कहीं दूसरा ‘हूल’ न बन जाये पत्थलगड़ी ?

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राजनामा.कॉम।  झारखंड प्रांत के खूंटी के अड़की प्रखंड का कोचांग जहां बड़ी वारदात की खबर हुई है। अब तक पूरी घटना को लेकर संशय बनी हुई है। पत्थलगड़ी समर्थक कहते है कि सरकार व प्रशासन प्रयोजित है तो प्रशासन-सरकार कहती है कि पत्थलगड़ी समर्थकों का हाथ है। परंतु इन सबके बीच प्रशासन और ग्रामीणों के बीच संवादहीनता की कमी के कारण विवाद चरम पर पहुंच गया है।

अपने फेसबुक वाल पर युवा पत्रकार आशीष तिग्गा….

यदि झारखंड के सामाजिक कार्यक र्ता और आदिवासी शिक्षित बुद्धिजीवियों व इतिहासकारों के विचार की सुने तो वे कह रहे है कि मुंडा विद्रोह है पत्थलगड़ी आंदोलन और यह धीरे-धीरे हूल का रूप ले रही है।

आलोचाना करने वाले कहेंगे कि पत्थलगड़ी करने वालों के आंदोलन को हूल की संज्ञा न दे। वे देशद्रोही है और सामांतर सरकार की बात करते है।

संथाली भाषा में ‘हूल’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है-‘विद्रोह’। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संथाल हल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया।

जो खूंटी में पत्थलगड़ी आंदोलन के माध्यम से हो चुका है और इसकी चिंगारी पूरे झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में पहुंच गई है। इन सभी चीजों व विवादों के बीच संवादहीनता के कारण ग्रामीणों की चेतना दम तोड़ रही है और यदि असहनीय चेतना अब हिंसात्मक चेतना के रूप् में तब्दील ह गई है।

खूंटी इलाके में चार कोरिडोर पत्थलगड़ी इलाके में काम करता है। कुछ कोरिडोर के साथ ग्रामीणों का साझा व सहयोगात्मक दृष्टिकोण काम रहा है। और यही चार कोरिडोर ग्रामीणों के लिए किसी न किसी रूप में आरोपों में घिरे रहने और परेशानी का सबब साबित हो रहा है।

इन चारों कोरिडोर में ग्रामीणों के साथ मिशनरी और ग्रीन स्टोन कोरिडोर का साझा कार्यक्रम चला रहा है। इसलिए इन दोनों कोरिडोर से ग्रामीणों को कोई दिक्कत नहीं है। चौथे नंबर के कोरिडोर के माध्यम से ग्रामीण स्वशासन की बात करते है और तीसरे नंबर के कोरिडोर के माध्यम से ग्रामीण भारतीय संविधान को जानने व पढ़ने के लायक हो पाए है।

इसलिए आलोचक चौथे और तीसरे कोरिडोर को आपस में जोड़ देते है। जोड़े क्यों न। जहां 200 वर्ष पूर्व घना जंगल था। 1947 के आजादी के बाद जहां सरकारें न पहुंची। जो रोड-सड़क बनी दूर दराज इलाकों में वह भी बिहार सरकार के समय।

ऐसे जगहों में मिशनरी पहुंच कर इन ग्रामीणों के बीच स्वास्थ्य-शिक्षा की अलख जताई। इसलिए कही न कही यहां धर्मांतरण तो नहीं हुआ। परंतु जरूर मंतातरण हो गया। जिसे आलोचक धर्मांतरण की संज्ञा देते है। खूंटी जिला में यहीं मंतातंरण की वजह से कई मिशनरी स्कूल खुले है।

सरकारी योजनाएं चलती है शिक्षा की अलख भी जलाई जाती है, परंतु यह अखल डिबरी की तरह होती है, इसलिए इसकी रोशनी का लाभ ग्रामीण गुणात्मक शिक्षा के रूप में नहीं ले पाते है। जबकि मिशनरी संस्थान की शिक्षा पद्धति से अब तुलना करना सही नहीं होगा।

यही वजह है, जिस आदिवासी बहुल इलाकों में खूंटी जिला में पत्थलगड़ी चिंगरी निकली है और शिक्षा के बहिष्कार की घोषणा हुई थी वहां जैक इंटर आटर्स में 92.99 फीसद बच्चे पास होते है और राज्य में उत्तीर्ण होने वाले सबसे ज्यादा प्रथम जिला में शामिल हो जाता है। रही बात दूसरे नंबर के कोरिडोर की। ग्रामीण उसके साथ कैसा रहना है जानते है।

गत 25 जून को कोचांग दुष्कर्म की घटना का विवादित स्थल जाने से कई बातों से अवगत होने का मौका मिला। चौथे स्तंभ कहते है कि यहां खौफ का माहौल, कोई ग्रामीण कुछ भी बताने से इंकार। पुलिस से ठकरहाट की स्थिति सहित कई बाते की गई। परंतु स्थिति बिल्कुल ही अलग। यदि मुंडारी जानते है तो सीधे साधे ग्रामीण पूरा सहयोग करेंगे और पूरी जानकारी देंगे।

ग्रामीण स्वयं पुलिस को सहयोग करने को तैयार है सिर्फ ग्राम सभा से बात करे। नक्सली से ग्रामीण भी परेशान है और प्रशासन से नक्सली के नामों की सूची मांगी है ताकि गांव के भटके युवकों को पुलिस को सौंप दे। परंतु संवाद नहीं होने के कारण अब तक पहल नहीं हो पाई है।

अभी पुलिस की कठोर कारवाई से थोड़ा ग्रामीण सहमे है। परंतु मुंडा खूंट कट्टी इलाकों के इतिहास को भी समझना जरूरी है। यह मुंडा राज अर्थात बिरसा मुंडा की जन्म स्थली है। ये मुंडा वे लोग है जो ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज डूबा दिया था।

ब्रिटिश कहते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता है। गांव शांत है गांव खाली और सन्नाटा है कहीं दूसरे हूल-ब्लास्ट होने की ओर इशारा नहीं कर रहा है। इसलिए समय रहते संवाद स्थापित कर कर समस्या का समाधान निकाला जाए।

क्योंकि ग्रामीण 1900 की घटना को 2018 के रूप में देख रही है। उस समय तात्कालीन ब्रिटिश सरकार था और भाजपा सरकार। कल भी दिकूओं से संघर्ष था और कथित तौर पर आज भी।

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