ऐसी नौटंकी से क्या दूर होगा बाल विवाह और दहेज की कुप्रथा !

Share Button

“शपथ नहीं सही शिक्षा और जागरुकता की जरुरत है बिहार को, क्या दहेज देने और लेने वाले कहेंगे कि हमने दहेज दिया या लिया, पूर्व से ही कड़े कानून बने हुए हैं इन दोनों कुप्रथाओं के खिलाफ”

वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता का विश्लेषण…

बीते 2 अक्टूबर को पूरे बिहार में बाल विवाह एवं दहेज प्रथा के खिलाफ सरकार प्रायोजित एक कथित नौटंकी हुई। इसके पूर्व बीते वर्ष महागठबंधन सरकार में शराबबंदी के समर्थन में राजधानी समेत पूरे बिहार में मानव श्रृंखला बनाकर एक कथित नौटंकी हुई थी।

बस तब और अब में अंतर यह है कि शराबबंदी की नौटंकी में तब भाजपा शामिल नहीं थी और इस बार की नौटंकी में राजद शामिल नहीं हुई।

पूरा बिहार जान रहा है कि शराबबंदी का हश्र क्या हुआ। आज बिहार के कोने-कोने में शराब की होम डिलवरी हो रही है। पीने वाले पी ही रहे हैं। भले उन्हें शराब के वास्तविक मुल्य से तीन गुणा ज्यादा भूगतान ही क्यूं न करना पड़े। पैसे वालों के लिए महंगी शराब बिहार में सहज उपलब्ध है जबकि गरीब देशी शराब बनाने और उसे बेचने में अब भी बाज नहीं आ रहे।

रही बात बाल विवाह की तो यह कुप्रथा कोई नई नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोई पहले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिन्होने इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठायी हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व जब पूरे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा जोरो पर थी तब इस कुप्रथा पर लगाम लगाने के लिए राजा राम मोहन राय और केशव चंद्र सेन ने तत्कालीन ब्रिटीश सरकार से एक बिल पास कराया जिसका नाम ‘स्पेशल मैरेज एक्ट’ दिया गया। 

जब इस एक्ट से भी सुधार नहीं हुआ तो फिर से ‘चाइल्ड मैरेज रिस्ट्रेन्ट’ नामक एक बिल पास कराया गया जिसमें शादी के समय लड़के की उम्र कम से कम 21 वर्ष और लड़की की उम्र 18 वर्ष की अनिवार्यता की गई। इसके बाद इस बिल में पुन: संशोधन कर ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006’ बनाया गया जो अबतक लागू है।

यहां यह गौरतलब है कि पूरे विश्व में बाल विवाह के मामले में भारत का पहला स्थान है और अपने देश में बिहार का 62% के साथ पहला स्थान, जबकि सबसे कम दर हिमाचल प्रदेश में 9%है। बिहार में जो भी बाल विवाह होते हैं उनमें 96% बाल विवाह पिछड़ों और महादलित वर्गों में होती आई है जिसका मुख्य कारण है इन वर्गों में शिक्षा का अभाव।

राज्य के सरकारी विद्यालयों में प्राइमरी से उच्च स्तर तक शिक्षा की क्या स्थिति है यह जगजाहिर है। जहां तक दहेज प्रथा की बात है तो इस कुप्रथा के खिलाफ भी 1961 से ही लागू ‘दहेज निषेध अधिनियम’ प्रचलन में है। जिसमें 5 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और 15 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के आर्थिक दंड का प्रावधान है।

अब सोचने या विचार करने की बात यह है कि जो बाप अपनी बेटी के सुखद दांपत्य भविष्य के लिए अच्छा या नौकरीपेशा वर चुनता है तो दहेज देना उसकी विवशता होती है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने भी अपनी बेटी राजलक्ष्मी के फलदान में अपने दामाद को नोटों से भरी एक थाली दी थी। उसे क्या कहा जाएगा दहेज या उपहार।

भले ही दहेज प्रथा एक अभिशप्त कुप्रथा कही जाएगी पर दहेज देने वाला न तो दहेज देने की बात स्वीकारता है और न लेने वाला ही। हां इतना जरुर है कि जब शादी के बाद किसी बहू के साथ ससुराल वाले अन्याय करते हैं तो लड़की के पिता पुलिस में अपनी दर्ज शिकायत में इस बात का जरुर खुलासा करते हैं कि ‘उन्होंने अपने सामथ्र्य अनुसार अपने दामाद को दान-दहेज दिया।’

अब सवाल यह है कि अब किसी बहू या बेटी के साथ दहेज प्रताड़ना का मामला पुलिस में आता है तो पुलिस लड़की के ससुराल वालों के साथ लउ़की के मायके वालों को भी गिरफ्तार करेगी जो अपनी शिकायत में दान दहेज की बात स्वीकार करेंगे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन दोनों कुप्रथाओं के खिलाफ जो मुहिम चलायी है उससे मैं कहीं असहमत नहीं पर इससे ज्यादा जरुरी और पहले शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में मुहिम और इसमें सुधार की शपथ की जरुरत थी।

बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात सबसे ज्यादा लचर है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जहां निम्न स्तर के हो रहे हैं वहीं राजधानी समेत राज्य में संचालित लगभग 2.15 लाख नीजी स्कूलों और करीब 1.50 लाख कोचिंग संस्थानों और प्राइवेट नर्सिंग होम और नीजी अस्पतालों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है जो जनता की जरुरतों में दो सबसे महत्वपूर्ण हैं।

सरकार ने जिस तरह शराबबंदी के कड़े कानून लागू किए उसी तरह का कानून स्वास्थ्य या शिक्षा क्षेत्र में लागू क्यों नहीं कर रही जबकि महाराष्ट्र में इन दोनों विभागों में कड़े कानून लागू हैं।

बिहार सरकार को एक सर्वे करा यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि राज्य के राजनेताओं और अफसरान अपने बेटे बेटियों की पढ़ाई पर सलाना कितना खर्च कर रहे और पिछड़ी और दलित जाति के लोग कितना खर्च कर रहे।

सरकार जिस तरह अपने मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों से प्रतिवर्ष जिस तरह उनकी संपति का ब्योरा संबंधित शपथ पत्र लेती है उस शपथ पत्र में उनके बच्चों के स्कूल या इंस्टीीट्यूट पर होने वाले सलाना खर्च का ब्योरा भी शामिल होना चाहिए ताकि राज्य की जनता यह जान सके कि एक गरीब के बच्चे की पझ़ाई में कितना खर्च होला है और हुक्मरानों और राजनेताओं के बच्चों में कितना!

बिहार का कोई राजनेता या हुक्मरान यह भी साबित या दावा नहीं कर सकता कि उनके बच्चे कान्वेंट में पढ़ने के बजाए सराकरी स्कूल में पढ़ रहे हैं।

बहरहाल मुख्यमंत्री और सरकार जबतक बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के लिए कोई निर्णायक और कठोर कदम नहीं उठाएगी उसका दहेज प्रथा और बालविवाह जैसे कुप्रथाओं के खिलाफ किए गए अभियान को मात्र एक नौटंकी ही माना जाता रहेगा।

Share Button

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.