इस खबर को लेकर क्यों खामोश है भारत का मीडिया ?

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मोदी सरकार ने जिन छह को फंसाया, सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया, पर ये खबर मीडिया की हेडलाइन नहीं बनी

corporate_media-494x356बर आई है कि मोदी सरकार ने अक्षरधाम हमले के मामले में जिन छह लोगों को फर्जी ढंग से फंसाया था, उन सभी को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया है. पर इस खबर को मीडिया में तवज्जो क्यों नहीं मिली ?

सवाल आतंकवाद का नहीं है, सवाल -वर्दी वाले आतंकवाद- का है, जो संविधान की शपथ लेकर देश के नागरिकों से खिलवाड़ करते हैं, उनका जीवन बर्बाद करते हैं.

क्या मोदी सरकार ऐसा कोई कानून लाएगी, जिससे उन पुलिस अफसरों को खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई हो, जो बिना किसी सबूत और तथ्य के, सिर्फ अपने पद और हैसियत का इस्तेमाल करते हुए देश के निर्दोष नागरिकों को झूठे केस में फंसा देते हैं.

उनका सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन तबाह कर देते हैं. यहां बात किसी जात या मजहब की नहीं है. हम-आप में से कोई भी इसका शिकार हो सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट ना हो, तो इस देश के राजनेता और पुलिस मिलकर ना जाने कितने मासूम नागरिकों को सूली पर चढ़ा दें.

सिर्फ एक सवाल है. आतंकवाद के खिलाफ गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने वाला मीडिया ऐसी खबरों को तवज्जो क्यों नहीं देता? उन पर आधे घंटे का स्पेशल क्यों नहीं बनता. उन पर प्राइम टाइम में बहस क्यों नहीं होती?

ऐसी खबरें अखबारों में पेज-1 की हेडलाइन्स क्यों नहीं बनतीं. जिस अमेरिका के आतंकवाद से निपटने की नीति की हम दुहाई देते हैं, अगर वहां आतंकवाद के मामले में फंसे नागरिक सुप्रीम कोर्ट से बरी हो जाते तो पूरे देश में भूचाल आ जाता. सरकार और प्रशासन को जवाब देना पड़ता.

राष्ट्रपति को सामने आकर सफाई देनी पड़ती. वहां नागरिकों के अधिकार इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनसे जरा सा खिलवाड़ सरकार और प्रशासन को भारी पड़ता है.

फिर हम क्यों सजग नहीं है? अगर आतंकवाद के मामले में आरोपी सुप्रीम कोर्ट से बरी हुए हैं तो इसके लिए उस राज्य की पुलिस और सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा. मीडिया को इस पर सवाल उठाने होंगे. संविधान द्वारा प्रदत्त देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. लोकतंत्र के चौथे खंभे को इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहिए. धर्म-समुदाय-जाति की सीमाओं से परे उठकर. इस देश के लिए, इस देश के सभी नागरिकों के लिए.

….पत्रकार नदीम एस. अख्तर अपने फेसबुक वाल से.

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