कलाम को बेहद पसंद थी झारखंड की भोली भाली जनता

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पूर्व राष्ट्रपति व वैज्ञानिक कलाम सर की मौत से मेरी आंखें नम हो गयी। बंद कमरे में दस मिनट तक रोया। मिसाइलमेन का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। झारखंड के लिए उन्होंने काफी कुछ किया।

जब मैं झारखंड का विज्ञान व प्रावैधिकी मंत्री था तो आग्रह पर कलाम साहब एक साल (2003) में चार बार झारखंड आए। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुझे कहा था कि झारखंड की भोली-भाली जनता उन्हें बेहद पसंद है। इन्हें विकास का अवसर मिलना चाहिए। इनमें वैज्ञानिक सोच पैदा कर काफी कुछ किया जा सकता है।

कलाम साहब बीआइटी के दीक्षांत समारोह में भी गए थे। मैं साथ था। विद्यार्थियों के लिए उनके पास वक्त ही वक्त था। अपने जीवन में उन्होंने अपना सबसे ज्यादा समय बच्चों को दिया। कहते थे कि बच्चे भारत के भविष्य हैं। उन्हें सबसे ज्यादा तरजीह दिया जाना चाहिए।

बीआइटी सिंदरी में उन्होंने इंजीनियरिंग के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि यदि भारत को आगे बढ़ाना है तो ऐसे संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों को आगे बढ़ना होगा।
कलाम शुरू से कहा करते थे कि देश की प्रगति और उन्नति राजनीतिज्ञों के सहारे नहीं, युवाओं के हाथ है। इसलिए युवा शक्ति को हर वो अवसर दें जिसका वे हकदार थे। झारखंड को कलाम साहब देश का सबसे समृद्ध प्रदेश मानते थे।

उन्होंने कहा था कि झारखंड के लोग परिश्रमी हैं। इन्हें मौका मिले तो यहां की खनिज संपदा के बल झारखंड का कुछ वर्षों में देश का सृद्ध राष्ट्र बनाया जा सकता है।
कलाम साहब को करीब से जानने वाले इस बात को भली-भांति समझ सकते हैं कि राष्ट्रपति, वैज्ञानिक एवं आम आदमी के तौर पर उनके व्यवहार में कभी बदलाव नहीं आया। सदैव आम आदमी की तरह नजर आए।
झरिया की मिट्टी सूंघ कहा था बुझायी जा सकती है आग
अब्दुल कलाम 2003 में झरिया आए थे। इंदिरा चौ एवं फलारीबाग का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने आग प्रभावित क्षेत्र की मिप्ती को सूंघ कहा था कि भूमिगत आग को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने फार्मूला भी सुझाया था। अफसोस कलाम की सलाह पर अमल नहीं किया गया और झरिया कोयला क्षेत्र की भूमिगत आग दहकती रही।
मामले पर उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार, कोयला मंत्रालय एवं बीसीसीएल सबको इस बावत लिखा था। किसी ने पहल नहीं किया। कलाम साहब के फार्मूले पर काम होता तो शायद झरिया की आग आज खत्म हो जाती। उन्होंने आग प्रभावित क्षेत्र में मौजूद पौधों को भी करीब से देखा था और उनकी पत्तियों तो तोड़ स्थिति समझने की कोशिश की थी।

लेखकः समरेश सिंह झारखंड के पूर्व मंत्री हैं

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