आखिर क्यों नहीं मिला बीजेपी को मंडल-कमंडल का लाभ ?

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किसी भी चुनाव के बाद नेताओं के बयान पर कभी रिसर्च कीजिएगा। जनता का फैसला स्वीकार करने की उदारता को छोड़ दें तो हारने पर भी सब नतीजों की व्याख्या ऐसे करते हैं जैसे वही जीते हों। दूसरी तरफ जीतने वाले इतने गदगद होते हैं कि तुरंत अपनी जीत को ऐतिहासिक बता देते हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ। जो राजनीतिक प्राणी होते हैं उनके लिए हर चुनाव चुनाव होता है। वे चुनाव को हारने पर भी गंभीरता से लेते हैं और जीतने पर भी।

lalu_nitishबिहार के उप चुनाव के जो नतीजे हैं उनकी व्याख्या किस तरह से की जाए? तीन महीने पहले ही तो लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार का हर दांव पिट गया था। अति पिछड़ा, महादलित कुछ नहीं चला। नतीजा आने के दिन से नीतीश अपनी हार की काट खोज रहे हैं। सबसे पहले हार की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। महादलित तबके से मुसहर जाति के जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। आरोप लगा कि सुपर चीफ मिनिस्टर बन गए।

लोकसभा चुनावों में बीजेपी का नीतीश पर अहंकारी होने का भी एक मुख्य आरोप था। चुनाव के बाद नीतीश ने अहंकार थ्योरी को गलत साबित करते हुए उस लालू यादव से हाथ मिला लिया, जिसके खिलाफ लड़ते हुए उनका राजनीतिक वजूद बना था। आरोप लगा कि नीतीश के ब्रांड बिहार की राजनीति पर जंगल राज का साया मंडराने लगा है। बीजेपी ने कहा कि जंगलराज टू आने वाला है। महादलित-अति पिछड़ा नहीं चला मगर कांग्रेस-आरजेडी के साथ महागठबंधन बनाया।

यह सब ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं ताकि चर्चा में ध्यान रहे कि एक नेता बुरी तरह हारने के बाद किस तरह की राजनीतिक चालें चल रहा है। लोकसभा हार के बाद जहां कई दल ध्रुवीकरण की राजनीति के आगे समर्पण कर गए। वहीं नीतीश ने नए-नए समीकरण बनाकर अपनी सद्भावना ब्रांड की राजनीति में आस्था बनाए रखी।

समीकरण तो बीजेपी ने भी बनाए। रामविलास पासवान से, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से। रामविलास पासवान तो लालू के उस वक्त के सहयोगी रहे जब बीजेपी और नीतीश लालू से लड़ा करते थे।

क्या उप चुनाव के इन नतीजों से नीतीश कुमार का कम बैक यानी वापसी हुई है। क्या राजनीतिक पंडितों को इस महागठबंधन को गंभीरता से लेना चाहिए? सोमवार के नतीजे में 10 में से छह पर जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस की जीत हुई है। इन छह में से 3 सीटें आरजेडी की है। चार सीटों पर लड़ी थी। जेडीयू को दो सीटें मिली हैं, लड़ी थी चार पर। कांग्रेस दो पर लड़ी थी, मगर मिली एक सीट। बीजेपी को चार सीटें मिलीं हैं।

लालू ने कहा था कि मंडल-कमंडल को हरा देगा तब बीजेपी के नेताओं ने जवाब दिया कि हमारे पास मंडल भी है, कमंडल भी। बीजेपी के नेता राजीव प्रताप रूडी ने सुशील कुमार मोदी को अगला मुख्यमंत्री भी घोषित कर दिया। बीजेपी भले महागठबंधन के मुकाबले दो सीटें कम जीतीं, मगर इस चुनाव को बीजेपी ने भी गंभीरता से लड़ा।

बीजेपी और लोकजनशक्ति पार्टी साथ लड़े। दस सीटों पर बीजेपी गठबंधन को 4 लाख 65 हज़ार 888 वोट मिलें। इन सीटों पर महागठबंधन को 5 लाख 60 हज़ार 835 वोट मिले हैं। लोक सभा में बीजेपी गठबंधन को 1 करोड़ 28 लाख 38 हज़ार वोट मिले थे। महागठबंधन के वोट जोड़ दें, तो 1 करोड़ 59 लाख वोट मिले थे।

तो क्या उप चुनाव के नतीजे यह बताते हैं कि बिहार या यूपी में मोदी लहर को सिर्फ विरोधी दलों के बिखराव का लाभ मिला? बीजेपी अपनी प्रतिक्रिया में इसे लेकर काफी सतर्क है कि कोई इन नतीजों को मोदी की लोकप्रियता में गिरावट का पैमाना न मान ले। पर मुद्दा मोदी की लोकप्रियता का कम है इस बात का है कि अगर समीकरण बनाये जाएं तो मोदी का मुकाबला किया जा सकता है।

सुशील कुमार मोदी आज पटना में प्रेस कांफ्रेंस में नतीजों को सिरे से खारिज कर रहे थे। हर सीट की हार और जीत के कारण अलग हैं। हमें छह सीटें जीतनी चाहिए थी चार जीत पाए। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी −जेडीयू ने 32 लोक सभी सीटें जीती। 5 महीने बाद जब 18 सीटों पर उपचुनाव हुए तो 13 में हार गए। लालू प्रसाद का सीना चौड़ा हो गया कि जीत गए। इस चुनाव में कोई चीज़ स्टेक पर नहीं है। 243 विधान सभा की सीटें हैं। 10 सीटों के चुनाव परिणाम के आधार पर अगर कोई गलतफहमी में जीना चाहे तो मुबारक हो।

सुशील कुमार मोदी ने एक बात कही और वही एक बात पोलिटिकल लाइन है कि नीतीश चुनाव जीत कर भी हार गए। इसी नज़र से क्या यह पूछा जा सकता है कि नीतीश कुमार हार कर फिर से जीत गए। सुशील कुमार मोदी ने एक और बात कही कि बीजेपी के गठबंधन में वे बड़े भाई थे। महागठबंधन में छोटे भाई हो गए हैं। कमल वाले का तीर है तो तीर वाले नीतीश के जवाब का इंतज़ार करना चाहिए।

वैसे नीतीश कुमार ने आज कहा एक बात स्पष्ट हो गई कि समाज को जो बांटने की कोशिश हो रही थी और ये बताने की कोशिश हो रही थी जैसे टैक्स्टबुक में कोई बात लिखी रहती है और उसको लोग मानकर के चलते हैं कि ये सत्य है, अकाट सत्य है, तो बिहार के लोगों ने साबित कर दिया कि ऐसा कुछ नहीं है। यहां कोई जातीय बंधन नहीं है। कोई जातीय वोट बैंक नहीं है। लोग अपने विवेक से उचित निर्णय लेते हैं और इसके लिए मैं बिहार की जनता को सलाम करता हूं।

जब नतीजे आ रहे थे तब लालू प्रसाद यादव मुंबई के एक अस्पताल में दाखिल हो रहे थे। आज जिस तरह से उनके उत्साही ट्वीट्स आए हैं बीजेपी के नेताओं को उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए कि लालू भी अब ट्वीटर पर सक्रिय हो गए हैं। ये और बात है कि लालू को ट्विटर पर 32 हज़ार लोग ही फौलो करते हैं। लालू ने आज के फैसले के बाद कहा हमारी सरकार पूंजीपति नहीं गरीब चलाते हैं, इसलिए हमारा गरीब राज उनको जंगल राज लगता है।

व्याख्या करने में आप हिन्दी पट्टी के नेताओं को मात नहीं दे सकते। जंगल राज तो गरीब राज। क्या मंडल में अब भी वह जादू है कि वह कमंडल के पाले में गए मंडल को वापस खींच लाए। आखिर बीजेपी को मंडल-कमंडल का लाभ क्यों नहीं मिला? इस नतीजे को यूपी के मंडलाधिपति मुलायम सिंह यादव और मायावती किस नज़र से देख रहे होंगे? पोलटिक्स में सवाल नहीं बदलते। बेताल की तरह विक्रमादित्य के कंधे पर बैठते हैं और फिर उड़ कर डाल पर बैठ जाते हैं।

ravish_kumar

……….. इंडिया टीवी पर वरिष्ठ एंकर  रवीश कुमार का प्राइम टाइम इंट्रो

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