इधर मौत पर मातम, उधर इन्साफ पर मातम !

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28sc1एक समय था जब रणवीर सेना के खौफ से पूरा बिहार कापता था .. वर्ष 1994 में रणवीर सेना का गठन बिहार के मध्य भोजपुर जिले के बेलाउर गाँव  में हुआ .. दरअसल जिले के किसान भाकपा माले (लिबरेशन) नामक नक्सली संगठन के अत्याचार से परेशान थे और किसी विकल्प की तलाश में थे.. ऐसे में किसानों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल पर छोटी छोटी बैठक के जरिये संगठन की रूप रेखा तैयार की और बेलाउर के मध्य विद्यालय प्रांगण में एक बड़ी किसान रैली कर रणवीर किसान महासंघ के गठन का एलान किया गया ..

उस रैली में खोपीरा पंचायत के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह , बरतियर के कोंग्रेसी नेता जनार्दन राय,एकवारी के भोला सिंह , तीर्थ कौल के देवेन्द्र सिंह भटौली के युगेश्वर सिंह बेलाउर के वकील चौधरी,धन्छुहा के कांग्रेसी नेता कमलाकांत शर्मा और खंदौल के मुखिया अवधेश कुमार सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई .. इन लोगों ने गाँव गाँव जाकर किसानों को माले के अत्याचारों के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया ..  

                                                brahmesharआरम्भ में तो इन लोगों के पास लाईसेंसी हथियार वाले लोग आये पर धीरे धीरे लोगों ने चन्दा एकत्रित कर अवैध हथियार भी लाये.. भोजपुर में वैसे किसान आगे थे जो नक्सलियों का आर्थिक नाके बंदी झेल रहे थे .. जिस वक़्त रणवीर सेना बना उस समय भोजपुर के कई गांवों में भाकपा माले ने माध्यम और छोटे किसानों के खिलाफ आर्थिक नाके बंदी लगा रखा था.. खेतीबारी पर रोक लगा दी गयी थी और खेतो में काम करने वाले मजदूरों को जबरन रोक दिया जाता था.

…ऐसे में भोजपुर जिले में तकरीबन पांच हज़ार एकड़ जमीन परती पड़ी हुई थी और किसान सहित कई मजदूर अन्न के लिए तरस रहे थे .. बड़े किसान तो किसी तरह अपना पेट भर लेते थे पर मध्यम वर्गीय तथा छोटे किसानों के कई दिनों तक चुल्हा नहीं जलता था …

ranbir sena (2)इतना नहीं किसानों को शादी विवाह जैसे समारोहों के आयोजन में भी घोर कठिनाई होने लगी थी …ऐसे में रणवीर सेना ने किसानों को एकजुट कर प्रतिकार करने के लिए तैयार किया …  यहीं रणवीर सेना के गठन का जमीनी हकीकत है… दरअसल भाकपा माले ने ही रणवीर किसान महासंघ को रणवीर सेना नाम दे दिया … वर्ष 1994 से वर्ष 2000 तक रणवीर सेना बिहार में खूनो खेल खेलता रहा ..

                                                      इस सेना ने सबसे पहले 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के सन्देश प्रखंड के खोपीरा गाँव (जो की ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ़ ब्रह्मेश्वर मुखिया का पैत्रिक गाँव हैं) में 5 दलितों की नृशंश ह्त्या कर दी …  इस काण्ड में ब्रह्मेश्वर मुखिया का हाथ बताया जाता है… उसके बाद से तो इस सेना ने क़ानून की धज्जियां उड़ाते हुए पुरे मध्य बिहार में खुनी खेल खेलना शुरू कर दिया .. ठीक इसके तीन महीने बाद उदवंतनगर प्रखंड के सरथुआ गाँव में 25 जुलाई 1995 को 6 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गयी .. इस घटना को अंजाम देने के महज़ 10 दिनों के बाद ही 5 अगस्त 1995 को भोजपुर जिले के ही बडहरा प्रखंड के नूरपुर गाँव में हमला बोल 6 लोगों की ह्त्या कर दी गयी और साथ ही 4 महिलाओं को भी बंधक बना कर उनके साथ बलात्कार के बाद उनकी भी ह्त्या कर दी गयी …

        ranbir sena (1)हालांकि इस लड़ाई में माले भी पीछे नहीं रहा वह भी मौका पाकर रणवीर सेना के के गांवों में नरसंहार जैसे घटना को अंजाम देते रहा ..माले के लोगों को भी कम नहीं कह सकते उनलोगों ने भो सेनारी जैसे नरसंहार कर ,सहार प्रखंड के नाढ़ी गाँव में जाड़े के दिनों में अलाव ताप रहे 9 मासूमो की ह्त्या कर प्रशाशन व रणवीर सेना के लिए चुनौती बना रहा  कुछ दिनों तक माहौल शांत रहा लेकिन फिर  7 फ़रवरी 1996 को रणवीर सेना ने जिले के चरपोखरी प्रखंड के चांदी गाँव में हमला कर 4 लोगों की हत्या कर दी ...

9 मार्च 1996 को भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के पतलपुरा में तीन लोगों की ह्त्या और फिर इसी प्रखंड के नोनउर गाँव में 22 अप्रैल 1996 5 लोगों की ह्त्या रणवीर सेना द्वारा कर दी गयी उसके बाद से सहार प्रखंड में माले और रणवीर सेना का तांडव रुका ही नहीं और इस खुनी तांडव में कई लोग मौत के आगोश में वहाँ चले गए जहां से कभी भी लौटकर नहीं आ सकते इस दौरान वर्चश्व के इस जंग में निर्दोष भी बलि के बकरे बने .. 

ranbir-male (4)सहार प्रखंड के नाढ़ी गाँव में तो रणवीर सेना का कहर बरपा पहले 3 मई 1996 को 3 लोग फिर 19 मई को भी 3 लोगों की ह्त्या हुई … और अब बारी थी उदवंतनगर के मोरथ गाँव के दलितों के खात्मे की तो यहाँ भी 25 मई 1996 को तीन लोग अपनी जान रणवीर सेना के हवाले कर दिए कहा जाता है की वर्ष 1996 का कोई भी महीना ऐसा नहीं था जब रणवीर सेना ने दो चार लोगों को मौत के घाट ना उतारा हो फलतः 11 जुलाई 1996 की सुबह जो सूरज की लालिमा में भी बथानी टोला वासियों के लिए काली हो गयी थी उसे तो आज भी बिहार के लोग नहीं भूल पाए है ...

ranbir-male (1)इस दिन रणवीर सेना के वीरों ने बथानी गाँव के घरों में सो रहे 21 दलितों एवं अल्पसंख्यकों की गर्दन धड से अलग कर दिया था …इस घटना को भुगते लोग कहते है की रणवीर सेना के दरिंदों ने एक मासूम को जहां हवा में उछाल कर कर तलवार से उसके दो टुकड़े कर दिए वहीँ एक गर्भवती का पेट चीरकर गर्भ में पल रहे अजन्मे शिशु को भी नहीं बख्शा , महिलाओं के स्तन काट दिए गए .. और तब भी खुनी खेल खेलने वाले खामोश होने के बजाय खूंखार होते गए .

बथानी की घटना को भूल भी नहीं पाए थे की 25 नवम्बर 1996 को पुराहरा गाँव में 4 और लोग काट दिए गए ..  इसी तरह सन्देश प्रखंड के खनेट गाँव में 5 लोगों की ह्त्या कर दी गयी .. सन्देश और सहार प्रखंड के सैकड़ों गाँव रणवीर और माले के खौफ से काँप रहे थे .. इस इलाके के लोग पलायन करने को विवश हो गए और अपनी सारी संपत्ति छोड़ शहरों की ओर रुखसत कर गए .. बाहर के लोग तो यहाँ के गांवों का नाम सुन थर्रा उठते थे .

                                                         ranbir-male (2) समय बीतता गया और रणवीर  सेना ह्त्या दर ह्त्या करता गया ,तथा कानून व प्रशाशन उसका बाल भी बांका नहीं कर पाया जिससे इस सेना के हौसले बुलंद होते गए .. अब सेना ने भोजपुर से बाहर कदम रखा 31 जनवरी 1997 को जहानाबाद जिले के मखदुमपुर प्रखंड के माछिल गाँव में 4 दलितों की ह्त्या ,पटना जिला के बिक्रम प्रखंड के हैबसपुर में 10 लोगों की ह्त्या,जहानाबाद के अरवल प्रखंड (जो अभी जिला बना है पहलर प्रखंड हुआ करता था) के आकोपुर गाँव में 28 मार्च 1997 को 3 लोगों की ह्त्या. फिर भोजपुर में एकवारी गाँव में 9 लोगों की हत्या रणवीर सेना ने की …

अभी सेना का मन नहीं भरा 11 मई 1997 को 10 लोगों की ह्त्या ,फिर जहानाबाद के ही करपी प्रखंड के कदासिन गाँव में 2 सितम्बर को 8 लोगों की हत्या फिर इसी प्रखंड के कटेसरनाला  गाँव में में 23 नवम्बर 1997 को 6 लोगों की ह्त्या निर्मम तरीके से कर दी गयी ..

                                                              सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है की ब्रह्मेश्वर मुखिया की उपस्थिति में 31  दिसम्बर 1997 को रणवीर सेना ने जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर-बाथे गाँव में 59 लोगों की निर्मम तरीके से हत्या की … बिहार के आपराधिक  इतिहास में में उस दिन एक काला अध्याय जुड़ गया अभी तक इससे बड़ा नरसंहार नहीं हुआ है .. तब तत्कालीन राष्ट्रपति ने इसे देश के लिए शर्मनाक घटना करार दिया था ..

Angry supporters of Mukhiya torch vehiclesएक बार फिर करपी प्रखंड के ही रामपुर गाँव में रणवीर सेना के लोगों ने 3 लोगों की जान ले ली. 25 जनवरी 1999 को सेना ने जहानाबाद में एक और बड़े नरसंहार को अंजाम दिया जब अरवल प्रखंड के शंकरबिगहां गाँव में सो रहे 23 लोगों की ह्त्या कर दी गयी …फिर 10 फ़रवरी 1999 को जिले के ही नारायण पुर में 12 लोग मौत के घाट उतार दिए गए ..

तब जहानाबाद के बाद गया के बेलागंज प्रखंड के सिदानी गाँव में 12 लोग मारे गए,एक बार फिर भोजपुर के सोनबरसा में 3 और नोखा प्रखंड के पंच्पोखरी में 3 लोगों की ह्त्या की गयी , उसके बाद औरंगाबाद जिला के गोह प्रखंड के मियापुर गाँव में 16 जून 2000 को 33 लोग मारे गए ..  तब इन सारे घटना क्रमों में ब्रह्मेश्वर मुखिया पर नरसंहार सहित एनी 22 मामले दर्ज हुए जिनमे से सारे मामलों में वो फरार रहे ..पर कहा जाता है की क़ानून के हाथ बड़े लम्बे होते है …

Ranvir_Sena_chiefतो वर्ष 2002 में वो पटना से पकड़ लिए गए ..9 साल जेल में बिताने के बाद भोजपुर जिले के आरा मंडल कारा से वे 8 जुलाई 2011 को रिहा हुए … इन सारे मामलों में से 16  उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया जबकि पांच अन्य मामले में उन्हें पहले से ही जमानत मिल चुकी थी  …  

                                                                                      जेल से रिहाई के बाद रणवीर सेना सुप्रीमों ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया एक साधारण व्यक्तित्व का नायाब उदाहरण बन चुके थे पर ऐसा कहा जाता रहा है की जरायम की दुनियां से पीछे लौट कर आना और एक साधारण जीवन व्यतीत करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है .. वैसे भी मौत जब सर पर मंडराने लगे तो मनुष्य का कोई वश नहीं चलता .. यही हुआ ब्रह्मेश्वर मुखिया के साथ  भी और एक जून 2012 को उन्ही के आवास से दस पंद्रह कदम की दुरी पर सुबह टहलने के क्रम में उनकी नृशंश ह्त्या कर दी गयी .

इस ह्त्या से रणवीर सेना खेमे में जहाँ मुखिया की मौत पर मातम था वही दूसरी और बथानी टोला नरसंहार मामले में फांसी की सज़ा पाए गए दोषियों को 2012 में हाई कोर्ट पटना द्वारा बरी किये जाने के बाद माले के खेमे में भी इन्साफ पर मातम था .                                                                                        

ranbir-male (3)अब जब बाथे नरसंहार के सभी फांसी की सज़ा पाए दोषियों को पटना हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है तो सवाल उठ रहा है की आखीर उस दौरान 59 लोगों ने क्या सामूहिक आत्मदाह किया था ..? एक सवाल और लाजिमी है कि अगर सज़ा मुक्त किये गए लोग गुनाहगार नहीं थे तो असली गुनाहगार हैं कौन ?? और जब ये गुनाहगार नहीं थे तो आरोप लगने से लेकर अब तक जेल में पंद्रह वर्ष से भी ज्यादा की ज़िन्दगी बिताने के एवज में क्या सरकार और कानून इन्हें इनकी बेगुनाही के बाद इनकी बीते दिनों को वापस कर पायेगी ??

या उन्हें इसके लिए कोई आर्थीक मदद देगी ?? क्या क़ानून का मखौल उड़ाने वाले दोषी पुलिस पदाधिकारियों  को हीं उन बेगुनाहों की मौत का दोषी मानकर सज़ा नहीं दी जानी चाहिए ? क्या सरकार की नक्कारेपन को छुपाने के लिए इतिहास से इन तारीखों का नामों निशाँ मिटा दिया जाना चाहिए …?? हाँ यही ठीक रहेगा हमें उन मनहूस तारीखों को इतिहास से मिटा हीं देना चाहिए …                                                                            

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क्योकी अगर इन तारीखों को हम  इतिहास में दर्ज करेंगे तो बिहार पर यह कलंक चढ़ेगा कि 2013 ईस्वी तक भी यहां से सामंतवादी सोच खत्म नहीं हो पायी थी… वहां ताकतवर लोग कमजोर लोगों को दबा देते थे और गरीबों की जान को मुआवजे से तौल दिया जाता था..
चूंकि अपने राज्य की इज्जत का सवाल है सरकार की इज्जत का सवाल है मुख्यमंत्री की इज्जत का सवाल है पुलिस की इज्जत का सवाल है  इसलिए पिछले दो तीन दशकों में हुए नरसंहार के तारीखों को इतिहास से मिटा दीजिये ...

Posted by मंगलेश तिवारी 

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