किंग मेकर होने के मुगालते में हैं रामदेव-रविशंकर !

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बाबा रामदेव एवं जीवन जीने के कला के प्रवर्तक रविशंकर महाराज अपना मूल कार्य भूलकर राजनीति के भूल भुलैये मे फंस गए हैं। राजनीतिक प्रवचन इन्हें खूब भा रहा है। रविशंकर एवं बाबा रामदेव  भले ही इससे इंकार करें कि वे सक्रिय राजनीति में पदार्पण नहीं करेंगे लेकिन वे ऐसा सोचते हैं कि वे राजनीति को नई दिशा देकर किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं।

Ramdev_Modiउनकी इस सोच का बखूबी फायदा भाजपा उठा रही है। उसे बैठे ठाले बाबाओं का प्रत्यक्ष सहयोग मिल रहा है और वे यह सेाच रहे हैं कि ऐन चुनाव के समय बाबाओं के कारण उनकी राजनीतिक जमीन मजबूत होकर वोट रुपी फसल लहलहाने लगेगी। बाबाओं एवं रविशंकर महाराज को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित भाजपा के बड़े नेताओं की पायलागी भी खूब पसंद आ रही है। वे क्या जाने कि राजनीति में  ”बखत पड़े तो बांका, गदहा को कहे काका” वाली उक्ति बखूबी चरितार्थ होती है।

इन बाबाओं एवं लिविंग ऑफ आर्ट के प्रवर्तक का सारा कार्यक्रम प्रायोजित है। इसे आम जनता नहीं जानती जबकि हकीकत यह है कि ऐसे साधु संत किराए के टट्टू की तरह हैं। जिस तरह रोजी देकर सभा  सम्मेलनों में भीड़ बढ़ाने के लिए मजदूर लाए !  जाते हैं, उसी तर्ज में साधु-संतों का इस्तेमाल प्रवक्ताओं के रुप में किया जा रहा है।

ravi-modiइनके अहम को संतुष्ट करने के लिए उन्हें राज्य अतिथि का दर्जा देकर उनका गौरवगान भी किया जा रहा हैं। इन बाबाओं को प्रवक्ता बनाकर राज्य भर में योग स मेलनों की आड़ में राजनीतिक निशाना साधने के लिए इनकी संस्थाओं को कितना भुगतान किया जा रहा है, यह पूरी तरह गोपनीय रखा जा रहा है। लेकिन रविशंकर महाराज के एजेंट जिस तरह उनके किसी व्यक्ति के आवास में पधारने के लिए 5 हजार आरती एवं 15-20 हजार रुपए आशीर्वाद देने के लिए वसूल कर रहे हैं, उससे इसका भंडाफोड़ हो जाता है कि प्रायोजित कार्यक्रम के लिए शासन अथवा संगठन स्तर पर मोटी राशि का लेन-देन हुआ है।

यही स्थिति रामदेव बाबा को लेकर भी है। ये साधु संत अपने व्यक्तित्व एवं वक्तृत्व कला को बखूबी भुना रहे हैं। जहां तक बाबा रामदेव की बात है तो जब तक दवाओं के उनके अरबों रुपए के आर्थिक साम्राज्य एवं टैक्स वसूली को लेकर केन्द्र सरकार ने अपनी आंखें बंद रखी तब तक बाबा रामदेव ने भी केन्द्र के कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री एवं सोनिया-राहुल के प्रति अपना मुंह बंद रखा लेकिन ज्यों ही उनके दवाओं के लगातार फूलते-फलते आर्थिक साम्राज्य की ओर केन्द्र सरकार ने नज़रें टेढ़ी की तबसे बाबाजी बौखलाकर लगातार शब्द बाणरूपी प्रक्षेपास्त्र-ब्रह्मास्त्र छोड़ रहे हैं। उन्होंने योग गुरु की गरिमा को तार-तार करके प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय मद पर आसीन मनमोहन सिंह को नामर्द तक कह दिया है।

यदि मनमोहन सिंह चाहते तो ठेठ इसी शैली में बाबा रामदेव को यह कहते हुए जवाब दे सकते थे कि अपनी मां-बहन को भेज देना, साबित कर देंगे कि वे मर्द हैं अथवा नामर्द। दरअसल मनमोहन सिंह को नकारा, नाकाबिल की संज्ञा से विभूषित किया जा चुका है।

हमारा भी यही अभिमत है कि वे भारत के राजनीतिक इतिहास के सबसे नाकाबिल प्रधानमंत्री हैं। ऐसे में रामदेव बाबा को अपने तीव्र तीरंदाजी के लिए नए मारक शब्द की तलाश थी। यहीं वजह है कि उन्होंने नामर्द शब्द का उपयोग करके अपनी गरिमा एवं भगवा चोले को उतारकर अपनी औकात बतला दी है।

……….... जयदीप शर्मा की पड़ताल

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