आरएसएस,जनसंघ और भाजपा को खून-पसीने से सींचा, आज सुध लेने वाला कोई नहीं !

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राजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय)। आरएसएस, जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी। राज कुमार मुरारका ने झारखंड में इनको अपने खून पसीने से सींचा लेकिन आज वे हाशिये पर खड़े हैं। उनकी कहीं कोई पूछ नहीं होती है है। उन्होंने अपनी बालपन-जवानी सब दांव पर लगा दिया,लेकिन आज उनकी कोई सुध नहीं ले रहा है। उनके पास अगर कुछ बचा है तो आपातकाल के दौरान लगी पुलिस की गोली के निशान। मोरारका जी की पीड़ा है कि काश उस दौरान पुलिस की गोली से वे शहीद हो गए होते।

 kamal_murarka1रांची के मोराबादी ईलाके में रहने वाले  राज कुमार मुरारका बताते हैं कि वर्ष 1972 में वे देवदास आप्टे  के साथ भारतीय जनसंघ के कार्य के कार्य में जुट गए। उस समय बिहार विधान सभा से भारतीय जनसंघ को सभी विधायकों को इस्तीफा देना था लेकिन तात्कालीन कांके विधायक रामटहल चौधरी ने संगठन के निर्देश के बाबजूद इस्तीफा नहीं दिया। जिसे लेकर आंदोलन चलाया गया।

बकौल राज कुमार मुरारका, वर्ष 1973 में जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जन आंदोलन की शुरुआत हुई, तब उनकी त्तपरता में रांची संघर्ष समिति का गठन हुआ। 17 मार्च, 1974 को आंदोलन के दौरान शहीद चौक के पास पुलिसिया कहर ढाया गया। आंदोलनकारियों पर तात्कालीन एसएसपी के नेतृत्व में गोलियां चलाई गई। इस घटना में रांची कार्ट सराय रोड निवासी छात्र रघु चौधरी शहीद हो गए और उन्हें भी 3 गोलियां लगी तथा ईश्वर की कृपा से वे किसी तरह बच पाने में सफल रहे।

25 जून,1975 की रात्रि 12 बजे आपातकाल की घोषणा होने के बाद वे भूमिगत हो गए। इसके बाद जुलाई,1975 में संगठन के वरिष्ठ कैलाशपति मिश्र रांची पहुंचे और द्वारिका प्रसाद मोदी के आवास पर गुप्त बैठक हुई। बैठक के निर्णय के अनुसार उन्हें रेलवे विभाग परिसर में आपातकाल विरोधी पोस्टर साटने की जिम्मेवारी सौंपी गई।जिसके निर्वाह में वे पूर्णतः सफल रहे।

राज कुमार मुरारका कहते हैं,  इसके बाद वर्ष 1976 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया। वर्ष 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ तो वे भाजयुमो की जिला कार्यकारिणी में शामिल हुए। उसके बाद उन्हें सिसई विधान सभा क्षेत्र का कार्यभार सौंपा गया, जिसमें वे सफल रहे। वर्ष 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मुबंई अधिवेशन में जब भाजपा का गठन हो रहा था, उस समय वे उर्दू द्वीतीय राज्य भाषा के विरोध में आंदोलनरत थे। तब उन्हें पुनः जेल में डाल दिया गया। इस कारण वे बुलावा के बाबजूद मुंबई अधिवेशन में भाग नहीं ले पाए थे।

उसके बाद वर्ष 1981 मे कैलाशपति मिश्रा के द्वारा गुमला जिला संगठन की घोषणा की गई, जिसमें उन्हें उन्हें जिला संगठन मंत्री बना कर भेजा गया और वे वर्ष 1985 तक इस पद पर कार्य करते हुए संगठन के प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। उसके बाद उन्हें भाजपा प्रदेश किसान मोर्चा का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया। उसके बाद संगठन में नए लोग आते रहे और पुराने लोगों को दरकिनार करने का दौर शुरु हो गया।

बकौल राज कुमार मुरारका, आज स्थिति यह है कि आरएसएस, भारतीय जनसंघ, जनता पार्टी और फिर भाजपा को अपने खून पसीने से सींचने के बाबजूद उन्हें पुछने वाला कोई नहीं है। अब लोग पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। समूचे संगठन पर दागी, भ्रष्ट और चापलूस लोगों का कब्जा नजर आता है।

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