आभासी दौर और नारी अस्मिता की त्रासदी

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(दो अखबारों के सम्पादकों ने मेरा यह लेख छापने से मना कर दिया । लेकिन कोई न सुने तो अकेले में गाना, – कोई न छापे, फेसबुक से कौन रोक सकता है? पढ़ना है पढ़िए, न पढ़ना है तो मत पढ़िए। )

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इंटरनेट के एड्रेस बार में टाइप करिये – ‘सुनंदा’ – और सुझाव बजबजाने लगते हैं -‘सुनंदा पुष्कर हॉट’। यू ट्यूब पर लिखिए ‘सुनंदा’ और ‘की वर्ड्स’ आते हैं – ‘सुनंदा पुष्कर नैवल यानी नाभि, सुनंदा पुष्कर हॉट सीन, सुनंदा पुष्कर हॉट पिक्स, सुनंदा पुष्कर हॉट वॉल पेपर्स!’

इंटरनेट बताता है कि इसे सुनंदा के मरने के बाद अपडेट किया गया है ! ये है आधुनिक बुद्धिजीवी की ज्ञान गंगा इंटरनेट का सच! कोई अघोरी कापालिक श्मशान में पड़ी मृत देह से बलात्कार करने में भले हिचक जाए, इंटरनेट की औलाद नहीं हिचकती। 
‘बुलबुल! अपनी सांस अपने गले में कैद रख। 
राजाओं के नाजुक मिजाज़ को अहसास की आवाज बर्दाश्त नहीं होती।’ 
– ठीक से याद नहीं, लेकिन ऐसा ही कुछ कहा था जेबुन्निसा ने जब बाप औरंगज़ेब ने उन्हें शायरी करने से रोका। मुग़लिया खानदान की यह जीनत बीस साल कैद रही और कैद में ही मर गई। गुनाह था बोलना और प्यार करना। सुनंदा पुष्कर ने ये दोनों गुनाह किये थे। 

फ़िज़ा , ज़िया, तस्लीमा, सुचित्रा सेन, मीना कुमारी, कमला दास, अग्नि परीक्षा, सीता का भूमि में दफ़न हो जाना, किसी और को व्याही मीरा और राधा का किसी और से प्रेम, शिव द्वारा सती का परित्याग – इत्यादि हमारी सामूहिक स्मृति-भूमि के कुछ असम उभार हैं। यहाँ कुछ न कुछ तो दफनाया गया है जिसकी शव परीक्षा से संस्कृति कतराती रही है। इस देव-विरुद्ध, अनर्गल, सन्दर्भहीन सी सूची में कॉमन फैक्टर है – अस्मिता और प्यार पाने की असफल चाह। 

अस्मिता की चाह, प्यार पाने की भटकन और बियाबान का अकेलापन – ये सब मिल कर अभी के आभासी दौर में अच्छे भले इंसान को कहाँ ले जा रहे हैं, इसका उदाहरण है सुनंदा पुष्कर थरूर। सुनंदा की मौत आभासी दुनिया में भी बीमार समाज के आतंक का सायरन है ।

सुनंदा सम्भावनाओं से भरी, पेशेवर तौर पर सफल और जानदार महिला थी। उनका संघर्ष साधारण नहीं था। पहले पति से तलाक, दूसरे पति की दुर्घटना में मौत, बेटे का मानसिक अवसादवश न बोलना , उसके इलाज के लिए एक युवा विधवा माँ का दूर देशों में अकेले भटकना, आइपीएल विवाद के दौरान मीडिया में छीछालेदर, हाई प्रोफाइल थरूर से शादी के बाद लगातार क्रूर कैमरों के फोकस में रहना, पति के पास समय की कमी – यह सारा कुछ झेल पाना आसान नहीं रहा होगा। और इन सबके बीच प्यार पाने और करने की दीवानगी ! 

अब कल्पना कीजिये उन क्षणों की जिनमे सुन्दर, ग्लैमरस, सपनीली, संघर्षशील, संपन्न, जीवंत सुनंदा की जिंदगी ख़त्म हुई । शायद लगा होगा – गलत या सही – कि तीसरे पति से भी धोखा ही मिला ! प्यार पाने का तीसरा सपना टूट चुका था। एक क्षण में ट्रैक बदल कर जिंदगी मौत के रास्ते चली गई ! कितना कम फासला है, जिंदगी और मौत, हत्या और आत्महत्या के बीच ! अक्सर कोई माँ अपने बच्चों को मार कर आत्महत्या कर लेती है ! भयानक है हत्या – आत्महत्या की यह उपत्यका ! 

हस्तिनापुर के युवराज ययाति के पहले प्यार अलका का अंत यहाँ महल के गोपनीय तहखाने में ज़हर से होता है। अनारकली का अंत भी काल कोठरी में ही होता है – साम्राज्य और उसकी परम्पराएं प्यार से हमेशा बड़ी रही हैं। 

पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट जिस्म पर नोच खसोट के निशान बताती है। लेकिन मन पर कितनी खरोंचें हैं , इसका पोस्ट मार्टम होगा? इतनी खरोंचों के बाद मन अगर मरने का निर्णय करने को मजबूर हो तो यह हत्या होगी या आत्महत्या ? 

माँ को हक़ था अपना वजूद, अपने होने का अर्थ और अपना प्यार तलाशने का, लेकिन अगर उसकी यात्रा निर्जन श्मशान में ख़तम हो गई तो वह एक अकेला बच्चा अब कितना अकेला हो गया – यह सवाल कहीं नज़र नहीं आता। क्या माँ को अपने वजूद की तलाश करनी ही नहीं चाहिए थी ? ऐसे कई सवाल कुलबुलाते हैं।
सुनंदा में परम्पराओं से टकराने की हिम्मत थी। टकराई। केन्द्रीय मंत्री की पत्नी होते हुए कश्मीर समस्या पर आज़ाद राय वही रख सकती थी। अपने मन के कपडे पहनने की हिम्मत और प्यार का खुला इजहार करने की हिम्मत भी उसमे थी। जीवन उसने पानी शर्तों पर जिया। मानसिक रूप से वह गुलाम नहीं थी और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के अनुसार मरते समय उसने कोई शराब नहीं पी रखी थी। 

लेकिन अपने तमाम विद्रोह और गैर परंपरावादी सी जीवन शैली के बावजूद वह पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकी थी। उसने भी उन्ही परम्पराओं के अनुरूप शादी की और शादी की मूल अवधारणा, पजेसिवनेस को अपनाया। इस तरह सुनंदा का विद्रोह भी आभासी ही रह गया। 

हमारे दौर में अभिव्यक्ति और प्यार की तलाश वास्तविक दुनिया में पूरी नहीं हो पाती। ऐसे में हम आभासी (वर्चुअल ) दुनिया में एक विकल्प खोजते हैं। आभासी दुनिया के नागरिक बोलचाल की भाषा में नेटीजेन कहे जाते हैं। ये फेसबुक, ट्विटर और एसएमएस को वैकल्पिक सच मानते हैं। उस पर वास्तविक सच से ज्यादा यकीन करते हैं। सुनंदा, पाकिस्तानी पत्रकार तरार और शशि थरूर भी इसी आभासी दुनिया के नेटीजेन हैं।

सुनंदा ने ट्विटर और एसएमएस को अंतिम सच मान लिया। ऊपर से वह भारतीय समाज की उस कॉमन बीमारी का भी शिकार हुई जो किसी पुरुष और स्त्री के बीच सामान्य दोस्ती को असम्भव मानती है और जो नहीं मान सकती कि स्त्री और पुरुष में सिर्फ औरत मर्द का ही नहीं दोस्ती का भी रिश्ता हो सकताहै। सिर्फ सुनंदा ही नहीं, तरार भी इस मानसिकता का शिकार हुई। तरार भी एक अकेली औरत है और भले ही थरूर से सिर्फ दोस्ती हो, इसके पीछे उनका अकेलापन भी एक सच था।

महीनो पहले लिखे तरार के पत्रों से स्पष्ट है कि मीडिया ने न सिर्फ सुनंदा और तरार की निजी जिंदगी में अश्लील ताक झांक की बल्कि उसे बिला वजह लांछित किया। क्यों किया ? क्योंकि हमारा समाज सेक्स की भूख और नैतिकता की कैद से ग्रस्त है. उस से अलग कुछ सोच ही नहीं सकता – जैसे भूखे को रोटी के सिवा कुछ नहीं सूझता। टीवी चैनल्स इस भूख के लिए लॉलीपॉप देते हैं। 

हम एक डरे हुए समाज के डरे हुए लोग हैं। अपनी छाया से भी डरते हैं। यहाँ किसी स्त्री या पुरुष से दोस्ती तो दूर, बात करने पर भी अनैतिक समझे जाने का डर है। पत्नी या पति के किसी और से फंस जाने का डर है। अधिकाँश औरतों को यह डर है कि कही उसका आदमी किसी और से….. ! सुनंदा ने भी असुरक्षा की भावना और शक की बीमारी अपने सामाजिक परिवेश से पाई। 

sunandaसुंदरता और यौवन समाप्त हो जाने का डर औरत के मन में इतना गहरा है कि महंगे सौंदर्य प्रसाधन, सफल पेशेवर और सामाजिक पहचान और कॉस्मेटिक सर्जरी की नई नई खोजें भी उसे आश्वस्त नहीं कर पातीं। इसके अलावा रिजेक्टेड होने का डर, समाज परिवार, बच्चों के सामने इमेज ख़त्म हो जाने का डर, खबर बन जाने का डर, – डरों की एक लम्बी चौड़ी फेहरिश्त है, इतने डरे हुए समाज में आत्महत्या और हत्या कैसे न हो? 

जहाँ हाई कोर्ट ये कहता हो कि ‘यदि एक स्त्री और पुरुष एक कमरे में अकेले हैं तो माना जा सकता है कि वे हरि कीर्तन तो नहीं ही कर रहे होंगे’ – वहाँ यदि कोई स्त्री और पुरुष फोन और ट्वीट पर संपर्क में हों तो क्यों नहीं वह समाज यह मान लेगा कि वे प्रेमालाप ही कर रहे होंगे? सुनंदा ने भी यही मान लिया। दम्पतियों और प्रेमियों के बीच शक लाखों जानें ले लेता है। लेकिन अभी तक यह शक हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है – समस्या नहीं। 

और मान लीजिये शक सही भी हो, चौथी पांचवीं या पचासवीं बार किसी को प्यार क्यों नहीं होना चाहिए? मैं यह सवाल रखने में भी डर रहा हूँ कि प्यार हो जाना पहली बार अगर नैतिक है तो पचासवीं बार अनैतिक क्यों है? यह सवाल पचासवीं बार प्यार के पक्ष में कोई वकालत नहीं है – सिर्फ एक सवाल है जिसका उत्तर शायद सुनंदा जैसी हज़ारों औरतों और पुरुषों की जिंदगी बचा सकता है, उन्हें उनके बीमार पजेसिवनेस से मुक्त कर सकता है।  भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्यार की पजेसिवनेस और कर्तव्य के बीच की इस विवादित भूमि के एक ओर वह स्त्री है जो कोढ़ी पति को खुश करने के लिए उसे अपने कन्धों पर वेश्या के पास ले जाती है और जिसे भारतीय वांगमय पांच महासतियों में से एक मानता है और दूसरी ओर वह तमाम गीत हैं जिनमे सौतन का डर सदियों से गूँज रहा है –

‘उस पारे जो जाओ तो जइबे करो, संग सवतिया न लाओ श्याम पइयां पडूं,
संग सवतिया जो लाओ तो लैबे करो, हमका न दिखाओ श्याम पइयां पडूं ।’
या फिर, 
– सौतन के लम्बे लम्बे बाल, उलझ मत जाना हो राजा जी!
– सौतन का डर ! 

प्राचीन काल से चले आ रहे ये डर हमारी सांस्कृतिक विरासत के अविभाज्य अंग हैं। इनमे एक नया डर और शामिल हो गया है – टीवी और पेपराजी का। ऐंकर और पैनलिस्ट आपको इतना डराएंगे, आपके निजी जीवन की इतनी धज्जियाँ उड़ाएंगे कि आप डर कर आत्महत्या ही कर लें। चेखव अगर होते तो एक क्लर्क की आत्महत्या के बदले टीवी चैनल के शिकार की आत्महत्या पर कहानी पहले लिखते। 

सुनंदा की आत्महत्या में टीवी चैनलों की आपराधिक भूमिका, परम्पराओं और सामाजिक मानसिकता पर कोई एफआइआर दर्ज नहीं होगी। बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? सनसनीखेज से आगे कौन सोचे ? 

भारतीय प्रेम परंपरा में प्रेम दीवानी मीरा और राधा ही हुईं, कृष्ण कभी दीवाने नहीं हुए । विरही कृष्ण की कोई तस्वीर गीत गोविन्द में भी नहीं है। शिव ने ज़रूर विरह में तांडव किया। राम भी थोडा विरह दग्ध हैं लेकिन सीता से तुलना करें तो राम और कृष्ण प्यार की उस दीवानगी और विरह की उस पराकाष्ठा को कभी नहीं छू पाते जो सीता और राधा में है। प्यार पाने की यही दीवानगी सुनंदा में थी। अस्मिता की यह तलाश सुनंदा के जीवन में २१ वर्ष की उम्र में तलाक से शुरू हुई, आभास तक ले गई और होटल के कमरे में खरोन्च खाए अकेलेपन में ख़त्म हुई । शायद कभी पता नहीं चल पाएगा कि यह हत्या थी या आत्महत्या और इसके लिए हम और हमारी परम्पराएं कितनी जवाबदेह हैं। 

सुनंदा सोचती भी थी और बेलाग बोलती भी थी – सो मरना ही था। उसमे निजी बातों, भावों को छिपाने और अंदर कुछ और बाहर कुछ और बोलने की बेईमान योग्यता नहीं थी। उल्टा सीधा जैसा भी सोचती थी उसे बोल डालती थी। ऐसा ईमानदार इतने दिन यहाँ जी गया यही क्या कम है ? 

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…. वरिष्ठ पत्रकार  गुंजन सिन्हा  अपने फेसबुक वाल पर

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