इस बार काली रात नहीं मनाई

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इस बार मैनें पिछले 2 साल की तरह काली रात नहीं मनाई…2 साल तक इसलिये मनाया कि हम जालिमों की शाजिस की तह तक पहुंच नहीं पा रहे थे। अब मुझे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के राजनीतिक-प्रशासनिक गुंडों की कोई परवाह नहीं है। रांची  पुलिस-कानून की लाचारी-बेईमानी की भी मुझे कोई फिक्र नहीं है। हम अब खुल कर लड़ाई लड़ेगें…गांधी जी की सत्य-अहिंसा के बल शाजिस से जुड़े उन तत्वों को वेनकाब करेगें….

31 मई,2012 की स्याह रात मेरे साथ जो कुछ रांची पुलिस के कुकर्मियों ने किया था…उसे न तो भूले हैं और न ही कभी भूलेगें। सबका कच्चा चिठ्ठा सामने लायेगें। मैं मानता हूं कि उस समय का नालायक डीजीपी अब भाजपा का सांसद बन गया है। जिस अखबार के फ्रेंचाईजी ने मुझे झारखंड की पत्रकारिता का सबसे बड़ा 15 लाख का  जबरिया रंगदार बनवा  दिया था..उसका मालिक भी भाजपा का सांसद बन गया है। इस खेल में पुलिस-कानून के खिलाड़ी भी आज सत्ता की गुलामी कर जुठन चाट रहे हैं।

यह भी सच है कि मेरे साथ जो कुछ भी हुआ था…उसमें अर्जुन मुंडा सरीखे नेता की सीधी सहमति थी। लेकिन उन्हें मैं इसलिये नजरंदाज करता हूं कि नेता लोग को अर्श से फर्श पर आते देर नहीं लगती है। ऐसे भी मुंडा जी ने मेरे साथ जहां एक पाप किया है , वहीं एक पुण्य भी किया है। उन्होनें एक बार फोन इन कार्यक्रम में मुझ पर एक उपकार भी किया है। मेरी मां बहुत बीमार थी। मेरे पिताजी बतौर सिकीदीरी हाइडल प्रोजेक्ट तकनीति कर्मचारी तत्काल इलाज कराने में लाचार थे….वे अपने पीएफ से पैसे निकाल कर मां का इलाज करवाना चाहते थे लेकिन झारखंड बिजली बोर्ड की लालफीताशाही आड़े आ रही थी। तब मैंनें तात्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा जी को फोन पर अपनी व्यथा सुनाई…उन्होनें तत्काल बिजली बोर्ड को पीएफ का पैसा निर्गत करने का निर्देश दिया…जिससे समय पर पर मेरी मां का इलाज हो सका और आज मैं मातृसुख की छांव में हूं। चलिये एक पाप और एक पुण्य से मुंडा जी का तो  हिसाब बराबर है,लेकिन….अन्य कुकर्मी लोग ??

उ  तात्कालीन बरियातु-गोंदा के थाना प्रभारी सरयुग पासवान, लालपुर इंस्पेक्टर हरिचन्द्र सिंह,ओरमांझी थाना प्रभारी सरयु आनंद, डीएसपी राकेश मोहन सिन्हा से लेकर एसएसपी साकेत कुमार सिंह…..जिसने अपनी दुम हिलाते हुये न्याय-कानून की ऐसी की तैसी कर दी एक बिल्डरिया छाप अखबार मालिक के इशारे पर !!??!!

नीचली अदालत पर क्या टिप्पणी करें..वह तो किसी की बात सुने वगैर 14 दिन के न्यायायिक हिरासत में भेजने के अलावे कर भी क्या सकती है। कानून के आंखों पर पट्टी जो बंधी रहती है। 12 दिन जेल में रहे और उसी अदालत ने फिर जमानत दी। वकीलों ने मोटी कमाई की मेरे परिजनों से।

उन समाचार पत्रों के करींदों को भी आयना दिखाने का वक्त आ गया है..जिन्होंने हड्डी के टुकड़ों को चबाने में ही अपनी भलाई समझी। ये सब लोग मानते हैं कि उनके अब अच्छे दिन आ गये हैं…तो भला मैं यह कैसे  न मान लूं कि मेरे बुरे दिन चल रहे हैं। ……

( यह सब आज अचानक मेरे पुत्र  की इस सबाल पर प्रतिक्रिया है कि ” पापा इस बार आपने काली रात क्यों नहीं मनाई “)  🙂

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