कैसे तुम्हें रुकने कहें कमल हासन

Share Button

kama hasanकमल हासन को ही नहीं,किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि कैसे कोई एक फिल्म देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है। लेकिन जब सुदूर किसी देश के किसी अखबार में छपे छोटे से कार्टून से देश की एकता डगमगाने लगती है तो फिल्म तो वाकई एक बडी चीज है।सच यही है कि जब हम खुद डगमगाने को तैयार होते हैं,तभी बहाने की तलाश होती है।किसी फिल्म,किसी पेंटिंग या किसी किताब को खतरा मानना वास्तव में सिर्फ बहाने होते हैं।क्योंकि हिन्दुस्तान में इन कला माध्यमों की पहुंच किसी से छिपी हुई नहीं है। शेष विधाओं को तो छोड भी दें,सबसे संप्रेष्य कला विधा माने जाने वाली सिनेमा भी भारत में मात्र एक प्रतिशत आबादी तक पहुंच पाती है।इसमें से कितने प्रतिशत तक वह अभिष्ट कृति पहुंच पाती है,और कितने को प्रभावित कर पाती है,यदि आंकडों में जाएं तो वह शायद दशमलव के भी नीचे होगा। यदि हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र पर हमें विश्वास है तो यह भी मानना होगा कि कोई क्षीण सी आबादी यदि किसी कृति से प्रभावित भी होती है तो वह देश के वर्तमान स्वरुप के लिए खतरा नहीं बन सकती। 

कमल हासन की लगभग सवा दो घंटे लम्बी ‘विश्वरुपम’, अमेरिका और अफगानिस्तान की पृष्ठभूमि में है।अलकायदा की चर्चा जरुर है,लेकिन किसी धर्म विशेष पर कोई टिप्पणी नहीं है। कमल हासन अपनी सफाई में कहते भी हैं,मेरी फिल्म में हिन्दुस्तान की चर्चा ही नहीं,फिर भारतीय मुसलमानों को उसे लेकर उत्तेजित होने का कोई कारण नहीं बनता।यह जरुर है कि ‘विश्वरुपम’ में अलकायदा के साथ इस्लाम और कुरान कै भी संदर्भ हैं। लेकिन जिस धार्मिक कट्टरता की जमीन पर अलकायदा का उदय होता है,वहां इससे बचना कमल हासन के लिए संभव था भी नहीं।यदि ‘ओह माई गाड’ जैसी फिल्म परिकल्पित की जाती है तो यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि उसमें त्रिपुंडधारी बाबाओं को नहीं दिखाया जायेगा।यदि कोई कलाकार किसी रचना के लिए किसी कथ्य का चयन करता है तो तो उसे स्थापित करने के लिए एक वातावरण की भी रचना करनी पडती है।जब अलकायदा की चर्चा होगी तो मस्जिद, मदरसे और कुरान से कैसे बचा जा सकता है। हमारी असहिष्णुता तो सिनेमा को यही संदेश दे रही है कि वह अपनी ‘दबंग’ और ‘मर्डर’ के ही दायरे में रहे तो बेहतर,आम जीवन के नासूरों को कुरेदने का जोखिम न उठाए।
हमारी सांप्रदायिक असहिष्णुता का ख्याल कर कमल हासन अब कथित कुछ संवेदनशील संदर्भों को फिल्म से हटाने के लिए तैयार भी हो गए हैं। लेकिन तमिलनाडु सरकार और तथाकथित मुस्लिम संगठन और समूह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं। तमिलनाडु सरकार पर यह दवाब किस कदर हावी है यह इसी से समझा जा सकता है कि न्यायालय के लोअर बेंच से फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति मिलने के बाद,हाइकोर्ट जाने में सरकार ने जरा भी देर नही की।और अपनी धीमी चाल के लिए मशहूर न्यायपालिका ने भी बैन को हटाने के आदेश को निरस्त करने में कोई देर नहीं की। वाकई आश्चर्य होता है बलात्कार की जिस घटना की आग के धुए से राष्ट्रपति भवन भी नहीं बच सका था, उस घटना पर न्यायपालिका को कतई जल्दी नहीं होती। जिस कसाब के लिए पूरी दुनिया ही चश्मदीद गवाह थी ,उस पर फैसला लेने में न्यायालय को तीन वर्ष लग जाते हैं, लेकिन ‘विश्वरुपम’ पर बैन जारी रखने पर निर्णय लेने में कोर्ट एक दिन का भी समय नहीं लेती। यह भी आश्चर्य कि लाखों की भीड के हफ्ते भर के लगातार दवाब के बावजूद सरकार बलात्कार पर कानून बदलने को राजी नहीं होती, लोकपाल की मांग पर अन्ना हजारे के आमरण अनशन तक पर सरकार निरपेक्ष रुख अख्तियार किए रहती है, वही सरकार किस तत्परता से कला कृतियों पर रोक लगाने को तत्पर हो जाती है।
यह सिर्फ ‘विश्वरुपम’ का भी मामला नहीं, सिर्फ सिनेमा का भी नहीं, सभी कलाविधाओं का है।जिसकी निरीहता का फायदा उठाने को हर कोई तत्पर रहते हैं,सरकार भी, संगठन भी, समूह भी। सबों को पता है यह ऐसे निरीह लोगों की दुनिया है,जिसकी जब चाहे बाहें मरोड दो, पलट कर वार नहीं कर सकता।आशाराम बापू के अनर्गल प्रलाप पर उनकी बाहे नहीं मरोडी जा सकती, मौलाना बुखारी को सम्मन तक तामिला का कोई अदालत हिम्मत नहीं जुटा सकती।लेकिन तस्लीमा का जीना आसानी से मुश्किल किया जा सकता है। कमल हासन, तस्लीमा नसरीन, मकबूल फिदा हुसैन, सलमान रश्दी एसे नाम हैं जो हमारे सामने हैं,सच यही है कि ऐसी संख्या लाखों में है जिनकी कृतियां या तो दवाबों से प्रभावित होती रही हैं,या विरोध की पीडा वे झेलते रहे हैं।
सवाल यह है कि इस देश में कानून का शासन है या भीड का। अन्ना के आंदोलन के दौरान भी ये मुद्दे काफी गंभीरता से उठे थे,या कह सकते हैं सरकार ने उठाए थे। सच भी है जब तक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नहीं मान लेते तब तक किसी भी मुद्दे पर निर्णय के लिए तय संवैधानिक व्यवस्था का अनुपालन प्रजातंत्र की पहली शर्त होती है।प्रजातंत्र के बहाने कभी भी अराजकता को छूट नहीं दी जा सकती।लेकिन हालिया दौर में जब से अल्पमत की सरकारों का दौर चला,छोटे छोटे समूहों और संगठनों में अपनी बातें मनवाने की महत्वाकांक्षाएं जोड पकडने लगी हैं।सरकारें चालाकी यह बरतती हैं कि बडी मांगों के लिए बडे समूह को तो वे नजरअंदाज कर देती है,लेकिन छोटे समूहों की कथित छोटी मांगों को तत्परता से स्वीकार कर अपनी पीठ थपथपा लेने का मौका नहीं गंवाती। जाहिर है सरकारों की इस चतुराई ने हाल के दिनों में नामालूम से समूहों की असहिष्णुता को उर्जा दे दी है। 
कई बार तो यह भी पता नहीं चलता कि आखिर फिल्म पर आपत्ति क्या है, किसे है, और क्यों है। प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ पर विरोध फिल्म रिलीज होने के पहले ही शुरु हो जाती है। ‘दामुल’ जैसी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार के उपनाम से प्रभावित सरकारें आपत्तियां आते ही बैन के आदेश जारी कपर देती हैं।आश्चर्य कि कुछ जगह पर प्रदर्शन होने के बाद फिल्म को निर्दोष पाकर बगैर किसी खेद के बैन हटा भी लिया जाता है। न तो सरकारे और न ही विरोध करने वाले समूह इसका अहसास कर पाते हैं कि जब फिल्में तीन दिनों में 100 करोड तक बिजनेस कर लेती हैं, सिर्फ शौकिया विरोध के चक्कर में फिल्म को चार दिन रोक कर फिल्मकार को कितना आर्थिक आघात पहुंचा दिया गया।गौर तलब है कि जब भी सिनेमा पर विरोध की घटना बहुत ही मामूली सी बात पर , चाहे हाल के दिनों में ‘चक्रव्यूह’ के टाटा बिडला वाले गीत का विरोध हो या ‘सन आफ सरदार’ का या ‘स्टूडेंट्स आफ द इयर’ के राधा.. का ।सवाल है जब एक संवैधानिक संस्था को सिनेमा के कथ्य और प्रस्तुती दोनों पर ही निगरानी रखने की जवाबदेही दी गई है, उसी संस्था पर उन्हीं सरकारों का अविश्वास हास्यास्पद नहीं हो जाता।
तस्लीमा नसरीन ने काफी उम्मीदों से भारत में रहने का चुनाव किया था। शायद इसलिए कि भारत की धर्म निरपेक्षता उन्हें पसंद थी।आज कमल हासन कह रहे हैं कि मैं देश में धर्मनिरपेक्ष स्थान का चुनाव करुंगा और यदि वह नहीं मिल सका तो विदेश चला जाउंगा।क्या मकबूल,रश्दी,तस्लीमा,हासन के बाद वाकई मान लिया जाय कि संवैधानिक रुप से धर्मनिरपेक्ष घोषित इस देश में सरकारों के निर्णय पर सांप्रदायिक दवाब हावी हो रहे हैं।यदि हां तो किस मुंह से कमल हासन को हम रुकने कहेंगे।

………….. विनोद अनुपम के फेसबुक वाल से

 

Share Button

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...