कल्याणपुर में जदयू को मिली भांपने वाली जीत

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bihar electionसमस्‍तीपुर के कल्‍याणपुर में जदयू को मिली जीत ‘स्‍ट्रेट’ है,लेकिन फासला कम हुआ है । नीतीश ‘जयगान’ कर रहे हैं,तो ‘चुनौतियों’ को भी भांप रहे होंगे । लालू-रामविलास को यह कहने का मौका नहीं मिला है कि ‘बतासा’ की तरह बंटे वोट ही हार को जिम्‍मेवार हैं । अधिकार-यात्रा के दौरान हुए हो-हंगामा और परिवर्तन यात्रा में जुट रही भीड़ को देख ‘कइयों’ ने इस उप चुनाव को ‘लिटमस टेस्‍ट’ की भांति लेना शुरु किया था । नतीजे अब इस बात के संकेत हैं कि कुलबुलाहट है भी,तो विकल्‍प अभी नहीं है ।

2010 के आम चुनाव में कल्‍याणपुर में जहां जदयू को 30197 मतों की भारी जीत मिली थी,वहीं 2013 के उप चुनाव में 16432 की जीत है । बावजूद इसके कि संपूर्ण ‘बिहार सरकार’ और जदयू के सभी ‘रामलखन’ एक पखवारे से जीत सुनिश्चित करने को कल्‍याणपुर के गांव-गांव में डेरा डाले थे । खेल कांग्रेस ने भी बहुत बिगाड़ा,आप ऐसा नहीं कह सकते । कांग्रेस को मात्र 8221 मत ही मिले । 2010 में तो 13349 मिले थे । कल्‍याणपुर में प्रभावी भाकपा (एमएल) लिबरेशन का प्रत्‍याशी भी 4352 मतों में निपट गया । कहने का आशय यह कि तीसरे-चौथे स्‍थान पर रहे उम्‍मीदवारों के मत को भी जोड़ दें,तो जीत जदयू को ही मिलती । 

हां,लालू-रामविलास के लिए संतोष की बात सिर्फ इतनी है कि उन्‍हें 2010 (31927) के मुकाबले 2013 (42893) में करीब 11 हजार अधिक वोट मिले हैं । लेकिन जदयू के चश्‍मे से देखें,तो 2010 (62124) के मुकाबले 2013 (59325) में करीब तीन हजार वोट ही कम मिले हैं । पांच हजार से अधिक वोटों के नुकसान में कांग्रेस रही है । 

सही है कि जीत को सरकार लगी थी,लेकिन कल्‍याणपुर से ‘कास्‍ट केमिस्‍ट्री’ के कई नतीजे भी संभावित थे । नतीजे मिले भी हैं । सुरक्षित सीट होने के बावजूद वोटों की संख्‍या में पहले-दूसरे पायदान पर भूमिहार और कुशवाहा वोटर थे । भूमिहार गुस्‍से में हैं,कहा जा रहा था । माफी भी मांगी जा रही थी । माफी कबूल हुई कि नहीं,नतीजे से यह भी जानना था । दिवंगत बरमेश्‍वर मुखिया के बेटे भी जदयू के खिलाफ वोट देने की गुहार लगाने गये थे । लेकिन भूमिहारों ने जदयू को झटक दिया,परिणाम इसका संकेतक नहीं है । हां,बूथवार मतों के ‘ट्रेंड’ का विश्‍लेषण कर रहे लोगों ने कहीं-कहीं देखा कि वोट लोजपा के पक्ष में चला गया । इसका मतलब यह है कि भूमिहारों के भीतर कुछ है भी,तो ठीक से वे विकल्‍प नहीं सोच पा रहे । लालू को स्‍वीकार करने को लेकर अब भी संशय है । 

कुशवाहा पालिटिक्‍स भी बिहार में कम कुलांच नहीं मार रही । उपेन्‍द्र कुशवाहा विकल्‍प देने की बात कर रहे हैं । नागमणि अपने को किसी से कम नहीं मानते । समस्‍तीपुर में आलोक मेहता की कवायद भी कम नहीं । लव-कुश समीकरण टूटने तक की बात लोग करते फिर रहे थे । उम्‍मीदवार न होने के बावजूद उपेन्‍द्र कुशवाहा ने सबों से जदयू को हराने की अपील की । लेकिन नतीजा बताता है कि कुशवाहों का वोट जदयू के खाते में ही गया । महादलित फार्मूला पहले की भांति हिट रहा । 

हार चुके लालू-रामविलास कहेंगे कि सरकार जीती है । पर जीत तो जीत होती है । भरोसा कायम करने को इन दोनों धुरंधरों को अभी बहुत कुछ करना होगा । नीतीश कुमार भी सोचें कि बड़े लाव-लश्‍कर से लड़े गये उपचुनाव में जीत का फासला कम कैसे हो गया । कहीं कुलबुलाहट है,तो क्‍यों ? वरना काल व परिस्थितियां तो विकल्‍प पैदा कर ही देते हैं ।

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