आज छद्म के रूप में अवशेष है मीडिया

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pressकुर्सी चाहें सम्पादक की हो या फिर चाहें मीडिया जगत के धुरन्धरों की, इन कुर्सियों पर बैठे महानुभाव भले ही बेहतर अग्रलेख लिखने की योग्यता न रखते हों लेकिन जिलों और तहसीलों के संवाददाताओं से वसूली में उन्हें महारत हासिल है।

 यही नहीं बेरोजगारों, दहेज़ प्रताड़ितों तक की न्यूज ये लोग पैसा लेकर प्रकाशित व प्रसारित करते हैं और इसी बजह से स्थानीय पत्रकारों की इमेज न के बराबर रह गयी है ।

हां मैं मानती हूँ कि हर व्यक्ति को अपने जीवन स्तर के उत्थान की दौड़ में शामिल होने का हक है,लेकिन अपने वजूद को बेचकर नहीं ।

अब चिंताजनक बात ये है कि मूल रूप से जिनका चरित्र पत्रकार का नहीं है, वे मीडिया में पैठ कर चुके हैं।  मीडिया आज छद्म के रूप में अवशेष है, जिसमें लहरों से भी पैसा कमा लेने का हुनर रखने वालों की तूती बोल रही है।

देखा जाए तो लोकतंत्र की प्रक्रियायें संचालित करने में मीडिया की अहम भूमिका रहती है, जिसकी विश्वसनीयता और पहचान अब मिट सी रही है। जिसने लालचवश निष्पक्षता की बजाय बिकाऊ चोला ओढ़ लिया है।

 ………..  Sunita Dohare  अपने फेसबुक वाल पर

 

 

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One comment

  1. एकदम सत्य कहा है सुनीता जी आपने , आपकी लेखनी हमेशा सच्चाई उगलती है सादर प्रणाम !!!!

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