गेटवे ऑफ इंडियाः भूले बिसरे बात पुरानी

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अनय अनासक्त जब यहाँ पर गेटवे ऑफ इंडिया की इमारत नहीं बनी थी

gate of indiaसाम्राज्यवाद इस दरवाज़े से हमारे देश में नहीं आया था । वह एक अदृश्य द्वार था जिसे यहाँ के नैतिक रूप से कमज़ोर राजाओं,अपनी महत्वाकाँक्षाओं के लिए जीते सामंतों , दैहिक सुखों में डूबे ज़मीन्दारों और चारित्रिक पतन की गर्त में समा चुके धर्म के मठाधीशों ने इन विदेशियों के लिए खोल दिया था । एक काली आन्धी की तरह वह आया और ग़रीबी ,अज्ञानता के शिकार करोड़ों लोग उसकी चपेट में आ गए ।

वे विदेशी थे..यहाँ की भोली-भाली मेहनतकश जनता को उन्होंने सब्ज़- बाग़ दिखाए फिर ज़ोर ज़बरदस्ती से उन्हें अपना गुलाम बना लिया । आर्थिक लूट को विकास का नाम देकर भारतीय पूंजीपतियों के साथ उन्होंने सम्बन्ध बनाए और इस देश की जनता के माथे पर लिख दिया कि यही उनकी नियति है । उनकी बनाई मिलों की चिमनियों से निकला धुआँ उन मज़दूरों के फेफड़ों में समाता रहा जिनके पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के अलावा कुछ नहीं था ।

आज भी कहीं कुछ बदला है ? बदला है केवल दृश्य..मुम्बई के इस गेट वे ऑफ इंडिया पर बग्घियों के स्थान पर अब चमचमाती विदेशी कारें हैं , जिनमें विदेशी परिधान में अपने ही देश के पूंजीपति हैं । दूसरी ओर वे मलिन बस्तियाँ हैं जहाँ अब भी सूरज झाँकने नहीं आता ।

सफेदपोश लोगों के ऑक्सीज़न ज़ोन जैसे शहर में गन्दी बदबूदार हवा के झोंके की तरह हैं ये बस्तियाँ । मुम्बई की इन बस्तियों को देखता हूँ तो फैज़ याद आते हैं …” जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म/ ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए / जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से (बीमारी की भट्टियों से) / पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से / लौट आती है इधर को भी नज़र क्या कीजे । क्या करूँ .. यह नज़र बार बार इधर ही को लौट आती है ।

साभारः फेसबुक वाल से

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