उषा मार्टिन ग्रुप के आदित्यपुर मिल से बढ़ता प्रदुषण

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रेल जैसे ही धीमे-धीमे झारखंड के जमशेदपुर नगर की ओर बढ़ती है वैसे-वैसे आकाश लाल होता दिखाई देने लगता है। इसका कारण है औद्योगिक इकाई से उड़ती घनी लाल धूल जिसमें कि बिना जले कोयले की धूल एवं राख का अंबार है। यह इकाई है उषा मार्टिन समूह के स्वामित्व की एक मध्यम स्तर की लौह एवं स्टील मिल। 

जमशेदपुर के एक उपनगर आदित्यपुर में करीब 120 हेक्टेयर में फैली यह मिल सन् 1974 से कार्यरत है। इस इकाई में दो छोटी (ब्लास्ट) भट्टियां, तीन कोयला आधारित स्पंज आयरन भट्टियां जिनकी क्षमता 350 टन प्रतिदिन है और तीन बिजली चलित भट्टियां हैं, जिनमें स्टील निर्माण होता है। भारत के पूर्वी हिस्से में प्रदूषण फैलाती स्पंज आयरन इकाईयों को सामान्य तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन उषा मार्टिन इकाई के मामले में यह इसलिए षड़यंत्रकारी प्रतीत होता है क्योंकि इसे विश्व बैंक की निजी क्षेत्र विकास शाखा अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) से धन प्राप्त होता है। वर्ष 2002 में अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम ने उषा मार्टिन में 14.5 प्रतिशत हिस्सेदारी (240.6 लाख अमेरिकी डॉलर) हासिल कर ली थी।

वित्त निगम के अनुसार यह धन उन्हें स्पंज आयरन भट्टी के साथ 7.5 मेगावाट का बिजली संयंत्र डालने के लिए दिया गया था और इस संयंत्र का परिचालन भट्टी से निकलने वाली बेकार गरम गैसों से होना था। अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम दक्षिण एशिया के तत्कालीन निदेशक डिमिट्रिज टस्टिरागोस का कहना था कि ‘कंपनी के द्वारा इस अंचल में पर्यावरण संरक्षण एवं सामाजिक सुधार के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयत्नों ने हमें इस परियोजना में निवेश करने हेतु प्रेरित किया है।’ धन की स्वीकृति देते हुए निगम का निष्कर्ष था कि उषा मार्टिन धन प्राप्ति हेतु पर्यावरण प्रभाव के पैमाने के हिसाब से बैंक की बी श्रेणी में आती है। इस श्रेणी का अर्थ है ऐसी परियोजनाएं जिनमें सीमित मात्रा में प्रतिकूल सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों की संभावनाएं हो और ये अक्सर विशिष्ट स्थान मूलक होती हैं तथा थोड़े बहुत प्रयास के पश्चात इनके विपरीत प्रभावों को समाप्त किया जा सकता है। झुरकुली के तारकनाथ शिकायत करते हुए कहते हैं, ‘मिल की स्टील पिघलाने वाली भट्टी से निकलने वाली घनी लाल धूल बस्ती के सभी 80 परिवारों को प्रभावित कर रही है। सभी लोग जिसमें कि विशेषकर बच्चे शामिल हैं सांस संबंधी समस्याओं से प्रभावित हैं। यहां पर किसी भी तरह की स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध नहीं है। हमें उपचार के लिए शहर जाना पड़ता है।’ 

इस इलाके का पानी का महत्वपूर्ण स्रोत सीतारामपुर बांध भी मिल के बिना उपचारित जल के बांध में जाने से प्रदूषित होता जा रहा है। झारगोविंदपुर के गणेश मंडल बताते हैं कि ‘मिल भट्टियों से निकला अपना ठोस अपशिष्ट मुख्य रेलवे लाइन के पास में फेंक देती है जिसकी वजह से 100 परिवारों का जीवन प्रभावित हो रहा है। बारिश में भारी धातुएं जमीन में समा जाती हैं। रात में अत्यधिक उत्सर्जन की वजह से सुबह उठने पर हम अपने पूरे गांव पर लाल धूल की मोटी परत जमी हुई पाते हैं। अनेक निवासी जो पहले खेती पर निर्भर थे अब नजदीक की औद्योगिक इकाइयों जिसमें उषा मार्टिन भी शामिल है, में दिहाड़ी पर काम करने लग गए हैं। मंडल का कहना है कि उषा मार्टिन मिल से होने वाले प्रदूषण ने कृषि भूमि को अनुपजाऊ बना दिया है। गांव के लोगों को मिल में रोजगार तो मिलता है लेकिन केवल ठेकेदार के माध्यम से जो कि इनके द्वारा अर्जित धन का बड़ा हिस्सा ले उड़ता है। इतना ही नहीं संयंत्र में अक्सर व्यवसायगत दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं। अनेक दुर्घटनाओं की वजह से वर्ष 2007 से अब तक 6 मजदूरों की मृत्यु भी हो चुकी है।

इ मिल से होने वाले उत्सर्जन का बड़ा कारण है बिजली की भट्टी की प्रक्रिया, जिसमें कि व्यवस्थित द्वितीयक उत्सर्जन नियंत्रण प्रणाली अभी तक स्थापित नहीं की गई है। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आर. एम. चौधरी का कहना है ‘नागरिकों से बार-बार वायु, जल एवं ठोस अपशिष्ट प्रदूषण की शिकायतें मिली हैं जिनसे तदुपरान्त नोटिसों के जरिए मिल को भी अवगत करा दिया गया है। जनवरी 2010 में बोर्ड की शर्तों का पालन न करने पर मिल को कारण बताओ नोटिस भी दिया गया था जिसमें कहा गया था कि संयंत्र का निरीक्षण स्वतंत्र एजेंसियों से क्यों नहीं कराया गया। डाउन टू अर्थ ने पाया कि जमशेदपुर स्थित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कार्यालय बहुत कम कर्मचारियों के साथ कार्य कर रहा है और यहां की प्रयोगशाला भी कार्यशील नहीं है। वैसे मिल द्वारा दिए गए नोटिस पर किसी भी तरह की कार्यवाही नहीं की गई है।

वहीं दूसरी ओर उषा मार्टिन जमशेदपुर मिल प्रबंधन का कहना है कि शिकायतों पर गंभीरता से कार्य किया गया है। उनका मानना है कि हमारी स्टील पिघलाने वाली भट्टी 25 वर्ष पुरानी है और इसमें कुछ कम अवधि की प्रक्रियाओं में आए परिवर्तन से उत्सर्जन में वृद्धि हो गई है। हम वायु उत्सर्जन पर नियंत्रण हेतु एक उच्च क्षमता वाली प्रणाली जून 2012 तक स्थापित कर देंगे। प्रबंधन का यह भी कहना है कि विस्तार कार्यक्रम के चलते वर्ष 2013 तक हमारा वार्षिक स्टील उत्पादन 10 लाख टन तक पहुंच जाएगा और इससे उत्पन्न ठोस अपशिष्ट को संयंत्र में पुनः इस्तेमाल कर लिया जाएगा और बाकी को किसी दूरस्थ स्थान पर ‘पर्यावरण अनुकूल’ तरीके से निस्तारित कर दिया जाएगा। त्रुटिपूर्ण मान्यता – मिल के 7.5 मेगावाट का विद्युत संयंत्र संयुक्त राष्ट्र स्वच्छ विकास प्रणाली (एसडीएम) योजना के अंतर्गत पंजीकृत है। लेकिन इसमें प्राथमिक पर्यावरण अनुपालन रोकथाम तक की सुविधा नहीं है जो कि क्रेडिट जारी करने का एक महत्वपूर्ण घटक है।

यह रियो घोषणापत्र की कार्यसूची के उस उद्देश्य का उल्लंघन है जो कि प्रदूषण के न्यूनतम होने की बात कहता है। दक्षिण एशिया-अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम के निदेशक थामस डेवनपोर्ट से गत वर्ष एक साक्षात्कार में जब भारत में अच्छे निवेश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उषा मार्टिन को एक दीर्घावधि वाला बेहतर निवेश बताया था। प्रदूषण के बारे में पूछने पर अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम का कहना है ‘निगम समय-समय पर अपने ग्राहकों द्वारा अपनाई जा रही पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रक्रियाओं के आकलन हेतु ग्राहकों के स्थल का भ्रमण करता है। हम मजबूत पर्यावरणीय एवं सामाजिक परिणाम सामने लाने हेतु ग्राहकों के साथ मिलकर प्रयत्न करते हैं। इसी तरह हम उषा मार्टिन के साथ मिलकर भी सकारात्मक पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव पाने हेतु कार्य करेंगे।

……..(इंडिया वाटर पोर्टल से साभार)

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