इस अनुठी पहल के साथ पत्रकारिता का मिसाल बन गया प्रभात रंजन

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राजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय)। “शिद्दते गम को तबस्सुम से छिपाने वाले, दिल का हर राज़ नजरें बयां करती है।“  कभी यह शायरी मैंने ही मजाक-मजाक में स्कूल की किताब में लिखी थी। लेकिन क्या मालूम कि पत्रकारिता के ढलते पड़ाव में एक दिन यही सच्चाई के तौर पर उभर कर सामने आयेगी।

आज राज्य के एक टीवी नेटवर्क के पत्रकार दिवाकर श्रीवास्तव के साथ जिंदगी और मौत से जूझ रहे पत्रकार प्रभात रंजन से व्यवहारिक भेंट करने राजधानी रांची के गुरुनानक अस्पताल पहुंचे।

मन में दिन भर की बड़ी निराशा थी। आज मैं दिन भर उपापोह में था कि आखिर मीडिया लाइन में हम सरीखों का औचित्य क्या है ?  3 दशक की पत्रकारिता और आज की परिवेश में अब किसी मजलूम की आवाज बनना बड़ा मुश्किल है। 

रांची प्रेस क्लब की सदस्ताता फार्म भरने के बाद बड़ी उपापोह की स्थिति मेरे सामने थी। कभी किसी मजलूम से समझौता न करने का मेरा जुनून और छद्म लिबासधारी सड़क छापों का अपना गंदा मुहिम उस परिस्थिति से भी घातक लग रहा था, जो वर्ष 2012 में क्रियेट किया गया था और मुझे न्यायालीय दांव-पेंच में उलझा दिया था। मुझे लगता है कि ऐसी स्थिति हर पत्रकार के जीवन में जरुर आता है।

खैर छोड़िये। वह बात पुरानी हुई। अब नई बात सामने है। करीब 3 बजे किसी तरह अपने साथी दिवाकर श्रीवास्तव के साथ बड़ी मुश्किल से गुरुनानक अस्पतात पहुंचे। वहां लिस्ट में नाम देखकर कमरा नंबर-205 में प्रवेश किये। जहां बिस्तर पर पत्रकार प्रभात रंजन बिल्कुल धीर-गंभीर अति संवेदनशील अव्यवस्था में पड़े थे।

प्रभात की हालत देख हिम्मत नहीं हो रही थी कि बात कहां से शुरु करें और कहां से खत्म। एक घंटा बाद बातों का सिलसिला शुरु हुआ। मेरे पहले उनसे हमारे रांची प्रेस क्लब से जुड़े के वरीय पत्रकार मिल चुके थे। उनके इलाज हेतु अच्छी खासी राशि भी चंदा कर भेंट कर चुके थे। जैसा कि प्रभात ने मुझे बताया-दिखाया। उसे देख-समझ मुझे पक्का यकीन हो गया कि मानवता के शिखर पर पत्रकारिता के रहनुमाओं का कोई सानी नहीं है। आज भी हमारी बिरादरी की संवेदनशीलता चरम पर है। एक बार फिर उन्हें तहे दिल से सलाम, जिन्होंनें एक होनहार पत्रकार की सुध ली।

लेकिन, मदद, सहानुभूति, संवेदना और दायित्व के बीच मेरे सबाल के जबाब में प्रभात रंजन ने जो कुछ कहा, वह मन-मस्तिक को काफी झकझोरने व चौंकाने वाले पहलु हैं और इस पर हर मीडियाकर्मियों को गंभीरता से संज्ञान जरुर लेनी चाहिये।

प्रभात रंजन का कहना था कि मेरी जिंदगी को बचाने के लिये सब गंभीर दिखे। लेकिन मेरी ख्वाईश है कि यहां के पत्रकार कोई ऐसा कदम उठायें कि किसी पत्रकार के साथ ऐसी नौबत ही न आये। वे अपनी ईमानदारी की कमाई से एक ऐसा फंड का निर्माण करें, जो किसी भी पत्रकार की सेवा, मदद और उनकी जान बचा सकें।

मौत की शैय्या पर जुझ रहे प्रभात रंजन की पत्रकारों के प्रति समर्पण भावना ही कही जायेगी कि मददास्वरुप राशि देने आये रांची के प्रतिष्ठित पत्रकारों को यहां तक कह दिया कि उसके सहातार्थ राशि को भविष्यगत पत्रकार आपात सहायता कोष में रख दी जाये।

प्रभात रंजन ने बताया कि उसकी शिकायत जेजेए जैसी संगठन और असके फ्रॉड अध्यक्ष शहनवाज जैसे लोगों से है, जिसने एक चैनल में काम करा कर पूरी मेहताना हड़प ली और 8-9 लोगों की गैंग बनाकर सबका शोषण दमन कर रहा है।

प्रभात रंजन ने मांग की है कि मीडिया, पुलिस , प्रशासन, सरकार और समाज के वुद्धिजीवी वर्ग सामने आकर ऐसे ढोंगियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को अंजाम दें।    

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