उद्घाटन हो चुका है, डिमांड भी बढ़ रही है, उत्पादन में जुट गये हैं कारोबारी !

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आने वाले तीन माह के भीतर राज्यों में विधानसभा चुनाव में बेशर्मी की हद पार करने का बिगुल बज चुका है. इसका उद्घाटन आदरनीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के करकमलों से 16 अगस्त को महाराष्ट्र के सोलापुर या यों कहें कि शोला पुर में हुआ था. तब उस राज्य में कांग्रेस नेता व मुख्यमंत्री श्री पृथ्वीराज चव्हान की सफल हूटिंग हुई थी.वहां से बाजार में हूटिंग की जबर्दस्त मांग बढ़ी. हम मीडिया वालों का भी योगदान रहा. यह डिमांड हरियाणा के कैथल में और भी पीक पर पहुंची.

leaderपीएम नमो की मौजूदगी में हरियाणा के सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा की हूटिंग की डिमांड भी हिट रही. फिर क्या था. बाजार को बल मिला. फिर पीएम नमो झारखंड की राजधानी रांची पहुंचे. खूब सुंदर बाजार सजा. वहां राज्य के सीएम हेमंत सोरेन जी की भी हिट हूटिंग करवा दी गई.

असल बाजार तो शनिवार को महाराष्ट्र में बना. इस दिन प्रोडक्ट की भी डिमांड बन गई. पहला प्रोडक्ट जिसकी डिमांड बढ़ेगी वो स्याही या कालिख है.

महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री थोराट साहेब पर स्याही फेंकी गई. अब इस स्याही का जवाब भी स्याही होगी. कांग्रेसी स्याही. शिव सेना की स्याही. भाजपा की स्याही. मनसे की स्याही. आरपीआई, बसपा व सपा की स्याही. अलग-अलग राज्यों अलग दलों की स्याही. इसलिये स्याही के कारोबारी रंग-बिरंगी स्याही बन्यें. जल्दी बनायें. खूब बनायें.

सनद रहे, स्याही हर्बल हो. एन्वायरनमेंट फ्रेंडली भी. नहीं तो यदि नेतवन का दिमाग कहूं खिसक गया, तो सब एक होकर कानून बना देगा. स्याही उत्पादन प्रतिबंधित.

क्योंकि राजनीति और राजनेताओं का चेहरा बेशक स्याह हो पर वह दिखना नहीं चाहिये. तभी मैथिली में कहावत है- झरकल मुंह, झपनहि पाबी. अर्थात स्याह चेहरा ढंके में सुंदर.

सावधान! यदि आपके घर में टूटे-फूटे जूते-चप्पल हों तो अभी कम दाम में न बेचें. इसकी कालाबाजारी शुरू होनेवाली है. डिमांड खूब होगी. मुंह मांगी कीमत मिलेगी. क्योंकि केवल उद्घाटन होने की देरी है बस! कोई बेशर्म जल्द उठ आयेगा. अपने अकर्मण्य हाथों से किसी नेता की ओर एक बार उछालेगा! बस इससे भी बड़ा बाजार इन चुनावों में तैयार होगा. कबाड़ वालों के लिये भी शायद अच्छे दिन आ जायें.

बेशक 40-45 दिनों के विधानसभाई चुनावी चिल्लम पों तक के लिये ही. क्योंकि एक बारगी जूते उछालने का ट्रेंड शुरू होना है. फिर तो खुद ही सभी दलों में प्रतिस्पर्धा होगी जूते उछालने की. रणनीतियां तय होंगी. उच्च स्तर पर. किसकी ओर. कब. कहां. कितने जूते. कितनी दूरी से. मन से या बेमन. कैसे उछालने हैं जूते. रणनीति यह भी बनेगी.

लेकिन क्या यह उचित है? कभी नहीं. यह निहायत अनुचित है.

क्यों? इसलिये कि हमारे नेता एक-दूसरे की पगड़ी उछालते रहे हैं. उतारते भी. आम जनता भी इसमें भागीदार हो जाती है. क्षणिक भावावेष में. ये नेता तो एक हो जाते हैं संसद में. विधानसभाओं में. ठगी जाती है विशाल समुदाय में पब्लिक. एक ही समाज के लोग. संबंधी. रिश्ते-नातेदार. सब ठग जाते हैं. इनका आपसी वैचारिक वैमनस्य हो जाता है.

कुल मिलाकर हम बाजार के गुलाम बन जाते हैं. राजनेता उस बाजार के शहंशाह. नेताओं के दल्ले आढ़ती. पिसती थी जनता. पिस रही है जनता. पिसती रहेगी जनता. अगर नहीं जागी तो. या जागकर भी मोतिया वाले चश्मे से देखने की आदत का त्याग नहीं किया तो….

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………. वरिष्ठ पत्रकार राजेश राय अपने फेसबुक वाल पर

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