जारी है झारखंड सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में लूट का खेल

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prdaझारखंड सूचना एवं जन संपर्क विभाग में मची लूट का कोई सानी नहीं है। एक कोयलाकर्मी के विभागीय निदेशक बनाये जाने के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है। शायद उनकी कोई अंदरुनी कमी लोगों के हाथ लगी हुई है।  इस विभाग के अन्य जिम्मेवार अधिकारी पूरी तरह बेलगाम हो गये हैं।  यहां हर काम कमीशन पर तय होता है। जो जितना अधिक कमीशन का लेन-देन करता है, उसे उतना ही कार्यादि मिलता है।

समाचार पत्र-पत्रिकाओं एंव न्यूज़ चैनलों को विज्ञापन आवंटन में तो लूट का खुला खेल नज़र आता है। कहने को तो यहां अभी तक बिहार विज्ञापन नियमावली (नीति)  लागू है, लेकिन सच पुछिये तो यहां कायदा-कानून  नाम की कोई चीज नहीं है। सब कुछ सेटिंग पर निर्भर है।

अधिकारियों ने विज्ञापन के समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज़ चैनलों सहित अन्य माध्यमों को अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार बांट लिया है। जिनसे उन्हें बंधी-बंधाई मोटी रकम मिल जाती है। इन लोगों के राजनीतिक रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये अपने पदों पर वर्षों से जमे पड़े हैं। उनके लूट में शामिल स्वंयभू संपादक-पत्रकार भी उनके पैरवी में जी जान लगाये रहते हैं।

झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा विभिन्न माध्यमों को जारी विज्ञापनो ं का अवलोकन करने पर साफ जाहिर होता है कि यहां विज्ञापनादि के नाम पर सरकारी खजाने की लूट का एक बड़ा रैकेट चल रहा है। इस लूट में विभागीय अधिकारी एवं कई संपादक-पत्रकार आकंठ डूबे हैं। यदि घालमेल का निष्पक्षतापूर्वक जांच की जाये तो  सबकी घिग्गी बंध जायेगी।

सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत उपलब्ध कराई गई अप्रमाणित जानकारी के अनुसार झारखंड राज्य द्वारा स्वीकृत दैनिक समाचार पत्रों की कुल संख्या-92 है, जो  राजधानी रांची समेत प्रदेश-देश के अन्य हिस्सों से प्रकाशित होती है। हालांकि इससे इतर भी समाचार पत्रों को विज्ञापन मद में लाखों की राशि निर्गत की गई है।

कई समाचार पत्र-पत्रिकायें तो ऐसे हैं, जिन्हें प्रकाशन के पूर्व ही लाखों के विज्ञापन बांट दिये गये हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन सिर्फ विज्ञापन की राशि लुटने के लिये ही हो रहा है।  कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन त्रैमासिक-अर्धवार्षिक-वार्षिक विशेषांक के रुप में सिर्फ दिखावे के लिये होता है, जबकि उसे निर्धारित समय पर ही विज्ञापन का आवंटन कर दिया जाता है। 

उदाहरणार्थ, विगत माह एक पत्रिका का नवंबर-दिसंबर माह अंक देख कर दंग रह गया, उसमें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झारखंड सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा तात्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा, डीप्टी सीएम सुदेश महतो, डिप्टी सीएम हेमंत सोरेन समेत सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष शिबू सोरेन की रंगीन शुकामना संदेश प्रकाशित था। इस पत्रिका को देखने से साफ स्पष्ट था कि पूरे एक वर्ष के तय तिथि के विज्ञापन भी एकमुश्त प्रकाशित किये गये थे। कहा जाता है कि विभाग ने उन सभी विज्ञापनों की राशि का भुगतान कर दिया है।

 बिना निबंधित एक उर्दू साप्ताहिक पत्र का आलम यह है कि उसे प्रथम अंक के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण रंगीन पेज का विज्ञापन मिल जाता है। उसका भुगतान भी हो जाता है। हाल ही में गिरीडिह से प्रकाशित  एक मासिक समाचार पत्रिका का हाल भी यही था। ताज्जूब की बात तो यह है कि इस पत्रिका के प्रथम अंक का लोकार्पन तात्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा औऱ विधानसभा स्पीकर सीपी सिंह के कर कमलो द्वारा किया गया था। उस अंक में भी  झारखंड सूचना एवं जन संपर्क विभाग  के आलावे जिलावार सरकारीविज्ञापन प्रकाशित थे।

झारखंड में राजधानी रांची समेत कई क्षेत्रों में ऐसे फर्जी न्यूज़ चैनलों की भरमार है , बिना निबंधन के  जो किसी प्रकार की तकनीकी गैर तकनिकी नियमों को पूरा नहीं करते। उसका समाचार प्रसारण भी खुद के भवन तक ही सीमित रहता है। फिर भी  सेटेलाइटधारी बन कर विज्ञापन का माल उड़ा रहा है। सरकारी खजाने का बंदरबांट कर रहा है। 

………… मुकेश भारतीय 

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