कोई इनका ऐसा सगा नहीं जो इनसे रुठा नहीं

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nitish_jhaशायद कुछ लोगों को हमारा यह पोस्ट ‘बेल का अपोज करने जैसा वो छोटा केस नहीं देखते-आप जाइए। पसंद नहीं पड़े पर मैं ताराकांत झा जी के जिंदगी की एक तल्ख सच्चाई से आप सभी लोगों को रुबरु कराना चाहता हूं। मामला वर्ष 2002 का है। उस वक्त मैं दिल्ली से प्रकाशित एक राष्ट्रीय हिन्दी पाक्षिक ‘प्रथम प्रवक्ता’ का बिहार में वरीय संवाददाता हुआ करता था।

एक खबर मिलने के बाद मैने उस समय इस पत्रिका में तब दिल्ली में एक आयोग में संवैधानिक पद पर बैठे बिहार निवासी एक व्यक्ति जो कभी पटना में ही एक अखबार के संवाददाता हुआ करते थे के खिलाफ खबर लिखी थी। उस खबर से बौखलाए उस व्यक्ति ने तब भोजपुर में तत्कालीन एसपी के पद पर विराजित अपने एक रिश्तेदार की मिलीभगत से उस पत्रिका के संपादक और मुझ सहित तीन लोगों पर नौकरी के नाम पर रुपया लेने का एक झूठा मुकदमा आरा के अपने किसी करीबी आदमी से करा दिया।

एसपी के दवाब पर तब आरा से आयी पुलिस ने तब रातो-रात मुझे पटना से गिरफ्तार कर लिया पर जब मुझे आरा ले जाया गया तो आरा-नवादा थाना जहां मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज करायी गई थी के तत्कालीन थानाध्यक्ष हरिश्चंद्र पासवान ने मुझसे साफ कहा कि विनायक जी, हमलोग जानते हैं कि ये केस झूठा है पर क्या करें एसपी का दवाब था।

खैर इस मामले में निर्दोष होते हुए भी लगभग दो माह तक आरा जेल में रहा और तभी मुझे महसुस हुआ कि वास्तव में कानून अंधा होता है। जेल से निकल कर पटना आने के बाद मैंने भी कानून के अंधे होने का लाभ उठाते हुए कुछ वैसा ही मुकदमा पटना में कर दिया जिस मुकदमें में में न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए तब संवैधानिक पद पर बैठे उस व्यक्ति की गिरफ्तारी का अजामनतीय वारंट और बाद में कोतवाली थाना अंतर्गत विद्यापति नगर स्थित उनके आवास की कुर्की का आदेश दिया जिसके आलोक में कोतवाली पुलिस ने कुर्की भी की। बाद में वह व्यक्ति जमानत के लिए हाइकोर्ट में अर्जी दी।

तब पटना के अखबारी जगत के एक महत्वपूर्ण और सम्मानित व्यक्ति ने मुझे अपने केस की पैरवी और उन्हें मेरा वकील रहने के लिए ताराकांत झा जी के यहां भेजा था। मैं उनके पास सुबह उनके घर गया। वो बाहर ही बैठे थे पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने मुझे अपने मुंशी से मिलने को कहा। बगल के कमरे में मुंशी बैठा था पहले उसने 2500 रूपए की फरमाइश की जिसे मैंने दे दिया। फिर उसने मुझे वकील साहब से बात करने को कहा।

जब मैं दुबारा ताराकांत झा जी के पास गया तो उन्होंने दो टूक में जबाब दिया कि ‘बेल का अपोज करने जैसा मैं छोटा केस नहीं देखता-आप जाइए।’ मैं दुबारा मुंशी के पा गया और यह कहते हुए अपने पैसे की मांग करी कि उन्होंने केस लड़ने से इनकार कर दिया है तो मैं मुंशी की यह बात सुनकर हतप्रभ रह गया कि तब के मशहुर वकील ताराकांत झा जी के इन्ही दो शब्द ‘बेल का अपोज करने जैसा मैं छोटा केस नहीं देखता-आप जाइए।’ जैसे दो लाइन बोलने का कसंलटेंट फीस ही ढाई हजार है। मैं क्या करता उस वक्त मुफिलिसी के हालात में खुद को ठगा हुआ महसुस कर वापस लौट गया।

अब सोचा जा सकता है कि ताराकांत झा जैसे लोग जो समाज के नहीं हुए, पत्रकार के नहीं हुए, उन्हें मान-सम्मान और पहचान देने वाली पार्टी के नहीं हुए तो वो किसके हितैशी हो सकते हैं। आज भी इनके कई करीबी यह कहने को बाध्य हैं कि रुपयों के मामले में ताराकांत जी ने कभी किसी से समझौता नहीं किया। 

…. पटना के  पत्रकार  विनायक विजेता अपने फेसबुक वाल पर

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One comment

  1. वकालत को पत्रकारिता से तुलना मत किजिये। बेल का अपोज या विरोध सरकारी वकील करता है, मैं भी बहुत मामलो मे इस तरह ्की वकालत से इंकार कर देता हूं, और हां सवाल चाहे एक लाईन का हो या पचास लाईन का , हराम मे वकील जवाब नहि देगा क्योकि उसे लिफ़ाफ़े मे पैसे नही मिलते है, बहुत मेहनत के बाद एक ताराकांत झा पैदा होता है, आप माफ़ि मांगे , एक्घटना सुना रहा हू माननीय विजेता जी । एकबार एक कोर्ट मे बेल था , शायद मिहिर झा थे या कोई और, ताराकांत झा ने केस लेने से इंकार कर दिया क्योकि उस जज से इनका परिवारिक संबंध था वह भि दूर का। आप ले लेते , सोचते चलो परिचित है, काम निकल जायेगा। आपका बहुत सम्मान करता हू. आपकी जाति के है नागेन्द्र राय , पटना के मुख्य न्याधिश थे अब वकालत करते है उच्चतम न्यायालय मे। जाकर उनसे पुछिये ताराकांत झा के बारे मे। आप पसंगा नही है । प्रयास किजिये अच्छा बनने का, सिर्फ़ दिखाने का नही। दुख हुआ , उम्र के इस पडाव मे आकर के भी अपनी आदत नही बलद पा रहे है।

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