गणेश शंकर विधार्थी : हिंदी पत्रकारिता के मेरूदंड

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    -: एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क डेस्क :-

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जहाँ आजादी पूर्व की पत्रकारिता ‘मिशन’ थी और आजादी की लड़ाई की संवाहिका।आज की पत्रकारिता का आदर्श लोकतंत्र  को मजबूत करना है। पत्रकारिता वृत्ति भी है और कला भी। जनसेवा का यह विशिष्ट माध्यम है………..”

गणेश शंकर विधार्थी पत्रकारिता के मेरूदंड थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था।वे आजादी के पूर्व पत्रकारिता के कंटकाकीर्ण पथ के लिए आलोक स्तंभ थे। आजादी के दीवाने विधार्थी जी अंग्रेज़ी सत्ता के फौलादी पंजे का मुकाबला करने के लिए जनता में अलख जगाते रहे, आर्थिक अभावों से जूझते रहे, लेकिन सत्य पथ और संघर्ष से कभी विचलित नहीं हुए।

महान क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विधार्थी ने ‘प्रताप’ जैसा जानदार अखबार निकालकर क्रांति का प्राण फूंक दिया था। उनकी कलम जब चलती थी तो अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें तक हिल जाती थी। जिनकी मौत एक रहस्य बन गया था। सांप्रदायिक दंगों की वजह से 25 मार्च, 1931 को हो गई थी। उनका शव 27 मार्च को अस्पताल में मिला, जहाँ 29 मार्च को चुपके से उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया ।

गणेश शंकर विधार्थी एक निडर,निष्पक्ष और स्वतंत्रता सेनानी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम अजर अमर है। वे एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा रखी थी। विधार्थी जी ने कलम और अपनी वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसावादी विचारों और क्रांतिकारियों को समान रूप से समर्थन और सहयोग दिया था।

गणेश शंकर विधार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद में हुआ था। अध्ययन के बाद 1908 में उन्होंने करेंसी ऑफिस में नौकरी की। लेकिन एक अंग्रेज अधिकारी से विवाद होने के बाद नौकरी छोड़ कर कानपुर के पृथ्वी नाथ हाईस्कूल में 1910 तक अध्यापन का काम किया।

इसी दौरान उन्होंने सरस्वती, कर्मयोगी और उर्दू स्वराज में लेख लिखना शुरू किया। जल्द ही वे कर्मयोगी और स्वराज जैसे क्रांतिकारी पत्रों से जुड़े।उन्होंने ‘विधार्थी’ उपनाम अपनाया और इसी नाम से लिखना शुरू कर दिया।

गणेश शंकर विधार्थी की वैचारिक अग्नि दीक्षा लोकमान्य तिलक के विचार लोक में हुई थी। शब्द एवं भाषा के संस्कार उन्होंने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्राप्त किए थे। 1913 में साप्ताहिक ‘प्रताप’ निकला जो हिंदी का पहला सप्राण राष्ट्रीय पत्र सिद्ध हुआ, वही साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उदित हो रही नई प्रतिभाओं को प्रेरक मंच भी वह बना।

‘प्रताप’ से ही तिलक और गांधी के साथ-साथ लेनिन, बिस्मिल-अशफाक और भगतसिंह के औचित्य और तर्क हिंदी भाषी समाज को सुलभ हो पाएं।प्रेमचंद, गया प्रसाद शुक्ल, माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के रचनात्मक व्यक्तित्यों को संवारने में विधार्थी जी ने प्रमुख कारक की भूमिका निभाई।

पारसी शैली के नाटककार राधेश्याम कथावाचक और लोकनाट्य रूप नौटंकी के प्रवर्तक श्री कृष्ण पहलवान को प्रेरित -प्रोत्साहित करने का महत्व भी वे समझते थे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी का ध्यान उन पर गया। महावीर प्रसाद द्विवेदी उन्हें अपने साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में उप संपादक के पद पर कार्य करने का प्रस्ताव दिया।लेकिन उन्होंने ‘अभ्भुदय’ में नौकरी कर ली।

सन् 1913 में वे वापस कानपुर आ गए।एक क्रांतिकारी पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर अपना कैरियर प्रारंभ किया।उन्होंने क्रांतिकारी पत्रिका ‘प्रताप’ की स्थापना की। 1916 में उनकी पहली मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई। जिसके बाद उन्होंने अपने आप को देश के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने 1917-18 में ‘होम रूल’ में अग्रणी भूमिका निभाई।कानपुर में कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी किया।

1920 में उन्होंने ‘प्रताप’ का दैनिक संस्करण आरंभ किया।उसी साल उन्हें राय बरेली के किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने के कारण दो साल की कठोर कारावास की सजा हुई।जेल से छूटने के बाद भडकाऊ भाषण के आरोप में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।

1925 में कांग्रेस के राज्य विधानसभा चुनाव में भाग लेने के फैसले के बाद गणेश शंकर विधार्थी यूपी विधानसभा के लिए चुने गए। लेकिन 1929 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।उसके बाद उन्हें यूपी कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुना गया।उन्हें सत्याग्रह आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1930में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया।गांधी -इरविन पैक्ट के तहत उनकी रिहाई 9मार्च, 1931 को हुई।

पत्रकारिता के क्षेत्र में गणेश शंकर विधार्थी मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उनका लक्ष्य था जातीय स्मिता को साम्राज्यशाही शिकंजे से मुक्त कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाना और भारतीय संस्कृति और चेतना के अनुरूप स्वस्थ जनमानस का निर्माण। इस लक्ष्य के अनुरूप उन्होंने ‘प्रताप’ के माध्यम से जातीय समस्याओं पर प्रगतिशील दृष्टि से मनन किया।

गणेश शंकर विधार्थी की पत्रकार चेतना का दर्शन उनके प्रथम संपादकीय में व्यक्त विचारों से होता है। 9 नवम्बर, 1913 के ‘प्रताप’ की प्रथम संपादकीय टिप्पणी में सम्पादकीय नीति, आदर्श तथा उद्देश्य की विज्ञप्ति देते हुए लिखा था-“समस्त मानव जाति का उद्देश्य हमारा पर परमाउद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और जरूरी साधन हम भारत वर्ष की उन्नति को समझते हैं। किसी की अप्रशंसा,किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता किसी की घुडकी या धमकी हमें अपने सुमार्ग से विचलित नहीं कर सकेगी”

अपने प्रथम संपादकीय टिप्पणी का उपसंहार करते हुए उन्होंने लिखा -“जिस दिन हमारी आत्मा इतनी निर्बल हो जाएँ कि हम अपने प्यारे आदर्श से डिग जावे, जानबूझकर असत्य के पक्षपाती बनने की बेशर्मी करें और उदारता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता छोड़ देने की भीरूता दिखावे, वह दिन हमारे जीवन का अभागा दिन होगा और हम चाहते हैं कि हमारी उस नैतिक मृत्यु के साथ हमारे जीवन का भी अंत हो जाए।”

गणेश शंकर विधार्थी ने जहाँ एक ओर देशी रियासतों की चुनौतियाँ और कलुष पर प्रहार किया वहीं दूसरी ओर विदेशी शासन की धज्जियां भी उड़ाई ।एक दृष्टि से देखा जाएँ तो वे आधुनिक खोजी पत्रकारिता के जनक भी थे। जब खोजी पत्रकारिता का कोई वर्चस्व नहीं था।

उस समय ‘प्रताप’ के माध्यम से आम आदमी की छोटी -छोटी समस्याओं और राजशाही पर्दे में छिपे देशी रियासतों के भ्रष्टाचार को उजागर करने का काम किया।

‘प्रताप’ की सुरक्षित प्रतियाँ गवाह है कि गणेश शंकर विधार्थी ने भारतीय विश्वास और संस्कृति के नाम पर चलने वाली असंख्य रूढ़ियों, वर्जनाओं,विकृतियों पर ,धर्म की आड़ पर,असहिष्णुता और हिंसा की राह पर चलने वाली ताकतों पर प्रहार किया।

गणेश शंकर विधार्थी ने भारतीय पत्रकारिता को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एक नई दिशा दी।लेकिन उनके मन में भावी पत्रकारिता को लेकर मन में आशंका भी थी जो आज सत्य होती दिख रही है।

उन्होंने एक बार लिखा था- “एक दिन ऐसा भी आएगा व्यक्तित्व नहीं रहेगा, सत्य और असत्य का अंतर नहीं रहेगा, अन्याय के विरूद्ध डट जाने और न्याय के लिए आफतों को बुलाने की चाह नहीं रहेंगी, रह  जाएगा केवल खींची हुई लकीर पर चलना।”

अपनी धारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था कि जिन लोगों ने पत्रकारिता को अपनी वृत्ति बना रखा है, उनमें से बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो अपने चित को इस बात पर विचार करने के लिए कष्ट उठाने का अवसर देते हैं कि हमें सच्चाई की भी लाज रखनी चाहिए। केवल अपनी मक्खन -रोटी के लिए दिन भर में कई रंग बदलना ठीक नहीं है।

आज गणेश शंकर विधार्थी के विचार हमें एक बार सोचने का आग्रह करते हैं कि पत्रकारिता व्यावसायिकता के प्रबल प्रलोभनों से कैसे मुक्त होगी। पत्रकारिता के संदर्भ में विधार्थीजी ने जो आशंकाएँ व्यक्त की थी आज की पत्रकारिता उनसे ग्रसित दिखाई देती है।
वेशक आज पत्रकार विधार्थी जी का आदर्श को अपनाएँ तो पत्रकारिता का खोया गौरव प्राप्त कर सकते हैं।

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