गुमनामी की गर्त में प्रथम महिला केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री के गाँव के टीले की विरासत !

Share Button

नालंदा।  ऐतिहासिक संपदा की दृष्टि से चंडी प्रखंड का अपना महत्व रहा है । जहाँ रूखाई गढ़ टीले की खुदाई में कई प्राचीन सभ्यताओ के अवशेष प्राप्त हुए है । नालंदा के पास रूक्मिणी स्थान की खुदाई चल रहीं है, जहाँ प्राचीन काल की मूर्ति निकल रही है । वहीं नालंदा के चंडी प्रखंड का तुलसी गढ़ टीला गुमनामी के दौर से गुजर रहा है । पुरातत्व विभाग सर्वेक्षण के एक दशक बाद भी टीले की सुध नहीं ले पा रही है।

गाँव में ऐतिहासिक टीले जिनकी ऊँचाई 6 फीट से 30 फीट होती है,जिसे डीह, कोट,या गढ़ के नाम से जाना जाता है । वैसे भी गढ़ आम स्थानों की अपेक्षा ऊँचे होते है ।जिन पर सदियों तक मनुष्यों का निवास स्थान माना जाता रहा है। इसी गढ़ की वजह से तुलसी गढ़ का अपना विशेष महत्व रहा है ।

युवा पत्रकार जयप्रकाश नवीन की खोजपरक रिपोर्ट...
युवा पत्रकार जयप्रकाश नवीन की खोजपरक रिपोर्ट…

यहाँ प्राचीन सभ्यता के इतिहास का एक विशाल काय स्तूप संरचना मौजूद है ।जिसको लेकर ग्रामीणों में आज भी कौतूहल बना हुआ है कि इस टीले के अंदर आखिर दफन क्या है? इस टीले की ऊँचाई 30 फीट और व्यास 60 मीटर है ।इसके गर्भ में पीढ़ियों का इतिहास छिपा हुआ है । लेकिन यह गढ़ उपेक्षा की वजह से सैकड़ों सालों से गुमनाम पड़ा है ।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 30 ए जैतीपुर-हरनौत मार्ग पर स्थित है तुलसी गढ़ । जिसका पुरातात्विक महत्व तो है ही, राजनीतिक रूप से भी यह गांव प्रसिद्ध रहा है ।

आजाद भारत की संसद में कदम रखते ही जिन्होंने नारी का सशक्त परिचय दिया ।देश की प्रथम महिला केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री तथा ‘संसद सुंदरी ‘के नाम से लोकप्रिय रही स्व. तारकेश्वरी सिन्हा इसी गाँव की थी।

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर का भी इस गाँव से काफी लगाव रहा था ।लेकिन गाँव के हजारों साल का इतिहास भी इसकी पहचान है।रूखाई की तरह ही यहां भी समकालीन सभ्यता होने की बात कहीं जाती है ।देखा जाए तो दोनों टीलो में काफी समानताए भी है । लेकिन यह पुरास्थल सैकड़ों वर्षों से उपेक्षित है ।

माना जाता है कि यहां पालकालीन सभ्यता से पूर्व यहां लोगों का ठिकाना था ।इसके चारों ओर खाई थी जिसका पानी लोग पेयजल एवं सिंचाई के उपयोग में लाते थे।कालांतर में आबादी बढ़ने के साथ लोग टीले से नीचे उतरने लगे । इन ऊँचे टीलेनुमा स्थल के बारे में यह भी धारणा रही है कि वहां कई तरह के अवशेष जैसे पत्थर ,हड्डी, औजारे, मिट्टी के बर्तन, ईटे आदि रह जाती है । धीरे -धीरे इन वस्तुओं के उपर मिट्टी की कई परते चढ़ जाती है। इस प्रकार के टीले पर अवशेष खुदाई में आसानी से प्राप्त हो सकते है । इसके प्राप्त अवशेष को पहचान कर आसानी से ज्ञात किया जा सकता है कि उक्त स्थल कितना पुराना है ।

तुलसी गढ़ के सुबोध सिंह ने बताया कि इस टीले पर दो सौ साल पुराना कूल देवी का मंदिर है ।जो गांव वाले के लिए धार्मिक आस्था का केन्द्र है ।संरक्षण के अभाव में इस टीले का ह्रास हो रहा है । अतिक्रमण कर घर मकान बनाया  जा रहा है ।स्वयं यहां के लोग अपने पूर्वजों के धरोहर को क्षति पहुँचा रहे हैं ।

सात साल पूर्व भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम टीले का अध्ययन कर जो गई आज तक सुध भी लेने नहीं पहुँचीं। जबकि रूखाई टीले की खुदाई एक साल पूर्व हो चुकी है ।लेकिन तुलसी गढ़ टीला आज भी उपेक्षित है। आखिर इस टीले का उत्खनन कब होगा, आखिर कब तक इसके गर्भ में अतीत का इतिहास दफन रहेगा। आखिर कब इस टीले के दिन फिरेगे ?  यह सवाल वर्षों से लोगों के जेहन में है ।

Share Button

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.