के लिए कॉरपोरेट घरानों के एजेंटों ने बेशक इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। बात क्षेत्रीय हो या फिर राष्ट्रीय स्तर की। हर तरफ पेड न्यूज का दौर रहा।

कुछ उभरते और नामचीन मीडिया कंपनियां तरह-तरह के हथकंडे अपनाते दिखें तो कईयो ने दायरों को बरकरार रखा।

समाज को मुख्यधारा से जोड़ने और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले उन मीडिया प्रहररियों के आंखों ने भी देश के उज्जवल भविष्य को भूलकर वर्तमान की काली करतूतों पर पर्दे डालते नजर आयें।

जीत आखिरकार पेड की हुई न कि न्यूज की। हालांकि उन मीडिया कंपनियों के प्रति देश की जनता की नजर तीखी जरूर रही। पर सवाल खड़े करने वाले अगर सवाल के घेरे में रहे तो देश की तरक्की और आम जनों के लिए इसे बेहतर संकेत नहीं कहा जा सकता। बीत गए।

 वर्ष 2014 पर क्या वैसे मीडिया कंपनियां अपनी कार्य संस्कृति में सुधार ला पायेंगे या फिर इनके लिए पेड न्यूज  ही मोटो होगा। क्या पत्रकारिता की साख कुछ ही के हाथों रह जायेगी। सवाल तो कई हैं…….

   …..एजाज  (स्वतंत्र पत्रकार),  मधुपुर।

                                               

 

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...