इधर आमरण अनशन पर बैठे पत्रकार की हालत बिगड़ी, उधर राजनीति करने में जुटी पुलिस-संगठन

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राजनामा.कॉम। सीएम नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा के निवास प्रखंड-थाना क्षेत्र हरनौत में पिछले तीन दिनों से आमरण अनशन पर बैठे एक हिंदी दैनिक के पत्रकार मुकेश कुमार  की हालत बिगड़ती जा रही है।

पत्रकार की सुध लेने के वजाय पुलिस-पत्रकारों का गिरोह राजनीति में जुट गई है। यहां तक कि जिले के अखबार,पत्रकार और उनकी कुकुमुत्ते की भांति उगे संगठनों ने भी अनशन पर बैठे पत्रकार को न्याय  दिलाने के नाम पर चुप्पी साध ली है।

गौरतलब रहे कि पिछले दिनों हरनौत में आयोजित एक कार्यक्रम में बैठे पत्रकार मुकेश कुमार के साथ हरनौत थाने की पुलिस ने अभद्र व्यवहार किया था । जिसकी शिकायत उन्होंने हरनौत थानाध्यक्ष से भी की।

लेकिन थानाध्यक्ष अपने मातहत पुलिस को डांटने के बजाय इस घटना पर चुटकी लेकर चलते बने। इससे आहत पत्रकार मुकेश कुमार ने वहीं धरने पर बैठ गए। कई पत्रकारों का साथ भी मिला।

बाद में डीएसपी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपी पुलिसकर्मी को सस्पेंड कर दिया, लेकिन पत्रकार  मूल दोषी थानाध्यक्ष को हटाने की मांग पर अड़े हैं।

पिछले तीन दिनों से आमरण अनशन पर बैठे पत्रकार की स्थिति काफी गंभीर हो गई है। पत्रकार न्याय की मांग को लेकर धरने पर अडे हुए हैं।

लेकिन दुखद बात यह है कि उनके इस न्याय के साथ समाज का कोई भी व्यक्ति खड़ा नहीं है। जो समाचार पत्रों में अपना चेहरा चमकाने के लिए पत्रकारों के पीछे दौड़ता रहता है। एक खबर के लिए मिन्नते करते रहता है।

पत्रकार मुकेश कुमार के साथ कोई भी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि और न कोई कार्यकर्ता साथ है। सबसे दुखद और शर्मनाक है कि मुकेश कुमार, जिस प्रतिष्ठित अखबार के लिए काम करते हैं, वो भी नजरें फेर लिया है।

दूसरे अखबारों के लिए इस तरह की घटना मजे और चटकारे लेने के लिए होता है। कभी कभार ऐसी खबरों पर एक दो लाइन चलाकर अपना फर्ज निभा देते हैं ।

कहने को तो नालंदा में कई पत्रकार संगठन खड़े है, जो पत्रकारों के हक हकूक की दावे करती है। लेकिन जब पत्रकारों पर पुलिस की बात आती है तो पत्रकार संगठन पत्रकारों को न्याय दिलाने में पीछे हट जाते हैं।

जबकि नालंदा में किसी अखबार के ब्यूरो या कार्यालय प्रभारी के साथ कुछ होता है तो यही प्रखंडों के पत्रकार उनके साथ खड़े हो जाते हैं। पुलिस की लाठियां तक खाते हैं।

लेकिन जब प्रखंड के पत्रकारों पर कोई जुल्म होता है तो उनके साथ खड़ा होना तो दूर उनके ही अखबार में एक लाइन की खबर तक नहीं होती है।

पत्रकार मुकेश कुमार का कहना है कि उनका मीडिया और पत्रकार संगठनों पर से विश्वास खत्म हो गया है। उनकी लड़ाई अकेले ही जारी रहेगी। चाहे उन्हें कुछ भी हो जाएं।

उन्होंने बताया कि पुलिस -पत्रकार गठजोड़ की वजह से अब राजनीति हो रही है। उनकी लड़ाई चलते रहेंगी। धरना स्थल से उनकी अर्थी उठेगी या उनकी मांग मानी जाएगी, क्योंकि सबाल उनका नहीं, बल्कि एक पत्रकार के अस्तित्व का है।

अब ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि दूसरे के दुःख सुख में खड़े पत्रकारों पर ऐसे अत्याचार के खिलाफ वे लोग क्यों नहीं खड़े होते हैं, जिनकी खबर पत्रकार लिखता है।

क्या उनके लिए पत्रकार सिर्फ़ खबरें लिखने का जरिया होता है। जब नेताओं समेत समजा के किसी तबके पर कोई अत्याचार होता है तो क्यों पत्रकार उनकी खबरें लिखता है। न्याय की जरूरत सिर्फ उन्हें ही होती है आज वे सभी पर्दे के पीछे से मजे ले रहे हैं।

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