जरुरी है पत्रकार वीरेन्द्र मडंल से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय जांच

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राज़नामा डेस्क। लोकतंत्र को चार स्तंभ चलाते हैं, यानि समाज, देश दुनिया को चलाने का जिम्मा इन्हीं चार स्तंभों पर टिका होता है। लेकिन बीते तीन-चार सालों से सरायकेला खरसावां जिला में ये चारों स्तंभ पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।

भले ही राज्य के मुखिया और रांची में बैठे आला अधिकारी इस पर गंभीर नहीं हैं, लेकिन यही वह जिला है, जिसने राज्य के मुख्यमंत्री को भी जलील किया। यहां बात कर रहे हैं राजनगर प्रखंड का, जहां बीते 3 सालों में जिस तरह से सिस्टम पूरी तरह से करप्ट और भ्रष्ट हो चुका है।

पत्रकार वीरेंद्र मंडल…..

इसको लेकर न तो जिले के किसी एसपी द्वारा न उपायुक्त द्वारा और न ही यहां के जनप्रतिनिधियों द्वारा संज्ञान लिया जा रहा है। हद तो ये है कि सभी मीडिया और खोजी चैनल भी पूरी तरह से सिस्टम के आगे नतमस्तक हो चुके है।

राजनगर थाना से शुरू हुआ विवाद अब धीरे-धीरे प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी अपनी चपेट में ले चुका है। दोष किसका है, यह तय करने वाला कोई नहीं। हैरान करने वाली बात ये है कि सारा का सारा सिस्टम एक निर्दोष युवक के पीछे हाथ धोकर पड़ा है, वह भी युवक अगर बाहुबली, दबंग पैसे वाला, जमींदार, राजनीतिक रसूख रखने वाला रहे तब इसे कुछ हद तक जायज भी ठहराया जा सकता है, लेकिन युवक बेहद ही मामूली आंचलिक स्तर का पत्रकार है।

वीरेन्द्र मडंल, जो सिस्टम के आगे नहीं झुका तो सिस्टम ने उसे ही करप्ट साबित करने में जुट गया और लगातार पूरा महकमा उसे और उसके परिवार को नेस्तनाबूद करने में जुट गया।

वैसे यहां युवक के हौसले की दाद देनी होगी, जिसने हर झंझावतों का डटकर मुकाबला करना शुरू किया और कानूनी लड़ाई लड़ कर अपने लिए इंसाफ के दरवाजे खटखटाना शुरू किया।

बता दें कि सरायकेला खरसावां जिले के राजनगर थाना अंतर्गत बनकाटी गांव का एक युवक जिसका नाम वीरेंद्र मंडल है, वह बीते 3 सालों से लगातार सिस्टम के खिलाफ अकेला लड़ाई लड़ रहा है।

जहां अकेले वीरेंद्र तत्कालीन एसपी चंदन कुमार सिन्हा, डीएसपी दीपक कुमार, तत्कालीन राजनगर थाना प्रभारी विजय प्रकाश सिन्हा, तत्कालीन चांडिल एसडीपीओ संदीप भगत, डीसी छवि रंजन, मुखिया सावित्री मुर्मू और पत्रकारों का एक खास गिरोह के साथ अकेला अभिमन्यु की तरह लड़ रहा है।

मामला तब शुरू हुई, जब राजनगर थाना क्षेत्र के एक प्रज्ञा केंद्र में लूट की घटना घटी और उसमें शक के आधार पर वीरेंद्र मंडल को पुलिस ने उठाया। 4 दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर उसके साथ अमानवीय बर्ताव कर जुर्म कबूल के लिए दबाव बनाया, जब वह नहीं टूटा तो उसे अधमरा कर उसके घर के बाहर फेंक दिया।

जहां से परिजनों ने युवक को एमजीएम अस्पताल पहुंचाया। जहां 10 दिनों तक आईसीयू में रहने के बाद युवक ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने की ठान ली और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और झारखंड हाई कोर्ट में केस दर्ज कराया।

उसके बाद जब राष्ट्रीय मानवाधिकार ने मामले को बेहद संगीन बताते हुए राज्य के मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखकर मामले से जुड़े सभी अधिकारियों को दंडित किए जाने और पीड़ित युवक को दो लाख मुआवजा देने का निर्देश जारी किया, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों ने चिट्ठी को दबाकर झूठे मामले में बेवजह युवक को एससी-एसटी एक्ट जैसे संगीन मामले में फंसा कर उसके पिता के साथ जेल भिजवा दिया गया।

जेल भेजने में जल्दबाजी भी इतनी कि युवक को अपनी बात कहने तक का मौका नहीं दिया गया। खैर मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। लेकिन ताजा तरीन मामला जिस तरह से राजनगर में उठा उससे तो यह साफ हो गया कि पूरे राजनगर प्रखंड में कोई भी घटना घटे, कोई भी विवाद बढ़ा तो वीरेंद्र मंडल को बेवजह घसीट कर पुलिस प्रशासन अपना खुन्नस निकाल सकती है।

याद दिला दें कि बीते दिनों जमशेदपुर के आरटीआई कार्यकर्ता दिनेश महतो ने सूचना के अधिकार के तहत जुटाई गई जानकारियों के आधार पर गोविंदपुर पंचायत के वित्तीय वर्ष 2018- 19 में पूर्ण हुए योजनाओं की जांच लोकायुक्त से कराए जाने संबंधी चिट्ठी लिखी।

यह बातें मीडिया में भी प्रकाशित की गई मीडिया ने अपने अपने स्तर से आकलन भी किया और खबरें भी बनाई, लेकिन जिस तरह से रविवार को छुट्टी के दिन राजनगर प्रखंड विकास पदाधिकारी ने प्रेस कांफ्रेंस कर मुखिया को पाक- साफ बताते हुए पूरे मामले के लिए साजिशकर्ता के रूप में वीरेंद्र मंडल का नाम बता दिया। यह कहां तक जायज है !

वैसे किसी भी मीडिया हाउस ने बीडीओ के इस तुगलकी सफाई को तवज्जो नहीं दिया। यह अच्छी बात है। लेकिन एक खास मीडिया घराना दैनिक जागरण ने बीडीओ के बातों को बढ़-चढ़कर प्रसारित किया और सीधा हमला वीरेंद्र मंडल पर कर दिया।

वैसे वीरेंद्र मंडल ने इसके लिए भी कानूनी लड़ाई लड़ने की ठानी और दैनिक जागरण, सरायकेला डीसी-एसपी और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को पूरे मामले में अपना पक्ष रखा।

उधर डीसी ने अपने अधीनस्थ सभी पदाधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए वगैर उनसे सहमति लिए मीडिया में बयानबाजी करने की रोक लगाई। इधर दैनिक जागरण जमशेदपुर के संपादक ने वीरेंद्र मंडल को कार्यालय में बुलाया और पहले तो यह कहकर डराने का प्रयास किया कि उनके पास बीडीओ का बयान मौजूद है।

लेकिन जब बिरेन्द्र ने उस बयान की कॉपी मांगी तो संपादक ने 2 दिनों का वक्त मांगा। इधर वीरेंद्र ने घर में काली पूजा होने की बात कहकर बुधवार को मिलने की बात कही। उधर वीरेंद्र के रुख को देखकर संपादक पूरा मामला समझ गए उसके बाद क्या हुआ वो संपादक और सरायकेला रिपोर्टर ही जाने। 

उसके बाद वहां के पत्रकार ने खुद को फंसता देख पहले वीरेंद्र से मामले में आगे कार्रवाई नहीं किए जाने की गुहार लगाई। उसके बाद वीरेंद्र के पक्ष में छोटा सा खबर बना दिया जो आज के दैनिक जागरण में छपी है। वैसे यह नियमानुकूल नहीं है।

अब सवाल यह उठता है की बीडियो और मुखिया के साथ दैनिक जागरण के संवाददाता की क्या मिलीभगत है इसकी भी जांच जरूरी है। और दैनिक जागरण सरायकेला के संवाददाता ने जिस तरह से इस खबर को छाप कर सोशल मीडिया में वायरल किया उसके पीछे का उद्देश्य क्या है।

उधर आरटीआई कार्यकर्ता ने भी जांच की मांग की है कि इसमें वीरेंद्र मंडल कहां से आ गया। हर स्तर पर जांच जरूरी है।

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