कहाँ से लावुं मैं हाथी का अंडा ?

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आधुनिकता के होड़ में आज लोग इस कदर पगलाये हुवे है , एक दुसरे से आगे बढ़ने की रस्सा कस्सी। बौराये हुवे है सभी। भ्रस्टाचार, बेईमानी ,महंगाई और तानाशाही सभी बने हुवे है आपस में भाई। राजा,मंत्री,संतरी सभी मगन है अपने आप में … न कोई पुछने वाला है, न कोई सुनने वाला।

राजा कहते मंत्री मेरा नहीं सुनता, मंत्री कहता संत्री मेरा नहीं सुनता और संत्री कहता कि, राजा और मंत्री कहते है हाथी का अण्डा लाव … कहाँ से लावुं मै हाथी का अंडा …? जनता बेचारी भेड़ बनी हुवी है …. देश में राजनिती उद्द्योग का दर्जा प्राप्त कर चुकी। लगे हुवे है सभी कोरम पुरा करने में … औ पूँजी पति बीजी है माल बनाने में। अच्छे दिन आने वाले है। …जय हो पशुपति नाथ …।

ना रोड ,ना बिजली, ना पानी, ना सिंचाई व्यवस्था ,ना चिकित्सा, ना शिक्षा …… खाली कोरम पूरा ???? एम पी का ताखा 2 ,00,000 एम एल ए का तनखा 1,00,000 पलस में गाड़ी बंगला बॉडीगाड …… चिकित्सा फ्री ,टूर फ्री ,दिस फ्री – दैट फ्री …सभे कुछु फ्री। और हमरे लिए का फ्री, ( ए पी एल फ्री, बी पी एल फ्री) ।

4 साल हो गया ग्राम पंचायत चुनाव हुवे, ना कौनो नियम और ना कौनो नियमावली। मिलता है खाली ऊपर से धौंस …… का तो … भाई बहुत माल कमा रहे हो मनरेगा में, माल हमें भी चाहिए नहीं तो फसा देंगे, जेल में सड़ा देंगे।

मुँह में गिलौरी पान चबा के ए.सी. रूम में बैठ कर मनरेगा नियमावली बनाने वाले लाखो रुपया तनखा पाने वाले बाबु कभी प्लाट में आकर खुद इस काम को कराइये आपको मालुम हो जायेगा कि,कितने धान में कितना चावल होता है।

कहते है ग्राम पंचायत का मुखिया अपने पंचायत का मुख्यमंत्री होता है , परन्तु मै कहता हुँ कि, ग्रामपंचायत में उससे बड़ा कोई दुखिया नहीं होता …… उसके पास ना कोई क़ानूनी वाजिब शक्ती, ना कौनो चपरासी,ना गाड और ना कोई सवारी और तनखा 1000 रू० मात्र।

ग्रामीण कहते है अरे कलुवा हमलोगों ने तुम्हे वोट देकर मुखिया बनाया है कर लो बेटा रंगबाजी … एके साल और बचा है वोट होने में,जेतना लुटे हो सब हगवाएंगे और ऑफिस में का मुखिया जी खुब माल चभला रहे है न अकेले अकेले , हम लोग चायो-पान से गए … मुखिया के पाकेट में है मात्र 100 गो रुपिया …… का करे घर के लीए तरकारी कि, मोटर साइकिल में पेट्रोल कि, मोबाईल का रिचार्ज कि, गाँव के किर्तन में चंदा कि ऑफिस के बाबू को चाय-पान।

छोटी मछली,बड़ी मछली का शिकार होती है …. यह बात सौ फीसदी सत्य है। झारखण्ड में ग्राम पंचायत और उनके निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की स्थिती आज बद से बदतर बनी हुवी है जिसकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं है।

वर्ष 2002 में इस राज्य में APL – BPL परिवारों का सर्वेक्षण हुवा था और उसी सर्वेक्षण को आधार मानकर रासन कार्ड, लाल कार्ड, अंत्योदय कार्ड ,इंदिरा आवास प्रतिक्षा सूचि इत्यादि तैयार करया गया था जो कि आज वर्ष 2014 में भी लागु है और उसी सूचि को आधार मानकर सारे कार्य हो रहे है ….

न कोई देखने वाला और नाही कोई सुनने वाला। आबादी चार – पाँच गुना बढ़ गई है पर रासन,केरोसिन आवंटन वही का वही। ग्रामीण जन वितरक उसी आवंटन में सब को साहब को और खुद को भी पोस रहे है।

स्कूल हो या आँगन बाड़ी , चल रहा है पदाधिकारियों की मनमानी ……. इसके एक नहीं सैकड़ो मिलेंगे सबुत। करते है ग्राम पेय जल स्वच्छता विभाग की बात ……. ढपोर शंख है वो विभाग। जरा पुछिये ईस विभाग के उच्च पदाधिकारियों से कि,ग्राम जल सहिया को तनखा में कितना पैसा देते है … हुजूर क्या आप करेंगे देश और समाज की खातिर मंगनी में काम ?

…….गोड्डा, झारखंड से Bobby Singh अपने फेसबुक वाल पर।

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