चारा चोर 33 पत्रकार और अंधा कानून

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चारा  चोर पत्रकार…...

चारा घोटाले में नेताओं की संलिप्तता को लेकर तमाम तरह के आरोप -प्रत्यारोप चल रहे हैं। न्यायपालिका और कार्यपालिका की संलिप्तता भी उजागर हुई है, लेकिन चौथे खम्भे की भूमिका पर चुप्पी है ? सीबीआई जब घोटाले की जाँच कर रही थी, तब उसे कुछ पत्रकारों के बारे में भी जानकारी मिली थी, जिन्होंने खबर दबाने के लिये “चारा” लिया था। इसमें संवाददाता से लेकर संपादक तक शामिल थे। सीबीआई की पुरानी फाइलों में 33 पत्रकारों के नाम दर्ज हैं। भले उनपर मुकदमा न चला हो लेकिन अब वे नाम सार्वजनिक किये जाने चाहिये, ताकि लोग दागी राजनेताओ की तरह दागी पत्रकारों को भी जान लें 

अँधा कानून ……..

58 दलितों के हत्यारे बाइज्जत बरी कर दिये गये क्योकि कोर्ट को उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। न्याय की देवी की आँखों पर तो पट्टी बंधी है , फिर सबूत दिखेगा कैसे ? यह भी संभव है की पुलिस ने जानबूझ कर कमजोर सबूत पेश किये हों। वैसे पटना हाई कोर्ट से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी। यह वही हाई कोर्ट है जिसने वैशाली में 8 साल की बच्ची की दुष्कर्म के बाद हत्या करनेवाले नरपिचास को बरी कर दिया था। जबकि निचली अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।

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